ये जगह बुंदेलखंड तो नहीं, पर हालात वैसे ही हैं..

ये जगह बुंदेलखंड तो नहीं, पर हालात वैसे ही हैं..दो किलोमीटर दूर से पानी लेकर लौटती महिला  

इलाहबाद। “यहां दो गाँवों के बीच सिर्फ एक नल है, नल खराब होने के बाद हम लोगों को कुएं का गंदा पानी पीना पड़ता है। वर्षों से हम ऐसी ही जिंदगी जीने को मजबूर हैं।” ऐसा कहना है शंकरगढ़ के छिपिया गाँव के रहने वाली सूरज कली (45 वर्ष) का।

इलाहाबाद शहर से 45 किलोमीटर दूर स्थित शंकरगढ़ इलाका वर्षों से पानी के लिए तरस रहा है। गर्मी हो या जाड़ा हर मौसम में यहां लोग पानी के लिए तरसते हैं। पानी के लिए लोगों को दो-दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। यहां इंसान गंदा पानी पीने को मजबूर हैं तो जानवर बिना पानी के मर रहे हैं।

इलाहाबाद से जाते वक़्त सड़क पर गायों का झुण्ड दिख जाता है.

इलाहाबाद से सड़क मार्ग के रास्ते शंकरगढ़ जाने का रास्ता शानदार है, लेकिन बीमार और दूध न देने वाली जानवारों को लोग इसी सड़क के किनारे बसे इलाके में छोड़ जाते हैं। यह पथरीला इलाका है। पथरीला होने के कारण यहां चारा नहीं उगता है और यहां ज्यादातर पेड़ कंटीले हैं जो मवेशी खा नहीं पाते हैं। लोहरा गाँव के रहने वाले पंकज पाल बताते हैं, “यहां हर दूसरे दिन कोई जानवर पानी के बगैर मरा हुआ मिल जाता है। हमारे पास खुद के पीने के लिए पानी नहीं तो हम जानवरों को कैसे पानी पिलाएं। उन्हें मरते देख हमें दुःख होता है लेकिन हम भी मजबूर हैं।’’

यहां दो गाँवों में लगभग दो हज़ार आबादी रहती है। इन दो हज़ार लोगों पर सिर्फ एक नल है। रोजाना सुबह पानी भरने के लिए यहां लोगों की लाइन लगती है। पानी भरने के लिए लोगों की लड़ाई भी होती है। यह नल जब खराब हो जाता है तो हमें कुएं का गंदा पानी पीना पड़ता है।
सूरज कली, छिपिया गाँव

शंकरगढ़ क्षेत्र के छितिया, रमना, बुद्धनगर, बदामा गाँव, हड़ही, जनवा और सिद्धपुर पहाड़ी में पानी का ज्यादा संकट है। महिला समाख्या से जुड़ी रानी देवी बताती हैं, “यहां पिछले साल तक टैंकर से पानी आता था, लेकिन इसबार पानी भी नहीं आ रहा है। यहां पानी को लेकर लोग हमेशा से परेशान रहते हैं। पिछले साल बरसात में यह क्षेत्र पानी से डूब गया था। हेलीकॉप्टर से खाना पहुंचाया जा रहा था। यह क्षेत्र कभी डूब जाता है तो कभी सूख जाता है।”

यहाँ पहले खनन होता था लेकिन अभी खनन पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है.

शंकरगढ़ में स्थित सामुदायिक स्वस्थ केंद्र में कार्यरत डॉ. अभिषेक सिंह क्षेत्र में पानी की समस्या पर बताते हैं, ‘‘1970 के आसपास यहां खदानों से सिल्क सेंड निकालने का काम शुरू हुआ। सिल्क सेंड ऐसा सेंड है, जिसको धुलकर बेचा जाता है। यहां पर खनन को लेकर कोई कानून नहीं था तो जिसका जहां मन हुआ चार मजदूरों को ले जाकर खोदाई शुरू करा दी। लोग सेंड निकालते और उसे धुलने के लिए परम्परागत जलश्रोत और जमीन के अंदर से पानी निकलते थे। पानी का इतना ज्यादा इस्तेमाल होता था कि जलस्तर बहुत नीचे चला गया और आज स्थिति बेहद खराब है।’’

नल खराब होने के बाद इसी कुएं का पानी पीते है स्थानीय निवासी

छिपिया गाँव की रहने वाली सूरज कली बताती हैं, “यहां दो गाँवों में लगभग दो हज़ार आबादी रहती है। इन दो हज़ार लोगों पर सिर्फ एक नल है। रोजाना सुबह पानी भरने के लिए यहां लोगों की लाइन लगती है। पानी भरने के लिए लोगों की लड़ाई भी होती है। यह नल जब खराब हो जाता है तो हमें कुएं का गंदा पानी पीना पड़ता है।”

यहां हर दूसरे दिन कोई जानवर पानी के बगैर मरा हुआ मिल जाता है। हमारे पास खुद के पीने के लिए पानी नहीं तो हम जानवरों को कैसे पानी पिलाएं। उन्हें मरते देख हमें दुःख होता है लेकिन हम भी मजबूर हैं।’’
पंकज पाल, लोहरा गाँव

बुद्धनगर गाँव के रहने वाले मिश्री लाल (55 वर्ष) बताते हैं, ‘‘यह क्षेत्र समस्याओं का गढ़ है। पानी यहां की सबसे बड़ी समस्या है। पीने के लिए पानी नहीं है तो खेती के लिए पानी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है। यहां के ज्यादातर खेत पथरीले हैं। कुछ खेत जहां पर खेती की जा सकती है वहां हम पानी के अभाव के कारण खेती नहीं कार पा रहे हैं। हमें लगता है कि आने वाले समय में हमारी मौत पानी नहीं मिलने के कारण होगी।’’

लोहरा गाँव के पंकज पाल बताते हैं, ‘‘यहां हर दूसरे दिन कोई जानवर पानी के बगैर मरा हुआ मिल जाता है। हमारे पास खुद के पीने के लिए पानी नहीं तो हम जानवरों को कैसे पानी पिलाएं। उन्हें मरते देख हमें दुःख होता है लेकिन हम भी मजबूर हैं।’’

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