राष्ट्रपति से ज्यादा शिक्षक के तौर पर डॉ. राधाकृष्णन को जानता है भारत 

राष्ट्रपति से ज्यादा शिक्षक के तौर पर डॉ. राधाकृष्णन को जानता है भारत डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

लखनऊ। समाज में आज भी जब देश में शिक्षकों के योगदान का ज़िक्र होता है तो डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को ही याद किया जाता है। डॉ राधाकृष्णन भले ही भारत के राष्ट्रपति रहें हों लेकिन उन्हें ज्यादातर लोग एक शिक्षक के रूप में ही जानते हैं। आज (17 अप्रैल) को उनकी पुण्यतिथि पर देश के राजनेताओं के साथ आम जनता भी इस शिक्षाविद् राष्ट्रपति को याद कर रही है।

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राष्ट्पति और दो बार उपराष्ट्रपति का पद संभालने वाले सर्वपल्ली राधाकृष्णन बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में 1939 से 1948 तक वाइस चांसलर भी रहे। 1962 में उन्हें 'ब्रिटिश अकेडमी' का सदस्य बनाया गया। पोप जॉन पाल ने 'गोल्डन स्पर' भेंट किया। ब्रिटिश सरकार की ओर से उन्हें 'आर्डर ऑफ मेरिट' का सम्मान मिला।राधाकृष्णन को मरणोपरांत 1975 में अमेरिकी सरकार ने टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया।

सोशल मीडिया पर याद आए राधाकृष्णन

सोशल मीडिया पर भी लोग ट्विटर, फेसबुक और व्हॉटसप पर लोग उन्हें याद कर रहें हैं। उनके कहे हुए शब्दों और उनकी तस्वारों के साथ जुड़े पोस्ट डाल रहें हैं। साल 1975 में लंबी बीमारी के बाद चेन्नई में उनका निधन हुआ था।

माओ के साथ डॉ राधाकृष्णन के कुछ किस्से ऐसे भी...

बात उस समय की है जब राधाकृष्णन चीन दौरे पर थे। उस वक्त माओ राजनीति से घिरे चीन के जानेमाने नेता थे। राधाकृष्णन कुछ भारतीय अधिकारियों के साथ माओ के न्यौते पर उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। आंगन में दाखिल होते ही माओ ने उनका स्वागत किया और दोनों नेताओं ने आपस में हाथ मिलाया। बाद में राधाकृष्णन ने माओ का गाल थपथपाया। माओ को यह अजीब जरूर लगा लेकिन कुछ कह न पाए। तभी राधाकृष्णन ने माओ से कहा, “अध्यक्ष महोदय, परेशान मत होइए। मैंने यही स्टालिन और पोप के साथ भी किया है।”

इस दौरान जब माओ और राधाकृष्णन एक साथ बैठकर खाना खा रहे थे तभी माओ ने खाते-खाते प्यार जताते हुए चॉपस्टिक से अपनी प्लेट से खाने का एक कौर उठा कर राधाकृष्णन की प्लेट में रख दिया। फिर क्या, राधाकृष्णन ने भी उनके इस स्नेह का सम्मान किया और उसे खा लिया। आप को बता दें कि डॉ साहब शाकाहारी थे। इसके बावजूद उन्होंने माओ को उनकी अनजाने में की गई गलती का एहसास नहीं होने दिया।

ऐसा ही एक और किस्सा है राधाकृष्णन और माओ से जुड़ा। चीन यात्रा पर जाने से पहले राधाकृष्णन कंबोडिया गए थे। यहां उनके साथ गए सहयोगी की गलती के चलते कार के दरवाजे से राधाकृष्णन की उंगली की हड्डी टूट गई थी। राधाकृष्णन जब चीन पहुंचकर माओ से मिले तो उनकी नज़र उंगली पर गई जिसे देखकर वे भावुक हो गए और तुरंत ही अपने डॉक्टर को बुलाया। बाद में राधाकृष्णन की उंगली की मलहम-पट्टी की गई।

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