वर्ष 2020 में और पड़ सकती है महंगाई की मार, इस साल दिखेगा पिछले साल का असर

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   1 Jan 2020 1:15 PM GMT

वर्ष 2020 में और पड़ सकती है महंगाई की मार, इस साल दिखेगा पिछले साल का असर

"अगर मैं सब मिलाकर कहूं तो 2019 में खाने का सामान 20 से 25 फीसदी तक महंगा हो गया। मेरे यहां उड़द की जो दाल पिछले साल इस समय 69 रुपए किलो थी वो आज 90 रुपए में है। पिछले साल मंडी में आलू इसी समय 8 रुपए किलो था, इस बार 20 रुपए किलो है। 17-18 रुपए वाला गेहं भी 21 रुपए किलो मिल रहा है।" बुंदेलखड के हमीरपुर जिले में रहने वाले आनंद सोनी बताते हैं।

आनंद सोनी (56 वर्ष) के ऊपर 5 लोगों के परिवार की जिम्मेदारी है। वो साइकिल से फेरी लगाकर गांवों में साड़ी और दूसरे कपड़े बेचते हैं। आनंद के मुताबिक अरहर के साथ ही मूंग भी महंगी हुई है। भरुआ सुमेरपुर नगरपंचायत में रहने वाले आनंद बुंदेलखंड के उस हिस्से में रहते हैं जहां पानी की कमी तो है लेकिन दालों की अच्छी पैदावार होती है।

कमाई के बारे में पूछने पर आनंद सोनी बताते हैं, "आजकल मैं औसतन 500 रुपए कमा लेता हूं, पिछले साल भी लगभग इतने रुपए ही कमाई होती थी। शादी के सीजन में कमाई बढ़ जाती तो बारिश में घट भी जाती है, लेकिन औसतन कमाई 500 रुपए ही बैठती है। यानी कमाई तो वैसी ही लेकिन खर्च बढ़ गया है।"

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 10 दिसंबर 2019 को लोकसभा में बताया कि वर्ष 2019 में खाने-पीने की 22 जरूरी चीजों में से 20 के दाम बढ़ गये। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने एक सवाल के जवाब में बताया कि मांग और आपूर्ति में अंतर के चलते खाने-पीने की चीजें महंगी हुई हैं। ये मंत्रालय देश में उपभोक्ता मामलों के साथ-साथ मांग और आपूर्ति पर निगरानी रखता है।

उपभोक्ता मामले विभाग की रिपोर्ट में जिसमें खाने-पीने की चीजों की रिपोर्ट है। साभार- https://loksabha.nic.in/

केंद्रीय मंत्री पासवान ने यह भी कहा कि देश के कई हिस्सों में खराब मौसम के कारण भी दाम बढ़े हैं। वर्ष 2019 में देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई बे-मौसम बारिश के कारण भारी मात्रा में फसलें बर्बाद हुईं जिसका वर्ष 2020 में भी देखने को मिलेगा। मतलब इस साल खाने-पीने की चीजें और महंगी हो सकती हैं।

वर्ष 2019 में अगस्त से नवंबर के बीच हुई बारिश से महाराष्ट्र में उड़द, मक्का, सोयाबीन, ज्वार-बाजरा, प्याज, टमाटर, अंगूर, अरहर की फसल को भारी नुकसान पहुंचा, तो अक्टूबर-नवंबर की बारिश के चलते कई राज्यों में रबी सीजन की कुछ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है।

मध्य प्रदेश में तो लगभग दो महीने लगातार हुई बारिश ने सोयाबीन और उड़द की फसल को बर्बाद कर दिया तो वहीं कर्नाटक में अरहर तो उत्तर प्रदेश में आलू की फसलों को नुकसान पहुंचा है। दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले बुंदेलखंड में उड़द की फसल बर्बाद हुई। महाराष्ट्र और यूपी में फसलें बर्बाद होने के चलते की किसानों ने आत्महत्या तक कर ली थी।

