चकबंदी का चक्रव्यूह : भारत में 63 साल बाद भी नहीं पूरी हुई चकबंदी 

चकबंदी का चक्रव्यूह : भारत में 63 साल बाद भी नहीं पूरी हुई चकबंदी चकबंदी के जरिए किसानों की बिखरी हुई जमीनों को एकसाथ किया जाता है।

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लखनऊ। बढ़ती जनसंख्या और पारिवारिक विघटन के कारण खेतों के आकार लगातार छोटे होते जा रहे हैं। खेतों के टुकड़ों में बंट जाने से फसल की उत्पादकता में भी कमी आ रही है। ऐसे में चकबंदी के जरिए खेतों के बिखरे टुकड़ों का एक करने की मांग देशभर में हो रही है, लेकिन स्थिति यह है कि देश में 63 साल पहले शुरू हुई चकबंदी की प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो पाई है।

पंजाब और हरियाणा में चकबन्दी का कार्य पूरा किया जा चुका है। अब तक देशभर में 1,63,347 लाख एकड़ भूमि की चकबन्दी ही हो पोई है।

जहां से शुरुआत हुई, वहीं नहीं मानी जा रही मांगें

63 साल पहले 1954 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की जिस कैराना तहसील में चकबंदी की शुरुआत हुई थी, उसी कैराना तहसील के, जो अब शामली जिले में आती है, किसान चकबंदी की मांग लंबे समय से कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगों को माना नहीं जा रहा है। शामली जिले में चकबंदी को लेकर अभियान चला रहे एडवोकेट पवन सैनी ने बताया, “चकबंदी नहीं होने से यहां किसान परेशान हैं। स्थिति यह है जिले के आधा दर्जन से अधिक गाँवों के लोग लखनऊ से लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट तक चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।''

सैकड़ों बीघा जमीन पर अवैध कब्जा

चकबंदी नहीं होने का खामियाजा सबसे ज्यादा छोटे किसानों को उठाना पड़ रहा है। यहां के कुड़ान गाँव के किसान राजवीर चौधरी ने बताया, “यहां की हजारों बीघा सरकारी, ग्राम समाज, पट्टों, तालाबों और किसानों की जमीन पर भूमाफिया काबिज हैं। चकबंदी नहीं होने से गाँवों के अधिकतर तालाब सिर्फ सरकारी रिकार्ड में ही बचे हैं। सैकड़ों बीघा चारागाह, तालाब और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे हैं।“

तीन पीढ़ियों से चकबंदी अधूरी पड़ी

फोटो: गाँव कनेक्शन

यह अकेले इसी गाँव की कहानी नहीं है, बल्कि अलग-अलग हिस्सों में चकबंदी को लेकर किसानों का यही रोना है। गोरखपुर जिले में अफसरों की मनमानी के चलते चकबंदी को लेकर तीन पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन चकबंदी का कार्य पूरा नहीं हो सका है। चकबंदी के चक्कर में दादाजी भी जीवन भर परेशान रहे, अब नाती-पोते भी परेशान हैं। अफसरों के मनमानी रवैये से परेशान किसान शासन-प्रशासन से लगातार गुहार लगाते आ रहे हैं, वहीं कुछ किसान हाई कोर्ट की भी शरण में जा चुके हैं।

खड़ेसरी गाँव की परिस्थिति अब बदल चुकी है

गोरखपुर जिले के गोला तहसील के बड़हलगंज ब्लॉक के तहत खड़ेसरी ग्राम पंचायत में चकबंदी की प्रक्रिया चल रही है। वर्ष 1995 में खड़ेसरी गाँव का मालियत निर्धारित किया गया, उस समय यह कृषि योग्य भूमि थी। अब परिस्थिति बदल चुकी है। नगर पंचायत बड़हलगंज से खड़ेसरी गाँव करीब-करीब जुड़ गया है। इसके अलावा गाँव में ही मेडिकल कॉलेज शुरू हो गया है और फोरलेन भी प्रस्तावित है। जबकि चकबंदी अधिकारी वर्ष 1995 के मालियत के अनुसार, 2015 में चक निर्धारण की प्रक्रिया अपनाना शुरू की गई है। इसको लेकर किसान विरोध कर रहे हैं। दूसरी ओर, चकबंदी निदेशालय उत्तर प्रदेश में संयुक्त संचालक चकबंदी रवीन्द्र कुमार दुबे बताते हैं, “उत्तर प्रदेश में चकबंदी की प्रक्रिया ग्रामीणों की मांग पर जहां जरूरत है, वहां तेजी से चल रही है।“

