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इस परिवार की आपबीती से देश के लाखों परिवारों का वास्ता होगा

"रोज कमाते थे रोज खाते थे, दस दिन से काम बंद है, अब आपसे सुन रहे हैं 21 दिन और बंद रहेगा। जो राशन था वो सब खत्म हो गया है, हमारे पास तो जमा पूंजी भी नहीं है। बच्चों को 21 दिन कैसे जिंदा रखेंगे?" सोच में बैठे रामसूरत वर्मा के इस वाक्य से देश के लाखों परिवारों का वास्ता होगा ...

Neetu SinghNeetu Singh   25 March 2020 2:55 PM GMT

इस परिवार की आपबीती से देश के लाखों परिवारों का वास्ता होगा

नीतू सिंह/दिवेंद्र सिंह

सुबह आँख खुलते ही रामसूरत ने जब यह सुना कि 21 दिन भारत बंद रहेगा तो उनकी जुबान से पांच शब्द ही निकले, "कैसे कटेंगे ये 21 दिन?".

फुटपाथ पर रहने वाले पैंसठ वर्षीय रामसूरत वर्मा के लिए लॉक डाउन के 21 दिन काटना हमारे और आपके दिनों जैसे बिलकुल नहीं हैं।

"रोज कमाते थे रोज खाते थे, दस दिन से काम बंद है, अब आपसे सुन रहे हैं 21 दिन और बंद रहेगा। जो राशन था वो सब खत्म हो गया है, हमारे पास तो जमा पूंजी भी नहीं है। बच्चों को 21 दिन कैसे जिंदा रखेंगे?" सोच में बैठे रामसूरत वर्मा के इस वाक्य से देश के लाखों परिवारों का वास्ता होगा ...

रामसूरत जैसे देश के लाखों मजदूरों के लिए ऐसे हालात तब बने जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को घोषणा की कि 24 मार्च की रात 12 बजे से 21 दिनों तक पूरा देश पूरी तरह से बंद रहेगा। ये मजदूर इस बड़ी बंदी के लिए आर्थिक रूप से सक्षम नहीं थे।

भारत बंदी में इन मजदूर परिवारों के लिए एक-एक दिन काटना भारी पड़ रहा है। इनके पास रहने का न तो कोई सुरक्षित ठिकाना है और न ही पेट भरने के लिए 21 दिन के राशन का इंतजाम।

फुटपाथ पर चाय की दुकान लगाने वाले रामसूरत वर्मा 21 दिन के लॉक डाउन से चिंता में हैं.

रामसूरत वर्मा की ये बेचैनी कोरोना वायरस के संक्रमण की शुरुआत हुए चीन के वुहान शहर से 3200 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के लखनऊ से है। ये मूलतः बहराइच जिले के नानपारा ब्लॉक के बनकटवा गाँव के रहने वाले हैं। रोजगार की तालाश में 15-16 पहले लखनऊ आ गये थे। वो शहर जो इन्हें इतने सालों से दो वक़्त की रोटी का इंतजाम कर रहा था पर आज हालात ऐसे नहीं हैं।

"जबसे यह बंदी चल रही है तबसे एक रूपये की आमदनी नहीं हुई। आठ दिन बिना कमाए खाने का जुगाड़ जैसे-तैसे हुआ है। इतने सालों से रह रहे हैं, राशन वाले से जान पहचान है। उधार सामान दे देता है पर बंदी में कबतक देगा? रामसूरत की अलसाई आँखों से अब नींद कोसों दूर थी, "बंदी में तो नगद पैसों से सामान ही मिल जाए बड़ी बात है, ऐसे में उधार कौन देगा? हम तो पानी पीकर भी पेट भर लेंगे पर इन छोटे-छोटे बच्चों का क्या होगा?"

एक हफ्ते की बंदी के बाद रामसूरत के परिवार की स्थिति यह आ गयी है कि इनके छोटी सी परचून की दुकान में जो थोड़ा बहुत सामान था ये उसे बेचकर राशन का इंतजाम किया तो कुछ दुकान से उधारी लेकर। पर अगर सरकार ने जल्द ही इस परिवार के खाने का इंतजाम नहीं किया तो इनकी मुश्किलें बढ़ जायेंगी।

रामसूरत का परिवार लखनऊ के गोमतीनगर में बने जनेश्वर पार्क के गेट नम्बर दो के ठीक सामने फुटपाथ पर तिरपाल से झोपड़ी बनाकर कई सालों से रह रहा हैं। इनके छह बेटे और एक बेटी है। अभी इनके पांच बेटों की शादी हो गयी है। पांच बहुएं और सभी के बच्चे मिलाकर इनके परिवार में अभी कुल 23 लोग हैं। बच्चों को छोड़कर परिवार के सभी लोग दिहाड़ी मजदूरी करके अपने-अपने परिवार का खर्चा चला रहे थे।

फुटपाथ पर चावल पकाती रामसूरत वर्मा की बहु.

