आपकी जिंदगी में घुलता जहर : इसके खिलाफ संघर्ष की एक कहानी

औद्योगिक इकाइयों पर कोई नकेल न होने से लाखों लीटर रसायन युक्त दूषित पानी और घरों का सीवर सीधे हिंडन और दिल्ली के पास की नदियों में डाला जा रहा है

गाजियाबाद। सितंबर-अक्टबूर के महीने में दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में प्रदूषण बढ़ने लगता है। फिर आसपास के इलाकों में फसल की खूंटी जलाये जाने और मौसम के साथ दूसरे कारकों के जुड़ने से यह खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। कई बार तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। सिर्फ हवा ही यहां का पानी भी जहरीला हो रहा है। औद्योगिक इकाइयों पर कोई नकेल न होने से लाखों लीटर रसायन युक्त दूषित पानी और घरों का सीवर सीधे हिंडन और दिल्ली के पास की नदियों में डाला जा रहा है।

पर्यावरण क्षेत्र से जुड़ी प्रमुख संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के मुताबिक देश के 14 बड़े शहरों में दिल्ली की हवा सबसे जहरीली है। ये सर्वे गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण पर किया गया था। इतना ही नहीं स्वास्थ्य आधारित जनरल (मेडिकल पत्रिका) लेंसेट के अनुसार 2015 में दुनियाभर में हुई मौतों के मामले में सबसे ज्यादा मौतें भारत में हुई थीं। इस वर्ष पूरी दुनिया में 90 लाख लोगों की जान गई थी, जिसमें 25 लाख भारतीय थे।

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हवा, पानी और मिट्टी में बढ़ता प्रदूषण लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है लेकिन मुख्य धारा मीडिया में न इस मुद्दे की गंभीर चर्चा होती है और न ही उन लोगों चर्चा होती है जो इस प्रदूषण के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं। गाजियाबाद में रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ता और अधिवक्ता विक्रांत शर्मा पिछले 15 वर्षों से प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।


विक्रांत बताते हैं, "हिंडन इतनी जहरीली और प्रदूषित कैसे हो गई ये जानने के लिए 2004 में मैंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर गाजियाबाद से पदयात्रा शुरू की। ये यात्रा सहारनपुर में हिंडन के उद्गम स्थल तक गई। इस दौरान हम लोगों को ये समझ आया कि हिंडन के प्रदूषण की वजह इंडस्ट्रियल इलाकों से निकलने वाले नाले हैं।"

अपनी बात को जारी रखते हुए विक्रांत शर्मा बताते हैं, "हिंडन में करीब 150 नाले गिरते हैं, जिसमें सबसे खतरनाक नाला मुजफ्फरपुर के बैगराजपुर इंडस्ट्रियल एरिया का है। इस नाले का पानी इतना काला है कि पूरा नाला काला नजर आता है। खतरनाक केमिकल के चलते बुजबुजे उठते हैं। इसकी चपेट में दर्जनों गांव हैं।'

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प्रदूषण से सिर्फ शहरों में सांस नहीं फूलती हैं, गांव के लोगों का भी जीना मुहाल है। इस प्रदूषण का रिश्ता का केवल शहरी आबादी से नहीं बल्कि गांवों से रहने वाले लोगों से भी हैं। क्योंकि ये प्रदूषण भूमिगत जल से लेकर खेतों में उगाने जाने वाले अनाज तक पहुंच रहा है।

औद्योगिक इलाके नियम-कानूनों को ताक पर रखकर नालों में जहरीला पानी उड़ेलते हैं तो शहरों का बिना ट्रीट किया हुआ सीवर (मलमूत्र) नालों के जरिए नदियों में डाला जा रहा है। इससे नदियों के आसपास के कई किलोमीटर के क्षेत्र में इलाका प्रदूषित हो रहा है। प्रदूषित पानी के चलते उनका पेयजल और खेती की भी जहरीली हो रही है।


"किसान खुद तो ये पानी के इस्तेमाल करने को मजबूर हैं कि वो इन्हीं से सब्जियां और अनाज उगा रहे हैं। दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव जैसी शहरों में आने वाली सब्जी इसी जहरीले पानी से उगाई जा रही है। शहर के लोग भी सुरिक्षत नहीं है। इस पानी से गांव का आदमी और किसान नहीं मर रहा, ये कैंसर शहर तक पहुंच गया है।'

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विक्रांत और उनके साथी लोगों को हिंडन नदी को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। वो नाटकों के माध्यम से स्कूलों के बच्चों और ग्रामीणों को जागरुक कर रहे हैं साथ ही आरटीआई के जरिए सरकार और सिस्टम पर सवाल उठाते हैं।

"हिंडन नाट्य मंच के जरिए हमारे साथी स्कूल के बच्चों को जागरूक कर रहे हैं। नाटकों के विषय नदी, जंगल, चिड़िया और पक्षी हैं। नदियों के किनारे के गांवों को जागरुक करने की मुहिम जारी है।'


गाजियाबाद में हिंडन, पश्चिमी यूपी में काली नदी जैसी कई नदियां प्रदूषण के चलते दम तोड़ रही हैं। इन नदियों के नाले गिराए जाते हैं। शहरों के आसपास कूड़ा जलाया जाता है। कई रिपोर्ट में ये साबित हो चुका है कि कूड़ा जलाना पर्यावरण के लिए घातक है। विक्रांत कहते हैं, कूड़े का जलाया जाना और औद्योगिक इलाकों और सड़कों की धूल हवा के लिए घातक है।'


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