ग्राउंड रिपोर्ट: एंबुलेंस से नहीं, खाट और नाव के सहारे पहुंचते हैं अस्पताल

बाराबंकी के इस गांव के लोगों की नाव के सहारे चलती है जिंदगी, गाँव तक पहुंचने के लिए नाव एक मात्र सहारा है ,गाँव से 9 किलोमीटर दूर है अस्पताल

बाराबंकी। " रात को अगर कोई बीमार पड़ जाता है तो सुबह तक इंतजार करना पड़ता है। इस दौरान वह मर ही क्यों न जाए, हम कुछ कर नहीं सकते। सुबह होने पर मरीज को खाट या साइकिल पर लादकर नदी तक जाते हैं, फिर नाव के सहारे नदी पार कर अस्पताल पहुंचते हैं।" ये कहना है यूपी के जनपद बाराबंकी के गाँव परसावल निवासी लालमती देवी का।

यूपी की राजधानी से मात्र 95 किलोमीटर दूर बाराबंकी के इस गाँव में पहुंचने के बाद लगता है हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं। आज भी इस गाँव तक पहुंचने का नाव एक मात्र साधन है। दो नदियों के बीच बसे इस गाँव के ग्रामीण रोजाना नाव से लोग अपनी जिंदगी की नैय्या पार करते हैं। छोटी से छोटी चीजों के लिए मीलों का लंबा सफर तय करना पड़ता है।

गाँव तक पहुंचने के लिए सिर्फ नाव ही सहारा है।

घाघरा नदी के किनारे बसा परसावल गाँव आज भी सड़क, बिजली, शौचालय, अस्पताल और स्कूल जैसी मूलभूत जरुरतों से कोसों दूर है। गाँव के बच्चे पढ़ने नहीं जाते, क्योंकि गाँव में स्कूल नहीं है। इस गाँव से करीब 9 किलोमीटर दूर टिकैतनगर में अस्पताल है। बीमार को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं बल्कि, खाट और नाव का सहारा लेना पड़त है।

बाढ़ की वजह से ग्रामीण नहीं बनाते हैें पक्का मकान।


लालमती आगे बताती हैं," ठीक से याद नहीं है, लेकिन बरसात का मौमस था। मेरे बेटे को बुखार था। शाम का वक्त था और जोर से बारिश हो रही थी। नदी भी उफान पर थी। लेकिन हम मजबूर थे। घर से 9 किलोमीटर दूर टिकैतनगर में अस्पताल है। रात भर बीमार बेटे को गोद में लिए सुबह का इंतजार करती रही, लेकिन सुबह होने के पहले ही मेरे कलेजे के टुकड़े की सांस थम गई। मैं मजबूर थी, कुछ कर नहीं सकी।" इतना कहते-कहते लालमती की आंख नम हो गई।

गाँव मेें न तो सड़क है और न ही बिजली।

ये दर्द सिर्फ लालमती की नहीं है, बल्कि उसकी जैसी दर्जनों मां की है, जो अपनों के बीमार होने पर अपनी किस्मत को कोसते हैं। यहां के लोग हर रोज जिंदगी की जददोजहद से जूझ रहे हैं। बाढ़ के वक्त इनकी जिंदगी एक नदी के बंधे पर एक तीरपाल में सिमट जाती है। नदी का पानी पीकर प्यास बुझाने को मजबूर इन ग्रामीणों की सुध लेने कोई नेता यहां नहीं पहुंचता।

मूलभूत जरुरतों से जूझ रहे हैं ग्रामीण।

इसी गाँव के रहने वाले नरेंद्र कुमार (30वर्ष) ने बताया, " हर साल हमारा घर बाढ़ में बह जाता है। बाढ़ आने पर हम लोग बंधे पर चले जाते हैं। करीब 3 महीने हमारी जिंदगी बंधे पर बीतती है। मैं बता नहीं सकता किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पीने के लिए साफ पानी मयस्सर नहीं होता। नदी का गंदा पानी पीकर जिंदा रहना पड़ता है। कई बार हमारे बच्चे गंदे पानी की वजह से बीमार पड़ जाते हैं। लेकिन हम मजबूर रहते हैं, कहां ले जाएं।"

हर साल बाढ़ के बाद ग्रामीण शुरू करते हैं नई जिंदगी।

परसावल की रहने वाली रजनी (25वर्ष) की शादी गोंडा जिले के जरवल में हुई है। मायके के मुश्किल पलों के बारे में पूछने पर बताया, " भइया, अब क्या-क्या बताए किन-किन मुश्किलों का सामना किया है हमने बचपन में। मुझे याद है एक बार भयंकर बाढ़ आई थी। अम्मा-बाबू जी हम सभी भाई-बहनों को लेकर बंधे पर चले गए थे। एक पन्नी में करीब दो महीने बिताए थे। न पीने को पानी मिलता था और न खाने को कुछ। पूरा दिन कुछ खाए-पीए हम लोग काट देते थे। बरसात के मौसम में हर भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कोई बीमार न हो। नहीं तो अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसकी जान चली जाएगी।"

गाँव में कोई स्कूल नहीं होने से बच्चे नहीं जाते पढ़ने।

इसी गाँव के रहने वाले सुखराम (60वर्ष) ने बताया, " हर रोज हम लोग जिंदगी की जंग लड़ते हैं। रोजमर्रा की छोटी से छोटी चीज को खरीदने के लिए 9किलोमीटर दूर टिकैतनगर जाना पड़ता है। पहले दो कोस पैदल चलो, फिर घंटों नाव का इंतजार करो। तब जाकर बाजार पहुंच पाते हैं।लेकिन सबसे ज्यादा परेशान तब होती है जब कोई बीमार पड़ जाता है। अगर किसी की तबियत खराब हो जाये, चाहे वह गर्भवती महिला हो या गंभीर मरीज उसे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए खाट पर लादकर ले जाना पड़ता है। पगडंडियों से होकर कई किलोमीटर पैदल सफर कर नदी तक पहुंचते हैं फिर नाव से नदी पार कर अस्पताल लेकर जाते हैं।"

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