अनूठे पर्यावरण प्रेम के लिए पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं नवल डागा, छत पर उगाते हैं सब्जियां

जयपुर के नवल डागा का पर्यावरण प्रेम देखते ही बनता है, पर्यावरण से जुड़े विभिन्न प्रकार के फ्रेंडली आइटम्स बनाते हैं, जो पूरी दुनिया में इनके अलावा आपको कहीं भी देखने को नहीं मिलेंगे

Moinuddin ChishtyMoinuddin Chishty   25 Sep 2019 7:58 AM GMT

ये अनोखी कहानी राजस्थान की राजधानी जयपुर में रहने वाले नवल डागा की है, जो 13 जुलाई, 1977 से पेड़, पानी और वन्य जीवों के सरंक्षण की दिशा में कार्य कर रहे हैं। वे ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने इस कार्य को सुचारू रूप से अंजाम देने के लिए समय की एक एक बूंद को व्यर्थ बहने से रोकते हैं।

वे अपने अनूठे पर्यावरण प्रेम के चलते पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं। वे पर्यावरण से जुड़े विभिन्न प्रकार के फ्रेंडली आइटम्स बनाते हैं, जो पूरी दुनिया में इनके अलावा आपको कहीं भी देखने को नहीं मिलेंगे।


नवलजी का घर विचित्रताओं से भरा है। उन्हीं के शब्दों में,"हमारा घर बहुत ही विचित्र है। मेरी धर्मपत्नी की आंख पे पट्टी बांध दीजिये और इनसे कोई भी कलर की गट्टी मांग लीजिये, ये आपको लाकर दे देंगी। आपके दादाजी गुजरे हों और आपने हमें शोक संदेश का पत्र भेजा हो, हमारे यहां सुरक्षित मिलेगा।"

पर्यावरण से जुड़े हर एक विषय पर नारे, स्लोगन, कविता, मुहावरे, लोकोक्तियां, फैक्ट्स एंड फिगर्स को आम जीवन से जुड़ी वस्तुओं पर प्रिंट करके उन्हें देश-विदेश तक पहुंचाने का कार्य नवलजी अर्से से करते आ रहे हैं।


नवलजी ने बताया,"1 दिसंबर 1956 को मेरा जन्म जयपुर में हुआ। पिता शिवरतन जी बीज बेचते थे। मेरा सारा सृजन पिताजी की ही देन है। जब तक पिताजी जिन्दा थे, मैं रात को 4 बजे से पहले कभी नहीं सोया। मैंने इतनी बातें पिताजी से की हैं। वे कहते थे, भाग्य की रोटी तो कुत्ते भी खाते हैं, ऊपर बैठा ईश्वर हम सबको भूखा उठाता है, भूखा नहीं सुलाता, पेट भराई उसका काम है। रोटी का टेंडर तो ऊपरवाले के पास है। रोटी के लिए काम मत करो, काम मिनख जूण का करो। ऐसा लिख जिसको लोग पढ़ते रहें और ऐसा कर जिस पर लोग लिखते रहें।'


यहां निर्मित होने वाले 6822 आइटम्स 14 भारतीय भाषाओं में बनते हैं। 302 से ज्यादा तरह के कुशन कवर बनाते हैं। 546 गौत्रों के आइटम हैं इनके पास। 1000 से ज्यादा श्रद्धांजलियां लिखी हैं इन्होंने। 1269 तरह के आइटम हैं जो सिर्फ आने जाने वालों को गिफ्ट करते हैं। 100 तरह के झोले हैं, जो कन्धों पे लटकाये जाते हैं। 60 तरह के विषयों की चैक बुक कवर है। गुल्लक, साड़ी के फॉल, मोबाइल स्टैंड, पेन स्टैंड, चाबी स्टैंड, गिलास, ट्रे, टाइल्स, छाते, राखियां, खटिया (माचे), बुक्स, अख़बार, तकिया, पंखी, पेपर वेट, ट्रैवलिंग बेग, चाय प्लेट, गाय को रोटी खिलाने का कवर, पर्स, झाड़ू, कमर बेल्ट, माचिस कवर, फाइल कवर इत्यादि।