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए 18 मार्च से इस परिवार की मजदूरी ठप्प पड़ी है।

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद भारत के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने राज्य सरकारों को ख़त लिखकर देश के लगभग 40 करोड़ से अधिक दिहाड़ी और खेतिहर मज़दूरों, छोटे किसानों, वृद्धा पेंशन भोगियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोगों के लिए विशेष वित्तीय मदद दिए जाने की अपील जरुर की है। लेकिन अभी इसका लाभ इस तबके तक नहीं पहुंच पाया है।

"पहले मजदूरी करते थे फिर छोटी सी चाय की दुकान लगा ली। बच्चे बड़े हुए तो वो किराये का ई-रिक्शा चलाने लगे। पत्नी और बहुएं कभी मजदूरी करतीं तो कभी जनेश्वर पार्क के सामने पान-मसाला की छोटी सी दुकान लगा लेंती। कई सालों से ऐसे ही कमाकर पेट भर रहे हैं", रामसूरत फुटपाथ से अपने बिस्तर समेटते हुए अपने परिवार के बारे में बता रहे थे, "रोज का कमाना रोज का खाना, अभी तक ऐसे ही चल रहा था। इतनी आमदनी कभी हुई नहीं की बैंक में जमा कर पाते। सब आराम से सब्जी-रोटी खा रहे थे। कभी ऐसा संकट आएगा ऐसा ख्याल ही नहीं आया।"

भारत लॉक डाउन के बाद रामसूरत की तरह देश के लाखों परिवार इस समय इस जद्दोजहद से जूझ रहे हैं कि उनके परिवार का इस स्थिति में भरण-पोषण कैसे होगा? इस समय दुनिया के कई देशों में लॉक डाउन है। देश की राज्य सरकारें हर संभव मदद की कोशिश में लगी हैं पर रामसूरत की तरह एक बड़ी आबादी की बेचैनियाँ अभी कम नहीं हुई हैं क्योंकि इनतक अभी कोई जिम्मेदार अफसर नहीं पहुंच पाया है।

चाय बनाती रामसूरत की पत्नी जानकी देवी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार कोरोना वायरस 186 देशों में पहुंच चुका है। दुनिया भर में चार लाख से ज्यादा लोग इस वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। अबतक 20,000 अधिक लोगों की इससे मौत हुई है। इस सबके बीच एक सुखद खबर ये है कि एक लाख से ज्यादा मरीज ठीक हुए हैं। भारत में 600 से ज्यादा मामले कोविड-19 के पाए गये हैं, 10 लोगों की मौत हो चुकी है।

इस मुश्किल दौर में रामसूरत का परिवार भरी दोपहरी पेड़ की छाँव में और रात खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर बिताने को मजबूर है।

आप इतने दिनों से खुले आसमान के नीचे हैं कोई मदद के लिए नहीं आया? इस पर उनकी पत्नी जानकी देवी (60 वर्ष) बोलीं, "उजाड़ने वाले बहुत लोग हैं पर हाल खबर लेने वाला कोई नहीं। गरीबों की कौन सुध लेता है? इतने दिनों में आप लोग ही पहली बार हाल खबर लेने आये हैं।"

ये उस परिवार की व्यथा है जो दिहाड़ी मजदूर तो हैं पर श्रम विभाग में रजिस्टर्ड नहीं हैं। इन्हें सरकार से मिलने वाली किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता। भारत में लॉक डाउन के बाद सरकार ने श्रम विभाग में रजिस्टर्ड मजदूरों की मदद के लिए घोषणाएं की हैं पर जो मजदूर रजिस्टर्ड नहीं है उनकी सरकार कैसे मदद करेगी? इसका कहीं जिक्र नहीं है।

रामसूरत का परिवार इतने सालों से जिस फुटपाथ पर तिरपाल से झोपड़ी बनाकर रहता था उसे शुरुआती लॉक डाउन के दौरान ही 18 मार्च को तोड़ दिया गया। ये परिवार कहां रहेगा? कहाँ जाएगा? अभी तक इसकी किसी ने सुध नहीं ली है।

खुले आसमान के नीचे दोपहरी और रातें काटता रामसूरत का परिवार.

