औरंगाबाद ट्रेन हादसा: मृतक की पत्नी ने कहा, 'जितना पैसा सरकार अब दे रही है, उससे कम में ही मेरा पति जिंदा घर आ जाता'

Mithilesh DharMithilesh Dhar   8 May 2020 5:00 PM GMT

"हम 10 लाख रुपए का क्या करेंगे? सरकार ने अगर गाड़ी चला दी होती तो इससे कम पैसे में मेरा पति जिंदा घर लौट आता।"

सरकार से सवाल करते ये शब्द उस पत्नी के थे जिसने औरंगाबाद ट्रेन हादसे में अपने पति को खोया है। पुष्पा सिंह (22 वर्ष) ने दो दिन पहले ही स्वयं सहायता समूह से एक हजार रुपए निकालकर अपने पति बिरगेंद्र सिंह (24) को भेजे थे ताकि वे घर वापस आ सकें।

"लॉकडाउन के बाद से कंपनी बंद थी। पिछले महीने का जो पैसा मिला ठेकेदार ने उसमें से खाने का पूरा पैसा काट लिया और बोला कि अभी तुम्हे 500 रुपए और चुकाने हैं तभी यहां से जा पाओगे। समूह से पैसा लेकर भेजा था ताकि वो ठेकेदार को पैसे देकर घर वापस आ सकें," ये कहते पुष्पा रो पड़ीं, "मुझे क्या पता था कि मुझे उनके मौत की खबर मिलेगी।"

शुक्रवार आठ मई को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेल पटरी पर जिन 16 मजदूरों की मौत हुई उनमें से पुष्पा सिंह के पति बिरगेंद्र सिंह भी थे।

पुष्पा और बिरगेंद्र सिंह की पुरानी फोटो।

हादसे में सभी 16 मृतक मध्य प्रदेश के उमरिया और शहडोल जिले के थे। जिला उमरिया, पंचायत ममान के कुल चार लोगों की मौत इस हादसे में हो गई जिसमें से गांव नेऊसा के तीन लोग थे। इसी गांव के बिरगेंद्र सिंह जो चार महीने पहले ही औरंगाबााद कमाने गये थे।

बिरगेंद्र 10वीं फेल थे। गाँव में कोई काम नहीं मिल रहा था, जमीन भी नहीं थी कि खेती कर पाते। बेटी के जन्म के एक साल बाद पत्नी के कहने पर ये कमाने के लिए शहर चले गये ताकि बेटी को पढ़ा लिखाकर कुछ बना सकें।

"कमाने के लिए मैंने ही भेजा था, पर मैं नहीं जानती थी कि ये सब हो जाएगा। अब पछता रही हूं।" पति को शहर भेजने के लिए पुष्पा खुद को कोस रही हैं।

पुष्पा अपने पति बिरगेंद्र के आखिरी शब्द याद कर रही थीं जो निकलने से पहले सात मई की शाम को उन्होंने पुष्पा से कहे थे, "हम निकल चुके हैं, भुसावल से ट्रेन मिलेगी। हम वहीं जा रहे हैं, एक दो दिन में घर आ जाऊंगा। अब फोन मत करना, बैटरी चार्ज नहीं है।"

गाँव की सरपंच ने जब 10 बजे के आसपास पुष्पा को बिरगेंद्र के मौत की खबर दी। सरपंच के शब्दों पर पुष्पा को भरोसा ही नहीं था, तुरंत उसने अपने पति को फोन किया तो फोन बंद था।

"जब उनका फोन बंद मिला तो मुझे भरोसा हो गया। मेरे पति के साथ उनके बड़े भाई और उनका चचेरा भाई प्रदीप भी आ रहा था, प्रदीप (22 वर्ष) भी नहीं बचा।"

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शहडोल में मृतकों के घर पहुंची स्थानीय पुलिस।

औरंगाबाद के जालना से शहडोल की दूरी लगभग 850 किलोमीटर है। बिरगेंद्र जालना की एक सरिया कंपनी में लोहा पीटने का काम करते थे। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सरकार ने सभी मृतकों को 5-5 लाख रुपए देने की घोषणा की है।

ममान ग्राम पंचायत की सरपंच भागवती बैग गाँव कनेक्शन को बताती हैं, "पैसे तो खत्म हो जाएंगे। मेरी मांग है कि मृतक के घर वालों को नौकरी मिले जिससे उन्हें आने वाले समय में दिक्कत न हो।"

