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दिल्ली की एक लड़की जिसने जैकलीन व लीज़ा सहित कई विदेशियों को सिखाई है हिंदी

जैकलीन फर्नांडिस मूलरुप से श्रीलंका की रहने वाली हैं, लेकिन फर्राटेदार हिंदी बोलती हैं.. उन्हें हिंदी सिखाई है दिल्ली की 24 साल की पल्लवी ने। वो सिर्फ जैकलीन ही नहीं कई दूसरे अभिनेता-अभिनेत्रियों और कई सेलेब्रेटी को हिंंदी सिखा चुकी हैं.. पल्लवी के बारे में विस्तार ये यहां पढि़ए..

किसी कैफ़े में कुछ युवाओं को मस्ती करते हुए, कुछ को लैपटॉप पर काम करते हुए या पढ़ते हुए देखना एक आम बात है। लेकिन किसी दिन आपको कैफ़े के एक कोने में 24 साल की एक लड़की कुछ विदेशियों को हिंदी सिखाती दिखाई पड़े तो नज़ारा कुछ ख़ास हो जाता है और यह नज़ारा इन दिनों दिल्ली के किसी कैफ़े, ऑफ़िस या पार्क में आपको दिख जाएगा।

करियर क्या होगा?

जिस उम्र में करियर की दो राह पर खड़े युवा अपना लक्ष्य तय कर रहे होते हैं, उस उम्र में पल्लवी ने अपने जीवन को एक ऐसे उद्देश्यपूर्ण काम में लगा लिया। तब पल्लवी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ती थीं। 2012 में बीटेक की पढ़ाई पूरी होने वाली थी, लेकिन भविष्य को लेकर अब तक कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं बन पाई थी कि करियर क्या होगा। अपनी संतुष्टि के लिए कुछ विदेशी छात्र-छात्राओं को बोलचाल की हिन्दी जरूर सिखा दी थी।

यह प्रस्ताव था हिन्दी सिखाने का

आगे मनोविज्ञान की पढ़ाई करने का मन हुआ तो पहुंच गई मुंबई के सोफिया कॉलेज फॉर वूमन में। लेकिन वह पढ़ाई भी करियर का आधार नहीं बन पाई। पर, मुंबई स्थित अमेरिकी कॉन्सुलेट से आए एक प्रस्ताव ने करियर की तस्वीर साफ कर दी। यह प्रस्ताव था हिन्दी सिखाने का और पल्लवी बन गईं हिन्दी ट्यूटर। आज वह सेलिब्रिटी विदेशियों की हिन्दी ट्यूटर के रूप में एक खास पहचान रखती हैं।

बॉलीवुड एक्ट्रेस जैकलीन फर्नांडिस, लीजा रे कुछ ऐसे ही नाम

पल्लवी फोन पर बातचीत के दौरान बताती हैं, "जैसे हम भारतीयों के लिए कोई विदेशी भाषा बोलना मुश्किल भरा होता है, वैसे ही विदेशी लोगों के लिए भारत आकर हिंदी बोलना भी कठिन होता है।" आज पल्लवी की क्लाइंट लिस्ट में देश-विदेश की कई मशहूर हस्तियां हैं। बॉलीवुड एक्ट्रेस जैकलीन फर्नांडिस, लीजा रे कुछ ऐसे ही नाम हैं।

या तो डॉक्टर बनो या इंजीनियरिंग करो

इंजीनियरिंग और साइकोलॉजी की पढ़ाई के बाद हिन्दी ट्यूटर के रूप में करियर बनाने का निर्णय भले ही एक संयोग की तरह सामने आया, लेकिन इस काम में उनकी रुचियां और अनुभव शामिल थे। पल्लवी गाँव कनेक्शन को बताती हैं, "हमारे यहां अभिभावक अपने बच्चे को करियर चुनने की आजादी कम ही देते हैं। मेरे सामने भी यही स्थिति थी। या तो डॉक्टर बनो या इंजीनियरिंग करो या फिर बैंकिंग सेक्टर/रेलवे आदि में जाओ। मम्मी-पापा दोनों सरकारी सेवा में थे। उन्होंने तय किया कि मैं इंजीनियरिंग कर लूं। इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्यूनिकेशन में बीटेक 2008 में प्रवेश ले लिया।”