इनके यहां बनने वाले लकड़ी के आइटम्स में कहीं भी कोई कील प्रयोग नहीं की जाती। इस पर इनका कहना है,"हम नहीं चाहते की आपकी लाइफ में कहीं भी कोई कील, कोई कांटा या शूल हो।"


13-11 मात्रा के दोहे होते हैं। जगण, मगण, तगण दोहे होते हैं। किसान शब्द से दोहा शुरू नहीं होता। प्रयास और कदम्ब शब्द से दोहा शुरू नही होता, ये नियम हैं। ये मेरे नियम नहीं हैं, आचार्य पाणिनि के बनाए नियम हैं।

लघु, दीर्घ, लघु किसी भी चरण के दोहे में पहले नही आएंगे। अंग्रेजी के 26 एल्फाबेट्स हैं G,J,P,Y,Q की डंडी नीचे आती है। यह देखिये इनमे कहीं भी ये अक्षर नहीं हैं।

आप तो हमारी 500 मीटर लम्बी निवार देखिये! 1000 दोहे हैं, 4000 लाइनें हैं, वृक्ष अगर देते नहीं... यह लाइन 4000 लाइनों में दुबारा कभी नहीं आयेगी।

छत पर कर रहे हैं सब्जियों की खेती-

भिन्डी, तुरई, करेला, घीया, गवार, टिंडा, टमाटर, बैंगन, मिर्च, पालक, खरबूजा, ककड़ी, कोला, सेम बलोर, फ्रेंच बीन, एक्सप्रेस बीन, चंदलिया जैसी सब्जियों की खेती अपने घर की छत पे शुरू की है। 395 गमले हैं, जो ड्रिप के जरिये 9 मिनट में पानी पिलाए जा सकते हैं।


टेरेस गार्डन में बन्दर नहीं आएं, इसके लिए कपड़े के विशेष डिजाईन की फील तैयार की है। 20×50 साइज का प्लाट है जिसमें 776 स्कवायर फ़ीट में निर्माण है। छत पर 10 फ़ीट ऊंचा लोहे का एक स्ट्रक्चर बनाया है, उसमें 100 मीटर लम्बी एलइडी लाइट्स लगाई गई हैं। 40 आदमी एक साथ बैठ सकें, ऐसी व्यवस्था है। हमारे यहां आईएएस, आईएफएस और रेंजरों की क्लासेज सीखने आती हैं। ऊपर की सारी सब्जी पक्षी खाते हैं, हमने जाल नहीं लगाया। तोते आओ, हम नहीं उड़ाएंगे। अब तो साहब बोनस की ज़िन्दगी है और क्या करेंगे!

ना कसिया ना फावड़ा, ना हल की दरकार, छत पर सब्जी कीजिये, गमलों में तैयार। पक्षी हल जो हांकते, उनके होते खेत, तेरे घर आते नहीं , दाना पानी हेत।

बिन झोली के संत हैं पक्षी इस संसार

मनुआ दाना दान दे, जीवन देंगे तार।

सुबह शाम जो दे रहे दाना पानी दान

100-100 पक्षी गा रहे, दानी का गुणगान

छत पर सब्जी बोइये, डालें जैविक खाद

तत्व मिलेंगे पौष्टिक, खूब मिलेगा स्वाद।

छत पर ही बैलें उगें, रस्सी पर छा जाएं

घर बैठे सब्जी उगे, बड़े चाव से खाएं।

खेतों में उग गये मानव के आवास, छत पर बैलें ऊगा, ले राहत की सांस।

घर-घर पैदा हो रही सब्जी खूब, ना मानों तो देख लो शहरों में महबूब।


हर गमले पर नम्बर लगा है, गमले के नीचे उसी नम्बर का टब लगाया गया है। सभी गमलों और टबों पर दोहे हैं, 176 दोहे हैं, एक भी दोहा वापस नहीं आया है किसी भी गमले या टब में।

रुचि हो तो सम्पर्क कर सकते हैं-

बी-314, हरी मार्ग, मालवीय नगर, जयपुर- 302 017 (राजस्थान) मोबाइल 09460142430

(लेखक कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं)

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