इस ट्रेन हादसे में बिरगेंद्र के बड़े भाई वीरेंद्र सिंह (25) इसलिए बच गये क्योंकि वो पटरी के किनारे लेटे थे।

वीरेंद्र सिंह गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "सभी लोग थक गये थे। हमने सोचा कि ट्रेन तो आयेगी नहीं, थोड़ा आराम कर लेते हैं। कुछ लोग पटरी पर ही सो गये और कुछ लोग किनारे। अभी सोये हुए कुछ ही देर हुआ था कि ट्रेन आ गई। उसके बाद जितने लोग पटरी पर सोये थे हम उन्हें पहचान भी नहीं पा रहे थे।"

वीरेंद्र सिंह सात मई की शाम करीब सात बजे 20 लोगों के साथ अपने-अपने गाँव के लिए निकले थे।

अपने साथियों के बीते रात के वाकया वीरेंद्र सिंह बता रहे थे, "हमें पता था कि रास्ते में खाने की दिक्कत होगी इसलिए हमने रोटी और अचार रख लिया था। रातभर चलते रहे। कुछ लोगों को नींद भी आ रही थी। समय यही सुबह के चार बज रहे थे। तब हमें यह नहीं पता था कि हम किस जगह है लेकिन बहुत देर से रेल की पटरी के किनारे चल रहे थे। अब घर जाकर पता नहीं क्या जवाब दूंगा।"

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शिव दयाल सिंह की फाइल फोटो।

ममान ग्राम पंचायत के गांव ममान के मुनीम सिंह (28) और नेम सहाय सिंह भी इन्हीं लोगों के साथ आ रहे थे। मुनीम सिंह के चाचा अर्जुन सिंह गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "कल शाम को जब मुनीम से बात हुई थी उसके बताया कि हम जल्दी घर आने वाले हैं, लेकिन यह नहीं पता था कि वह पैदल ही घर आने लगेगा। घर में उसकी बीवी और दो बच्चे हैं। तीन भाइयों में वही कमाने वाला था। पिता हैं नहीं, मां बीमार रहती हैं। अब पता नहीं आगे क्या होगा?"

अर्जुन सिंह इस ट्रेन हादसे में मरे अपने भतीजे के परिवार की आप बीती बता रहे थे।

इस रेल हादसे में उमरिया जिले के धर्मेंद्र सिंह (20), निर्बेश सिंह (20), धन सिंह (25), राज भवन, शिव दयाल सिंह, बुधराज सिंह, अचेलाल और रविंद्र सिंह की मौत हो गई है। जिनके परिवारों की तकलीफें भी इन्ही परिवारों से मिलती-जुलती होंगी।

घटना पर रेल मंत्रालय ने कहा, 'आज सुबह कुछ मजदूरों को ट्रैक पर देखकर मालगाड़ी के लोको पायलट ने ट्रेन को रोकने की कोशिश की लेकिन उन्हें परभणी-मनमाड सेक्शन के बदनपुर और कर्माड स्टेशनों के बीच उन्हें टक्कर लग गई। घायलों को औरंगाबाद सिविल अस्पताल ले जाया गया है। जांच के आदेश दे दिए गए हैं।"

औरंगाबाद में जहां हादसा हुआ वहां की फोटो। सामान बिखरा हुआ है, पटरी पर रोटियां भी हैं जो मजदूर रास्तें में खाने के लिए लेकर निकले थे।

कोरोना महामारी से लोगों की जान बचाने के लिए लगभग पूरा देश बंद है। इसी बंदी (लॉकडाउन) में लाखों वे लोग भी फंसे हैं, उनके लिए वहां रहना संभव नहीं है। प्रवासी कामगारों, मजदूरों की वापसी पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में है। श्रमिक स्पेशल ट्रेन चली हैं, बसें चलाई गईं हैं, लेकिन इन सबके बीच एक रिपोर्ट में सामने आया है कि लॉकडाउन के कारण अब तक 300 से ज्यादा मौतें ऐसी हुई हैं जो कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं थे, जिन्हें बचाया जा सकता था।

तकनीकी जानकारों की एक निजी वेबसाइट thejeshgn.com लॉकडाउन के दौरान हो रही मौतों के आंकड़े पहले दिन से ही जुटा रही है। इनके अनुसार लॉकडाउन की वजह से देश में अब तक कुल 338 मौतें ऐसी हुई हैं जिन्हें कोरोना नहीं था। ये आंकड़े देशभर की मीडिया रिपोर्टस को लेकर तैयार किये गये हैं।

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