ऐसे हुई चकबंदी की शुरुआत

देश के चकबंदी आजादी से पहले 1925 में सहकारी समिति के माध्यम से पंजाब राज्य में शुरू हुई थी। 1939 में संयुक्त प्रांत जोत चकबंदी अधिनियम बनाकर 6004 गाँवों मे चकबंदी हुई। आजादी के बाद 1954 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की कैराना तहसील और सुल्तानगंज जिले की मुसाफिरखाना तहसील में प्रयोग के तौर पर इसकी शुरुआत की गई थी। 1958 में इसे पूरे प्रदेश में लागू करने के साथ ही चकबंदी योजना के संचालन के लिए चकबंदी विभाग का गठन किया गया।

एक लाख से ज्यादा गाँव में चकबंदी नहीं

फोटो: गाँव कनेक्शन

चकबंदी निदेशालय उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में दो चरण की चकबंदी प्रक्रिया चलने के बाद भी 1,10,299 राजस्व गाँवों में आज तक चकबंदी नहीं हो पाई है। प्रदेश के 4,497 गाँवों में पिछले पांच साल से चकबंदी चल रही है, लेकिन आए दिन हंगामे और झगड़े के कारण चकबंदी अधिकारियों के न्यायालयों में हर दिन दर्जनों मामले आ रहे हैं।

क्या होती है चकबंदी

चंकबंदी के प्रभारी और सहायक चकबंदी अधिकारी बैजनाथ प्रजापति ने बताया, “चकबंदी में गाँव में किसान के मौजूद कई छोटे खेतों को यानि चकों को मिला कर एक या दो चक बनाया जाता है। आजकल जमीन बंटवारे के कारण छोटे-छोटे चक होने से खेती के लिए जरूरी सुविधाएं जुटाने मुश्किल हो रही है। ऐसे में चकबंदी के दौरान सभी खेतों तक जाने के लिए रास्ते की सुविधा मिल जाती है। इसके अलावा गाँव में सार्वजनिक हित के काम जैसे स्कूल, अस्पताल, खेल का मैदान, श्मशान और सामुदायिक भवन के लिए जमीन मुहैया हो जाती है।

चकबंदी का उद्देश्य

चकबंदी के पीछे मकसद यह है कि इससे किसानों की जगह-जगह बिखरे हुए जोतों को एक स्थान पर करके बड़ा चक बना दिया जाता है। जिससे चकों की संख्या कम होती है और किसानों को खेती करने में आसानी होती है। चकबंदी हो जाने से किसान एक ही बड़े जोत में अपने संसाधन का समुचित उपयोग कर पाते हैं, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है। माना जाता है कि चकबंदी होने से गाँवों में जमीन को लेकर जो झगड़े हैं, वह कम होने के साथ ही गाँव की सार्वजनिक भूमि पर जो लोग अवैध रूप से काबिज हैं, उनसे उस भूमि को मुक्त करा लिया जाता है। चकबंदी कृषि यंत्रीकरण में भी वृद्धि होती है, चकबंदी के दौरान खेतों की सिंचाई के लिए प्रत्येक चक को नाली और आवागमन की सुविधा के लिए चकमार्ग यानि चकरोट से जोड़ दिया जाता है। चकबंदी से पर्यावरण पर भी प्रभाव पड़ता है क्योंकि चकबंदी में गाँवों में वृक्षारोपण के लिए भी जमीन आरक्षित कर दी जाती है।

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