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उपभोक्ता मामले विभाग की वेबसाइट की रिपोर्ट देखेंगे तो साफ पता चलता है कि खाने की किन-किन चीजों की कीमतें बढ़ी हैं। एक जनवरी 2019 को देश में प्याज की औसत कीमत 20 रुपए प्रति किलो थी जो इस समय 80 रुपए प्रति किलो है। खुदरा बाजार में उड़द दाल की कीमतें एक साल पहले (1 जनवरी 2019) को औसतन 70 रुपए प्रति किलो थी जो एक जनवरी 2020 को 102 रुपए प्रति किलो हो गई। प्याज की कीमत दिसंबर 2019 में 200 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई थी।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में बारिश से खराब हुई आलू की फसल।

अरहर और मूंग का भाव भी 15-20 फीसदी चढ़ा है जबकि आलू की कीमतों में 40 फीसदी से भी अधिक की वृद्धि हुई है। चावल और गेहूं भी 10 फीसदी तक महंगा हुआ है।

खुदरा महंगाई दर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। नवंबर 2019 में खुदरा महंगाई दर 4.62 फीसदी से बढ़कर 5.54 फीसदी पर पहुंच गई जबकि अक्टूबर 2019 में यही दर खुदरा मुद्रास्फीति 4.62 फीसदी थी। सितंबर में यह दर 3.99 फीसदी थी। खुदरा महंगाई दर तीन साल में सबसे ऊपर पहुंच गई है। इससे पहले 2016 में खुदरा महंगाई दर 6.07 फीसदी थी।

एक निश्चित अवधि में चुनिंदा वस्तुओं या सेवाओं के मूल्य में जो वृद्धि या गिरावट आती है, उसे मुद्रास्फीति कहते हैं। इसे जब प्रतिशत में व्यक्त करते हैं तो यह महंगाई दर कहलाती है

वरिष्ठ पत्रकार और समाचार पोर्टल मोलतोल के संपादक कमल शर्मा बताते हैं, " नये वर्ष में खाद्य तेलों की कीमतें काफी बढ़ने वाली हैं। मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल बर्बाद हो चुकी है। इसका असर अभी से दिख रहा है। तेलों की कीमत इधर के कुछ महीनों में 10 फीसदी तक बढ़ी हैं।"

"रबी की फसल तो पिछले साल इतनी ही होगी, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन दलहन की फसलें खरीफ में होती हैं जिसकी पैदावार में कमी आई है। ऐसे में दालों की कीमतें रोकने के लिए सरकार को आयात कोटा बढ़ाना होगा। उड़द का कोटा ढाई लाख टन तो अभी बढ़ाना पड़ा है। पहले डेढ़ लाख टन मंगाया था, कुल चार लाख टन उड़द दाल का आयात हो चुका है। मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड में उड़द की लगभग 50 फीसदी फसल बर्बाद हुई है। इसका असर नये साल में दिखेगा।" कमल शर्मा आगे बताते हैं।

वे आगे कहते हैं, " पहले सूखा और फिर भारी बारिश के कारण कर्नाटक और महाराष्ट्र में मूंग की पैदावार बहुत कम हुई है। मूंग के लिए अब पूरा देश राजस्थान पर निर्भर है लेकिन वहां की मंडियों में भी आवक कम हुई है। मूंग की कीमत तभी गिरेगी जब भारत वर्मा से आयात करेगा। तुअर (अरहर) का आयात इस साल की तरह अगले साल भी बढ़ाना पड़ेगा लेकिन और दालों की अपेक्षा इसकी खपत देश में ज्यादा है। ऐसे में तुअर की वजह से किचन का बजट ज्यादा बिगड़ने वाला है।"

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"बात अगर तेलों की करेंगे तो अब सब कुछ सरसों पर निर्भर है। सोयाबीन की फसल पहले ही बर्बाद हो चुकी है। अभी मौसम अच्छा है तो उम्मीद है कि सरसों की पैदावार अच्छी होगी लेकिन सोया तेल तो महंगा होगा।" कमल शर्मा आगे बताते हैं।

