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क्या ये टिड्डी हमलों को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाने का सबसे सही वक्त नहीं है?

किसान संगठनों की ओर से अब यह सवाल सरकार से किया जा रहा है क्यों ना अब सिर्फ टिड्डियों को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए और जो भी नियम, नीति पहले से बने हुए हैं उन्हें संशोधित किया जाए? अगर यह नीति बनती है तो टिड्डी नियंत्रण और किसानों को होने वाले नुकसान की सही भरपाई की जा सकती है।

Madhav SharmaMadhav Sharma   31 July 2020 6:29 AM GMT

क्या ये टिड्डी हमलों को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाने का सबसे सही वक्त नहीं है?

पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना वायरस से लड़ रही है। क्या आम और क्या खास कोरोना वायरस से सभी वर्ग प्रभावित हैं, लेकिन राजस्थान सहित गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा सहित कई अन्य राज्यों का किसान वर्ग कोरोना के साथ-साथ अब तक की सबसे बड़ी मुसीबत से भी जूझ रहा है।

इस मुसीबत का नाम टिड्डी है जो बीते एक साल से ज्यादा वक्त से राजस्थान खासकर पश्चिमी जिलों के किसानों के लिए कोरोना से भी घातक बना हुआ है। टिड्डी हमलों को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और इस बार खरीफ सीजन से पहले हुए टिड्डी हमले ने पूरे देश को ही अपनी चपेट में ले लिया था। आज भी देश के अलग-अलग जिलों में ये हमले जारी हैं। इन हमलों में भोपाल, लखनऊ, जयपुर और देश की राजधानी दिल्ली भी शामिल है। हालांकि बीते पांच दिन से यूपी में टिड्डियों के हमले नहीं हुए हैं।

पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर, बाड़मेर और जैसलमेर के सरहदी इलाकों में टिड्डी फिलहाल प्रजनन कर रही हैं और इससे आने वाले समय में खतरा और बढ़ता दिख रहा है। साथ ही प्रदेश के 33 में से 32 जिलों में टिड्डी किसानों के लिए मुसीबत बनी हुई हैं। मुसीबत की गंभीरता को किसान काफी पहले ही समझ गए थे और उन्होंने इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग सरकार से की। बाद में कई राजनीतिक दलों ने भी सोशल मीडिया पर टिड्डी हमलों को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की। इनमें राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल के हनुमान बेनीवाल सबसे आगे रहे। उन्होंने केन्द्र और राज्य सरकार पर लगातार दवाब बनाया। राजस्थान सरकार ने भी राष्ट्रीय आपदा घोषित करने को लेकर केन्द्र को पत्र लिखा है, लेकिन इस संबंध में केन्द्र की ओर से अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है।

केन्द्र के रवैये से नाराज किसान संगठनों की ओर से अब यह सवाल सरकार से किया जा रहा है क्यों ना अब सिर्फ टिड्डियों को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए और जो भी नियम, नीति पहले से बने हुए हैं उन्हें संशोधित किया जाए? अगर यह नीति बनती है तो टिड्डी नियंत्रण और किसानों को होने वाले नुकसान की सही भरपाई की जा सकती है।

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टिड्डियों से हुए नुकसान का मुआवजा अब तक एनडीआरएफ (नेशनल डिजास्टर रिलीफ फंड) और एसडीआरएफ (स्टेट डिजास्टर रिलीफ फंड) के जरिए किसानों को सिर्फ दो हेक्टेयर तक ही फसल खराब होने तक का दिया जा रहा है, जोकि महज 27 हजार रुपए होता है। किसानों की मांग है कि दो हेक्टेयर की सीमा को बढ़ा कर जितना नुकसान हो रहा है वो दिया जाए। किसानों का मानना है कि टिड्डियों से हुए नुकसान का दायरा इतना बड़ा है कि अब विशेष रूप से इसके लिए एक नीति निर्धारण की जरूरत महसूस होने लगी है

राजस्थान कृषि विभाग के मुख्य सचिव कुंजीलाल मीणा से इस संबंध में जब गांव कनेक्शन ने बात की तो उन्होंने सारी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होने की बात कही। उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरफ से केन्द्र सरकार को टिड्डी हमलों को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग लॉकडाउन के समय ही कर दी, लेकिन उस पर केन्द्र की ओर से कोई फैसला नहीं लिया गया है।"

वे आगे कहते हैं, "टिड्डी नियंत्रण के लिए जो भी संभव हो सकता है वो उपाय किए गए हैं, नई नीति की जरूरत है या नहीं ये तो राज्य और केन्द्र सरकारों के ऊपर निर्भर करता है।"