तब हिन्दी का ट्यूशन देना शौकिया था

वह आगे बताती हैं, “2011 में डीयू के कुछ ऐसे अफ्रीकन छात्र/छात्राओं से सामना हुआ, जो दैनिक जरूरत के लिए थोड़ी हिन्दी सीखना चाहते थे। डीयू की तरफ से इसकी व्यवस्था नहीं हुई, मैंने उन्हें हिन्दी सिखाई। तब हिन्दी का ट्यूशन देना शौकिया था। लेकिन करियर के लिए मन में आया कि साइकोलॉजी की पढ़ाई की जाए। डीयू में एडमिशन नहीं मिला तो मुंबई जाने का निर्णय लिया। वहां सोफिया कॉलेज फॉर वूमेन में प्रवेश मिल गया।"

फाइनेंशियल क्राइसिस से बचने की तैयारी कर लें

पल्लवी कहती हैं कि, "जो काम पसंद आए, वही करना चाहिए, लेकिन उसके लिए प्लानिंग जरूरी है। पल्लवी का मानना है कि जब आपको पता हो कि प्रोफेशन चेंज करना है, तो उसकी फाइनेंशियल तैयारी भी पहले से ही शुरू कर देनी चाहिए।मैं ग्रेजुएशन सेकेंड ईयर में ही समझ चुकी थी कि मुझे इंजीनियरिंग के प्रोफेशन में नहीं रहना। ऐसे में मैंने बतौर ट्यूटर काम करना शुरू कर दिया था।"

कैसे सिखाती हैं और कितना समय लगता है

पल्लवी बताती हैं, "कितना समय लगेगा, यह निर्भर करता है सीखने वाले पर। अगर किसी को इतनी हिन्दी सिखानी है कि वह सामने वाले की बातों को समझ जाए और कुछ खास शब्द बोल भी पाए तो इसमें पांच से 10 घंटे लगते हैं। कोई हिन्दी बोलना चाहता है तो उसे 30-35 घंटे का समय दिया जाता है। कोई उससे भी ज्यादा सीखना चाहता है तो उसे साहित्य से जोड़ा जाता है। फ्लैश कार्ड की सहायता से अपने स्टूडेंट्स को मनोरंजक तरीके से हिन्दी सिखाकर मुझे मजा भी आता है और आंतरिक संतुष्टि भी मिलती है। आंतरिक संतुष्टि इस बात की कि आईआईटी या आईआईएम वाली ब्रांडिंग नहीं हो पाई तो क्या, आज अपनी एक अलग पहचान तो मैंने बना ली है।"

हिंदी सिखाने के लिए करनी पड़ी तैयारी

पल्लवी बताती हैं, "हिन्दी में मेरी रुचि थी। बाजार से कुछ किताब लेकर आई, लेकिन उनमें ऐसी हिन्दी नहीं थी, जिसे बातचीत की हिन्दी कहा जाए। मुझे अपनी अंग्रेजी सुधारनी पड़ी। उसके बाद मैंने बेसिक मॉड्यूल बनाया और विदेशी टूरिस्टों को व अन्य जरूरतमंदों को हिन्दी सिखाने लगी। 2014 के अंत में मेरी साइकोलॉजी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। उसके बाद मिले ब्रिटेन के लेखक विलियम डालरिम्पल। वे छह महीने भारत में और छह महीने लंदन में रहते हैं। उन्हें हिन्दी सिखाने का मौका मिला। 2015 में जैकलीन फर्नांडीस को हिन्दी सिखाई। इसके साथ ही काफी विदेशी महानुभाव,राजदूत, मॉडल, गायक, पर्यटकों को हिन्दी सिखाई। आज जब मेरे छात्र मुझे हिंदी का सबसे शानदार टीचर कहते हैं तो सच कहूं तो मुझे यह सुनकर बेहद संतोष होता है।"

समझ पाई भाषा के इस्तेमाल की बेचैनी

पल्लवी बताती हैं ,"भाषा सीखने और उसके इस्तेमाल की बेचैनी मैं समझ रही थी। उन विदेशियों के साथ भी यह समस्या थी कि स्थानीय भाषा कैसे सीखें। चाहे टैक्सी वाले से बात करनी हो या सब्जी वालों से, हिन्दी जरूरी होती है। इसी काम के लिए मुंबई स्थित अमेरिकन दूतावास में वहां के स्टाफ और उनके परिवार वालों को हिन्दी सिखाने का मौका मिला। फिर लगने लगा कि इसी काम को करियर बनाना बेहतर है।"

बचपन से ही था हिंदी भाषा के प्रति रुझान

पल्लवी ने बताया , "मैंने हिंदी भाषा का बचपन से आनंद उठाया है। मेरा घर में चम्पक, नंदन, बिल्लू, चाचा चौधरी और पिंकी जैसी कॉमिक्स पढ़ने के लिए आती थी।गर्मियों की छुट्टियों में मैं इन कॉमिक्स को एक ही दिन में पढ़ने का प्रयास करती थी। मुझे मेरे हिंदी पीरियड्स भी बहुत पसंद थे।जब बाकी बच्चे “जीरो-काँटा” खेलकर अपना समय बर्बाद करते थे, मैं बहुत रूचि के साथ कबीर के दोहे पढ़ती थी।"

