साहब… हमें 100 कैरेट टमाटर सड़क पर फेंकने पड़े, बर्बाद हो गए 3.5 लाख रुपए

साहब… हमें 100 कैरेट टमाटर सड़क पर फेंकने पड़े, बर्बाद हो गए 3.5 लाख रुपएफिर मुश्किल में टमाटर उत्पादक किसान। 

“टमाटर की खेती ने हमें बर्बाद कर दिया साहब… मैं एक छोटा सा किसान हूं… खेत में टमाटर की करीब साढ़े तीन से चार लाख रुपए की लागत आई, मगर अब टमाटर को कोई पूछने को तैयार नहीं है, लागत तक नहीं निकल रही है, अब किसान क्या करे… हम मजबूर हैं, जो हमें 100 कैरेट टमाटर सड़क पर फेंकना पड़ा।“ रुंधी आवाज में अपनी परेशानी बताने वाले ये किसान होशियार सिंह हैं।

यह हाल सिर्फ मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के गाँव कुटनासिर के किसान होशियार सिंह तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बाड़ी और बकतरा इलाके से भी ऐसे मामले सामने आए हैं। जहां भाव देखकर किसान अपने खेत में टमाटर की तोड़ाई तक नहीं कर रहे हैं। मध्य प्रदेश से इतर, बिहार, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी हाल में किसानों ने सड़कों पर टमाटर फेंक कर सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया है।

किसान होशियार सिंह ‘गाँव कनेक्शन’ से फोन पर बातचीत में आगे बताते हैं, “मैंने 5 एकड़ में टमाटर की खेती की थी, मगर तोड़ाई तक का पैसा नहीं निकल सका, व्यापारी 20 रुपए हर कैरेट पर दे रहा है और हमारी एक कैरेट की तोड़ाई ही 20 से 25 रुपए आती है। जब मैंने टमाटर लगाए थे उस वक्त 2000 रुपए कैरेट का रेट था, अब कोई पूछ नहीं रहा।“

अगर देखा जाए तो होशियार सिंह का लगभग साढ़े पांच लाख का नुकसान हुआ है। जब होशियार सिंह ने टमाटर की खेती शुरू की, तब कैरेट का भाव 2,000 रुपए था। होशियार सिंह को उम्मीद थी कि यह भाव खेती पूरी होने तक और भी बढ़ जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। किसान होशियार को न सिर्फ अपनी लागत गंवानी पड़ी, बल्कि कम से कम 100 कैरेट के हिसाब से उसका दो लाख रुपए का नुकसान भी हुआ, यानि लगभग साढ़े पांच लाख का नुकसान उठाना पड़ा।

थोक महंगाई दर भी तेजी से नीचे गिरी, नुकसान सिर्फ किसान का

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में किसान ने फेंका टमाटर।

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दूसरी ओर खुदरा महंगाई दर के बाद बीते तीन महीनों में सब्जियों के थोक महंगाई दर भी तेजी से नीचे गिरी है। पिछले साल फरवरी में थोक महंगाई दर का जो आंकड़ा 5.51 प्रतिशत था, वह बीती फरवरी में 2.48 प्रतिशत पर आ गिरा। पिछले तीन महीनों पर गौर करें तो दिसंबर 2017 में थोक महंगाई दर 3.58 फीसदी थी और जनवरी में यह आंकड़ा 2.84 प्रतिशत पर आ गिरा। हाल में सब्जियों के दाम तेजी से नीचे गिरे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि महंगाई कम करने के लिए सरकार किसानों की बलि दे रही है।

पांच एकड़ टमाटर ही क्यों, इस बारे में पूछने पर होशियार कहते हैं, “कम लगाओ तो मंडी ले जाने में खर्च चले जाते हैं... कारोबारी तभी खेत आते हैं जब ज्यादा माल मिले, इसलिए हमारे क्षेत्र में किसान 3 से 5 एकड़ टमाटर या दूसरी खेती करते हैं, हमारे मुख्यमंत्री को चाहिए था कि सूप बनाने वाली फैक्ट्री लगवा दें, मगर कुछ नहीं होता।“

बीती फरवरी को बिहार राज्य के समस्तीपुर जिले की मूर्तिपुर सब्ज़ी मंडी में जब किसान अपने टमाटर को लेकर गए तो व्यापारी उसे मुश्किल से एक रुपए किलो के हिसाब से खरीदने को तैयार थे। सिर्फ एक रुपए कीमत मिलने पर किसानों ने मंडी परिसर के बाहर सरकार के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया और परेशान किसानों ने सड़क पर ही अपने टमाटर फेंक दिए।

बिहार में मंडी के बाहर किसानों ने सड़कों पर फेंका टमाटर।

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यहां अखिल भारतीय किसान महासभा के राज्य सह सचिव राजेंद्र पटेल ने गाँव कनेक्शन को बताया, “किसानों को उनकी टमाटर की उपज का मूल्य तो छोड़िए, उन्हें उसकी तुड़वाई तक नहीं निकल पा रही है। व्यापारी मुश्किल से एक रुपए किलो टमाटर खरीद रहे हैं, ऐसे में किसान सड़कों पर टमाटर फेंकने को मजबूर हैं।''

दसूरी ओर इसी माह छत्तीसगढ़ राज्य में भी कुछ ऐसा ही टमाटर उत्पादक किसानों के सामने देखने को मिल रहा है। राज्य के बालोद, धमतर, राजनांदगाँव समेत कई जिले टमाटर की पैदावार के लिए मशहूर हैं। मगर यहां भी व्यापारी किसानों से 1 से 2 रुपए प्रति किलो टमाटर खरीद रहे हैं। ऐसे में कई किसानों ने बेचने से इंकार कर टमाटर को फेंकने पर मजबूर हुए हैं।

छत्तीसगढ़ के धमूधा ब्लॉक के पारसोली गाँव के किसान रामचंद्र साहू के अनुसार, व्यापारी एक से दो रुपए प्रति किलो खरीद रहे हैं, जबकि टमाटर की पूरी लागत को जोड़ लें तो एक किलो में लागत ही साढ़े चार रुपए से ज्यादा है। ऐसे में भला किसान क्या करे।

महीनों खेत में कड़ी मेहनत के बाद भी अपनी उपज पर घाटा उठा रहे किसानों के सामने यह स्थिति पहली बार नहीं है, इससे पहले भी किसानों को सड़कों पर अपनी उपज फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ा था। राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किसानों को समस्याओं को देखते हुए फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की योजना तैयार की थी, मगर यह योजना भी नौकरशाही की लापरवाही की शिकार हो गई।

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