कदम के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए जानकी देवी बोलीं, "जब इस पेड़ के नीचे धूप आ जाती है तो दूसरे पेड़ की छाँव में बैठ जाते हैं। एक-एक दिन की दोपहरिया ऐसे ही कट रही है। बंदी की वजह से कामधाम बंद है पर इस पापी पेट को तो रोज खाना चाहिए। कहाँ से और कैसे जुगाड़ करें?" जानकी के चेहरे पर चिंता की तकलीफ की लकीरें साफ़ दिख रहीं थीं।

कोरोना से उठे रोजगार संकट के बीच उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने निर्माण और दिहाड़ी मजदूरों को प्रतिमाह एक हजार रूपये देने का ऐलान किया था। इसकी पहली किस्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को यूपी के लगभग 20 लाख निर्माण मजदूरों को ऑनलाइन ट्रॉन्सफर कर दी गयी है।

"जल्द ही ऐसे मजदूरों, रेहड़ी पटरी वालों के खाते में भी आर्थिक सहयोग जाएगा, जिनका पंजीकरण यूपी के श्रम विभाग में नहीं है। हमने इसके लिए जिलाधिकारियों को अधिकृत किया है। जो लोग इस सुविधा से वंचित रह गए हैं, किसी योजना से आच्छादित नहीं हैं, उनके पास कमाने का कोई जरिया नहीं है और आय के स्रोत बंद हो चुके हैं, उन्हें शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में चिन्हित कर जनपद स्तर पर 1000 की व्यवस्था की जाए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर निकाय नगर पालिका और ग्राम पंचायत सूची तैयार करने में लगे हुए हैं।" मुख्यमंत्री ने कहा।

सरकार के तमाम प्रयासों को बावजूद रामसूरत के परिवार को अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। इनके पास बमुश्किल एक दो दिन लिए थोड़ा बहुत राशन है पर आगे के दिन कैसे कटेंगे इसका इन्हें भी अंदाजा नहीं है। रामसूरत के चौथे नम्बर के बेटे की पत्नी सीमा ने आज सुबह केवल आलू उबाले जिससे उन्हें पूरे दिन का गुजारा करना है।

सीमा को खुद से ज्यादा अपनी बेटी की चिंता है.

"भले ही मजदूरी करते थे पर ऐसे दिन कभी नहीं देखे। सब्जी-रोटी भर का तो कमा ही लेते थे। जबसे ये बंदी हुई है तबसे कभी माड़ भात, कभी चटनी रोटी बस ऐसे ही दिन कट रहे हैं। आज तो आलू उबालकर ही काम चलाउंगी, कल के लिए अभी कुछ सोचा नहीं। बंदी से बीमारी तो नहीं फैलेगी पर गरीबोँ के पेट पर तो लात मार दी। हमारे खाने का कोई इंतजाम नहीं है। ऐसे तो भूखों ही मर जायेंगे"; सीमा ये कहते हुए उदास हो गईं, "गरीबी बड़ी खराब होती है। अगर मेरी छोटी बच्ची बीमार पड़ जाये तो हम उसकी इलाज भी नहीं करा सकते।"

सीमा की तरह रामसूरत की सभी बहुएं छोटी-छोटी दुकान जनेश्वर पार्क के सामने लगाती थीं, यही इनकी रोजी-रोटी का मुख्य जरिया था। अब इस परिवार की स्थिति ऐसी आ गयी है कि ये न तो अपने गाँव वापस लौट सकते और न ही दो वक्त का अपना पेट भर सकते।

रामसूरत के दूसरे नम्बर के बेटे की पत्नी ज्ञानवती (31 वर्ष) अपने छोटे-छोटे बच्चों को समझा रही थी, "अब तुम लोग दुकान जाने के लिए ज़िद मत करना। पापा अब ई-रिक्शा चलाने नहीं जाते, सब पैसे खत्म हो गये हैं।" इनके बच्चे बिना कुछ जबाब दिए इनकी बातें सुन रहे थे। ज्ञानवती के पति पप्पू (35 वर्ष) किराए का ई-रिक्शा चलाते हैं।

"बच्चों को देखता हूँ तो रोना आ जाता है। एक दो दिन की बात नहीं है, अभी तो पूरा महीना पड़ा है। रिक्शा चलाने में उसका भाड़ा देकर 150-200 रुपए बचते थे, इतने बड़े परिवार में रोज रोटी का ही जुगाड़ हो पाता था। बचत कर ही नहीं पाए, तभी तो एक-एक दिन एक साल की तरह कट रहा है," यह बताते हुए ई-रिक्शा पर बैठे पप्पू की आँखों में आंसू भर आये।


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