एक जनवरी 2019 को देशभर में तुअर दाल की खुदरा औसत मूल्य 70 रुपए प्रति किलो थी जो एक जनवरी 2020 को 85 पर पहुंच गई।

ऑल इंडिया दाल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल बताते हैं, " कर्नाटक और महाराष्ट्र में बारिश के कारण तुअर की फसलें खराब हुई हैं। नये साल की शुरुआत भी खराब मौसम से हुई है। ऐसे में तुअर दाल की कीमतें नये साल में बढ़ेंगी। सरकार को आयात की सीमा भी बढ़ानी होगा, लेकिन हमारे यहां तुअर दाल की खपत ज्यादा है। आम लोगों को दाल के लिए ज्यादा कीमतें चुकानी होंगी।"

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मध्य प्रदेश में इस साल अगस्त और नवंबर के बीच सामान्य से 46 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है। मध्य सरकार के अनुसार खरीफ की 149.35 लाख हेक्टेयर फसल में से 60.52 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान पहुंचा है और इससे 55.36 लाख से ज्यादा किसान प्रभावित हुए हैं।

मध्य प्रदेश के हरदा में बारिश के पानी में डूबी सोयाबीन की फसल।

वर्ष 2019 में देशभर में 113.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयीबन की खेती हुई। इसमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 48 फीसदी (55.160 हेक्टेयर) है। इसके बाद महाराष्ट्र में 39.550 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुआई हुई। राजस्थान में 10 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की बोवनी हुई। ये तीन राज्य मिलकर देश का 90 फीसदी सोयाबीन का उत्पादन करते हैं और तीनों राज्यों में भारी बारिश की वजह से फसलें बर्बाद हुई हैं। इसी को देखते हुए सोयाबीन प्रोसेसर्स एशोसिएशन (सोपा) ने देश में सोयाबीन का उत्पादन 18 फीसदी तक कम होने का अनुमान है।

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चालू कटाई सीजन में भारत का कुल सोयाबीन उत्पादन 90 लाख टन है जबकि पिछले वर्ष यह 109 लाख टन रहा था। सोपा ने पहले खरीफ कटाई सीजन 2018 के लिए भारत का कुल सोयाबीन उत्पादन 114.8 लाख टन अनुमानित किया था। सोपा ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वर्ष 2019 में सोयाबीन का रकबा 1.076 करोड़ हेक्टेयर है जबकि वर्ष 2018 में यह 1.084 करोड़ हेक्टेयर था। मध्य प्रदेश में सोयाबीन उत्पादन का अनुमान 40 लाख टन का है जो पिछले वर्ष 58 लाख टन था, मतलब लगभग 40 फीसदी की गिरावट है।

महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश के कारण 70 लाख हेक्टयेर की फसल बर्बाद हुई है।

मराठवाड़ा, कोंकण, पुणे, सांगली, सतारा, कोल्हापुर और सोलापुर में कपास, अंगूर, सोयाबीन, मक्का, बाजरा, धान और ज्वार जैसी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। मराठवाड़ा में खरीफ की 85 फीसदी फसल बर्बाद हुई है तो वहीं पुणे संभाग में 1.36 लाख हेक्टयेर, सांगली में लगभग 65267 हेक्टेयर, सोलापुर में 36345 हेक्टेयर, सतारा में 11800 हेक्टेयर और कोल्हापुर में 1055 हेक्टयेर में लगी खड़ी फसलें बेमौसम बारिश के भेंट चढ़ गईं।

बारिश के कारण खराब हुई ज्वार की फसल। तस्वीर महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले की है।