वहीं, किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट टिड्डी नियंत्रण एवं मुआवजा नीति की सख्त जरूरत बताते हैं। वे कहते हैं, "कोरोना वायरस के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान कुछ ही दिनों में पूरे देश के हर वर्ग की माली हालत खस्ता हो हो गई। राजस्थान का किसान टिड्डियों का हमला पिछले एक साल से लगातार झेल रहा है तो सोचिए उसकी स्थिति क्या होगी? किसानों का कोई आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन केन्द्र की किसान सम्मान योजना में राजस्थान के 60 लाख किसान रजिस्टर्ड हैं और फिलहाल 32 जिले टिड्डी से प्रभावित हैं तो यह स्पष्ट है कि राजस्थान के लगभग सभी किसान टिड्डी हमले से प्रभावित हुए हैं और उन्हें नुकसान हुआ है। इसीलिए राज्य सरकार, केन्द्र सरकार या फिर दोनों को मिलकर इससे संबंधित एक नीति या कानून पर काम करना होगा वरना पहले से कई मुसीबतों के मारे किसान ये मुसीबत नहीं झेल पाएंगे।"


रामपाल सुझाव देते हुए आगे कहते हैं, "फिलहाल किसानों को सरकारी मदद कई चैनलों से होकर जाती है, मसलन, टिड्डी हमले का मुआवजा एसडीआरएफ देता है। फसल बीमा का भुगतान कृषि विभाग के कृषि कल्याण कोष से होता है। अगर सरकार सहायता का माध्यम एक बना दे तो इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और फंड भी इकठ्ठा होगा। इसके साथ ही टिड्डी नियंत्रण व मुआवजा कोष का गठन भी किया जा सकता है जिससे किसानों की आर्थिक मदद हो।"

बाड़मेर के एक किसान ताज मोहम्मद नुकसान और मुआवजे की सच्चाई बयां कर रहे हैं। ताज बताते हैं कि पिछले साल मई से लेकर अब तक सैकड़ों बार टिड्डियों का हमला हुआ है। अभी भी ये हमला जारी है, लेकिन किसानों को सिर्फ एक बार ही 13500 रुपए प्रति हेक्टेयर (दो हेक्टयर तक) ये मुआवजा मिला है। हमारी जीरा, ईसबगोल, अरंडी की फसल रबी सीजन में खराब हुई। इस बार तो किसानों ने टिड्डी हमलों के डर से अब तक बुवाई ही नहीं की है, जहां की गई है उसे भी टिड्डियों ने बर्बाद कर दिया है।

कृषि विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले रबी सीजन में अलग-अलग जिलों में जीरे की प्रति हेक्टेयर लागत 36 हजार से लेकर 48 हजार रुपए तक थी जबकि एनडीआरएफ के माध्यम से किसानों के प्रति हेक्टेयर सिर्फ 13500 रुपए ही मुआवजा मिला है जोकि नाकाफी साबित हुआ है। रबी सीजन में टिड्डियों ने सबसे ज्यादा नुकसान जीरे की फसल को ही पहुंचाया था। हाल ही में हुए टिड्डी हमलों में चारे, सब्जी की फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

राजस्थान कृषि विभाग में आयुक्त ओमप्रकाश गांव कनेक्शन से इस संबंध में विस्तार से बात करते हैं। नीति निर्धारण को लेकर ओमप्रकाश कहते हैं, "हमने पिछले टिड्डी हमले से काफी कुछ सीखा है। इसीलिए इस बार हमने हर एक जिला का प्लान बनाया है। टिड्डी नियंत्रण के लिए अपने संसाधनों के अलावा किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों की लिस्ट बनाई है, इस तरह पिछली बार से हमने इस बार संसाधनों का बेहतर उपयोग सीखा है।"

वे आगे बताते हैं, "कृषि विभाग एक एप डेवलप कर रहा है उसमें टिड्डियों के प्रजनन, अंडे देने जैसी जानकारियां रहेंगी तो इससे उन्हें कंट्रोल करने में काफी आसानी हो जाएगी। इसके अलावा राजस्थान की सभी 6 कृषि यूनिवर्सिटी को लगातार हो रहे टिड्डी हमले, जलवायु परिवर्तन की वजह से इनका व्यवहार परिवर्तन सहित कई तरह के शोध के लिए जोड़ा है। हमने इन यूनिवर्सिटीज को बोला है कि केमिकल छिड़काव के अलावा टिड्डी नियंत्रण के दूसरे तरीके भी विकसित करने की ओर बढ़ा जाए।"

ओमप्रकाश इन कामों को नीति निर्धारण से ही जोड़कर देखते हैं। साथ ही वे कहते हैं कि केन्द्र सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और प्रयास करने चाहिए ताकि इस समस्या से जूझ रहे किसानों को जल्द राहत मिल सके।

क्या प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई पहल कर सकते हैं?