हिंदी पढ़ाने की टेक्निक्स

पल्लवी ने बताया," मैं अपनी क्लासेस में हास्य का प्रयोग करती हूँ ताकि मेरे विद्यार्थियों को पढ़ने में आनंद आए। मेरे सभी विद्यार्थी वयस्क हैं जो अक्सर अपनी ही चिंताओं और मुद्दों से जूझ रहे होते हैं तो इसलिए मेरे लिए अनिवार्य है कि मैं इस तरीके से हिंदी पढ़ाऊँ जिससे क्लासेस उनके दिन का वो हिस्सा बन जाये जिसका वो दिन में इंतज़ार करते हो।मैं कोशिश करती हूँ की उनको हिंदी इस प्रकार सिखाऊ जिससे वह अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में उसका प्रयोग कर सके।"

किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा

पल्लवी आगे बताती हैं, "चुनौतियाँ थी और हमेशा रहेंगी। मुझे पता था की मुझे एक इम्युनिटी बनाने पड़ेगी ताकि मैं उन पर नियंत्रण रख सकूँ । जब मैंने शुरुआत की, मेरे परिवार और दोस्तों ने मेरे इस काम को गंभीरता से नही लिया। यदि मैं बिज़नस की बात करूँ तो मेरे भी अच्छे और बुरे क्लाइंट्स होते हैं। हमारे समाज में हिंदी अध्यापिका की एक “स्टीरियोटिपिकल छवि” है जिसका मैं पालन नही करती। इसलिए जब लोगों को मेरे विषय में पता चलता है तो वो काफी हैरान हो जाते हैं।"

एक बार जब मैं अपने अफ़्रीकन स्टूडेंट्स को रंगों के नाम हिंदी में बता रही थी तो एक छात्र ने बताया कि अब वो समझा कि लोग उसे ‘कालू’ क्यों कहते हैं। उसने सीख लिया था कि अंग्रेजी के ब्लैक को हिंदी में काला कहते हैं। मुझे बहुत दुःख हुआ और शर्मिंदगी महसूस हुई लेकिन तब मुझे समझ आया कि जो मैं कर रही हूँ, वो इन स्टूडेंट्स के लिए जरूरी है।

उपलब्धियां

पल्लवी की मुम्बई में धमाकेदार शुरुआत तब हुई जब उन्हें अमेरिकी वाणिज्य दूतावास ने कुछ आप्रवासियों को हिंदी सिखाने के लिए संपर्क किया। और तब से पल्लवी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।अब तक पल्लवी भारत में रहने वाले 600 विदेशियों को हिंदी सिखा चुकी हैं।

पल्लवी टेड-एक्स के मंच पर बोल चुकी हैं और राज्यसभा टेलीविजन की सबसे युवा मेहमान हैं, जिन्हें गुफ़्तगू कार्यक्रम में इंटरव्यू किया गया।

उनसे हिंदी सीखने वाले जाने माने लेखक और इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल कहते हैं,"पल्लवी सिंह एक शानदार हिंदी टीचर हैं जो भाषा सिखाने के उबाऊपन या बोझ जिसमें व्याकरण सीखना फिर क्रिया और लिंग जैसी प्रक्रियाओं को मजेदार बना देती हैं।”

इस टेक्नोलॉजी के ज़माने में तमाम एप्लीकेशन हैं जो हिंदी सिखाने का दावा करते हैं, पर पल्लवी का मानना है कि कोई भी टेक्नोलॉजी मानवीय संवादों का स्थान नहीं ले सकती। पल्लवी अपने आपको खुशनसीब मानती हैं कि वे ऐसे वक़्त में पैदा हुईं हैं जब भारत आर्थिक और वैश्विक जगत में तरक्की कर रहा है।

युवाओं को सन्देश पर 26 वर्षीय इंजीनियर से हिंदी शिक्षक बनी पल्लवी कहती हैं,"मेरे पास खोने के लिए बहुत कुछ था, मैं वो कोई भी दूसरा इंसान हो सकती थी जो कुछ नहीं करता। पर मैंने जोखिम उठाया, मुझे लगता है आप जिस काम को प्यार करते हैं उसके लिए आपको भी जोखिम उठाने चाहिए।”

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