खराब मौसम के ही कारण प्याज की आवक और बोवनी में देरी हुई जिस कारण प्याज की कीमतें अभी भी 100 रुपए प्रति किलो से ज्यादा है। बाजार में नया प्याज अभी पर्याप्त मात्रा में आ ही नहीं पाया। केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने 19 नवंबर 2019 को एक सवाल के जवाब में लोकसभा को बताया कि वर्ष 2019-20 के देर-खरीफ सीजन में प्याज का उत्पादन 26 फीसदी कम रहने का अनुमान है। इस कारण प्याज की सप्लाई और कीमत पर दबाव बढ़ सकता है। पिछले साल इस समय (24 दिसंबर 2019) को देश के ज्यादातर हिस्सों में प्याज की कीमत 20 से 25 रुपए प्रति किलो थी जो इस समय 100 रुपए से ज्यादा है।

प्याज सीजनल फसल है और साल में तीन बार इसकी खेती होती है। रबी की सीजन मार्च से जून, खरीफ की फसल अक्टूबर से दिसंबर और देर-खरीफ की फसल जनवरी से मार्च के बीच होती है। जुलाई से अक्टूबर के बीच प्याज की सप्लाई कोल्ड स्टोरेज में रखी फसल से होती है।

१९ दिसंबर २०१९ में लोकसभा में पूछे गये एक सवाल के जवाब में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा दिया गया जवाब।

केंद्रीय खाद्य मंत्री पासवान ने आगे बताया, "वर्ष 2019-20 में खरीफ के दौरान प्याज की बुवाई में 3 से 4 सप्ताह की देरी हुई है। मानसून देर से आने के कारण बुआई का क्षेत्र घटा है। इसके बाद लगातार बारिश की वजह से कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में प्याल की फसल को काफी नुकसान पहुंचा है। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा।"

नये साल में चीनी भी किचन का बजट बिगाड़ेगा। देश में चीनी का उत्पादन चालू सीजन में 35 फीसदी कम हो गया है। निजी मिलों के सबसे बड़ा संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) ने दिसंबर 2019 में जारी अपनी रिपोर्ट में बताया कि चीनी उत्पादन चालू मार्केटिंग सीजन में 15 दिसंबर तक 35 फीसदी गिरकर 45.8 लाख टन पर आ गया। मार्केटिंग वर्ष 2018-19 में इसी अवधि में चीनी की उत्पादन 70.5 लाख टन था।

रिपोर्ट में बताया गया है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्रा पेराई देर से शुरू होने के कारण उत्पादन पर असर पड़ा है। चालू सीजन में महाराष्ट्र में 15 दिसंबर तक चीनी का उत्पादन का लगभग 74 फीसदी जबकि कर्नाटक में 24 फीसदी कम हुआ है। हालांकि सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन इस दौरान 12 फीसदी से भी ज्यादा रहा है।


एग्री एक्सपोर्ट के जानकार विजय सरदाना कहते हैं, " उत्पादन भले ही कम हो लेकिन निर्यात में कमी नहीं आयेगी। निर्यात मांग का अनुमान पहले ज्यादा है। ऐसे में मिल मालिकों को तो फायदा होगा लेकिन आम लोगों पर महंगाई की मार पड़ेगी। नये साल में चीनी के लिए उपभोक्ताओं को जेब ढीली करनी होगी। "

देश के बड़े चीनी उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है। बात अगर महाराष्ट्र की करें तो यहां चीनी मिलें 15 दिसंबर 2019 तक 7.66 लाख टन चीनी उत्पादन कर सकीं जबकि पिछले साल इस अवधि में 29 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था।

महाराष्ट्र में चीनी सीजन 2018-19 के दौरान महाराष्ट्र में 107 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था जो इस बार घटकर 58 लाख टन तक पहुंच सकता है। खराब मौसम को महाराष्ट्र में चीनी उत्पादन में कमी का कारण माना जा रहा है। खराब मौसम के कारण गन्ना का रकबा घट गया था। चीनी उत्पादन में कर्नाटक देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। राज्य में 15 दिसंबर 2019 तक चीनी उत्पादन 23.74 फीसदी गिरकर 10.6 लाख टन पर आ गया। वर्ष 2018 में यह उत्पादन 13.9 लाख टन था।

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