जानकार कहते हैं कि टिड्डी एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है और इसका समाधान भी उसी स्तर पर होना चाहिए. जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना से लड़ने के लिए दुनिया के 8 विकासशील देशों को एकजुट करने और उसमें 10 मिलियन डॉलर का योगदान दिया। उसी तरह पीएम मोदी को टिड्डी हमले से प्रभावित देशों का समूह बनाकर एक अंतरराष्ट्रीय कोष की स्थापना करनी चाहिए।

रामपाल जाट का कहना है कि केन्या, इथोपिया, सोमालिया, ईरान, पाकिस्तान जैसे टिड्डी प्रभावित देशों को एक साथ आना चाहिए. टिड्डी हमलों से हो रहे आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए एक अंतरराष्ट्रीय कोष की स्थापना करनी चाहिए और इस काम की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर सकते हैं। इन प्रभावित देशों के करोड़ों किसानों की मदद का इससे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता। साथ ही टिड्डियों से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संसाधनों की कमी भी नहीं आएगी।

हालांकि बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. अनिल छंगानी टिड्डियों को लेकर बनी नीतियों की पालना में कमी होने की बात करते हैं। वे कहते हैं, "साल 1993 में हुए टिड्डी हमलों में सभी देशों ने एक-दूसरे के साथ सारी सूचनाएं साझा की। उस वक्त भी हेलीकॉप्टर से केमिकल छिड़काव किया गया था। लेकिन अभी सभी देश कुछ ना कुछ सूचनाएं छिपा रहे हैं इससे नियंत्रण में परेशानी हो रही है। हर देश अकेला होकर इस अंतरराष्ट्रीय समस्या से लड़ रहा है। मुआवजे को लेकर भी नियम हैं, लेकिन उनकी पालना में कोताही बरती जा रही है। सबसे बड़ी समस्या विभागों के पास स्टाफ की कमी है। इससे ग्राउंड की सूचनाएं नहीं मिल पा रही और समस्या खड़ी हो रही है।


दूसरे देशों में भी हालात खराब

दुनिया के कई देश टिड्डी हमलों से जूझ रहे है। अफ्रीकी देश कीनिया में 70 साल में सबसे भीषण अटैक हुआ है। वहां फसल और वनस्पतियां खराब होने से भुखमरी जैसे हालात पैदा होने लगे हैं। सोमालिया में राष्ट्रीय आपात घोषित किया जा चुका है तो पाकिस्तान में भी टिड्डियों को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया गया है। भारत को टिड्डियों से दो तरफा नुकसान है। पहला देश में ही प्रजनन और दूसरा पाकिस्तान और ईरान से आने वाले टिड्डी दल। अंतरराष्ट्रीय संगठन कह रहे हैं कि भारत के हालात आगे चलकर कैसे होंगे ये काफी कुछ पाकिस्तान और ईरान में टिड्डी नियंत्रण पर भी निर्भर करेगा। हाल ही में भारत ने ईरान को टिड्डी नियंत्रण के लिए 25 मीट्रिक टन मैलाथियान (95 फीसदी यूएलवी) भेजा है।

खाद्य सुरक्षा के सवाल पर टिड्डी नियंत्रण संगठन (एलडब्ल्यूओ) के जोधपुर स्थित मुख्यालय में उपनिदेशक के. एल गुर्जर कहते हैं, "क्योंकि टिड्डियों का प्रजनन चालू है इसीलिए इस सीजन में अभी और हमले हो सकते हैं। टिड्डियां उड़ेंगी तो खरीफ की फसलों को नुकसान भी होगा। खाद्य सुरक्षा की समस्या तो है ही, इसीलिए इसे डिजास्टर मैंनेजमेंट की तरह लेना चाहिए। हालांकि हमारे यहां सोमालिया या कीनिया जैसे हालात नहीं हो सकते क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर बड़े पैमाने पर टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रम चला रही हैं।"


अभी क्या है स्थिति?

मई 2019 से फरवरी 2020 तक टिड्डियों का हमला लगातार पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर तक होता रहा। इसके बाद 11 अप्रेल से पश्चिमी जिले जैसलमेर और उत्तर के श्रीगंगानगर होते हुए एक बार फिर टिड्डियों ने हमला बोला है। इस बार टिड्डी स्वार्म इतनी बड़ी संख्या में हैं कि देखते-देखते प्रदेश के सभी जिलों सहित कई राज्यों में भी फैल गए हैं। राजस्थान में 28 जुलाई तक टिड्डी हमलों से 5,13064 हेक्टेयर भूमि प्रभावित हुई है। इसमें से करीब एक लाख हेक्टयर कृषि भूमि है। हालांकि ये आंकड़ा हकीकत में बहुत ज्यादा है।

नुकसान का आंकलन नहीं होने के कारण सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। राजस्थान कृषि विभाग और टिड्डी नियंत्रण संगठन ने 3,91,255 हेक्टेयर भूमि पर ही केमिकल स्प्रे किया है। संगठन के हालिया जारी बुलेटिन के अनुसार बीकानेर, बाड़मेर और जोधपुर में टिड्डी प्रजनन भी कर रही हैं जो बेहद चिंता की बात है। संगठन के सर्वे किए 913 स्थानों में से सिर्फ 415 पर ही नियंत्रण कार्य पूरा हुआ है। इसके अलावा दो हेलीकॉप्टर और 23 ड्रोन भी टिड्डी नियंत्रण में लगे हुए हैं।

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