एक बार फिर वन्य अधिकार कानून के विरोध में सड़क पर उतरे आदिवासी

Mangal KunjamMangal Kunjam   23 July 2019 8:31 AM GMT

एक बार फिर वन्य अधिकार कानून के विरोध में सड़क पर उतरे आदिवासी

दंतेवाड़ा(छत्तीसगढ़)। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बीस लाख आदिवासियों के बेदखली के विरोध मं अलग-अलग राज्यों में आदिवासियों ने प्रदर्शन किया।

इस आन्दोलन का जन आक्रोश नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में भी देखने को मिला सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले हज़ारो की संख्या में ग्रामीण 'जल जंगल जमीन हमारा है, केंद्र सरकार होश आओ' जैसे नारो के साथ माँ दंतेश्वरी द्वार के सामने प्रदर्शन किया।

सर्व आदिवासी समाज के कानूनी सलाहकार सत्यनारायण कर्मा बताया, "दो मांगो को लेकर यहां सांकेतिक रैली के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया गया है। उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में वन अधिकार कानून 2006 के बारे में 24 जुलाई को फिर से सुनवाई होने वाली है, उनके रक्षा और मौलिक अधिकार को बचाये रखने की मांग को लेकर केंद्र और राज्य सरकार अपना जिम्मेदारी से पक्ष रखे।"

वो आगे कहते हैं, "दूसरे ज्ञापन में सात मार्च को केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एक पत्र द्वारा भारतीय वन कानून 1927 में संसोधन करने लिए परस्तव भेजा है। सात अगस्त तक राज्य सरकारो को जवाब देने के लिए समय दिया गया है। अगर यह प्रस्ताव कानून बन जाता है। तो वन विभाग को अधिकार दिया जाएगा कि वे गोली चला सकेंगे और अगर ये साबित कर देंगे कि गोली क़ानून के अनुसार चलाई गयी है तो उनके खिलाफ कोई करवाई नहीं होगी (धारा 66(2)जैसे अगर किसी के पास कुल्हाड़ी दरांती या अन्य औजार देखे गए तो उन्हें रोकने के लिए गोली मार सकते है? इन सारे उपरोक्त मुद्दे पर सरकार सकारात्मक करवाई करने और समुचित पैरवी करवाने के लिए राज्य सरकार को ज्ञापन दिया गया है।"


सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले दंतेवाड़ा में स्थानीय सभी समाज के लोग मेडका डोबरा में एकत्र हुए। वहां वनाधिकार कानून 2006 में संशोधन संबंधी चर्चा हुई। बताया गया कि 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। यदि सरकार के पक्ष में फैसला आता है तो इससे लाखों आदिवासी और वन क्षेत्र में परंपरागत रूप से रहने वाले अन्य समुदाय को बेदखल किया जा सकता है। इसके बाद उनके पास जीविकोपार्जन सहित अन्य कठिनाइयां होगी। लोगों को अधिकार देने की जगह उन्हें जमीन और परंपरागत वनाधिकारों से वंचित होना पड़ेगा। इसका विरोध आदिवासी समुदाय कर रहा है।

इसी तरह पिछले दिनों उत्तरप्रदेश के सोनभद्र के घोरावल कोतवाली क्षेत्र में जमीन विवाद के चलते दबंगों ने फायरिंग कर 10 आदिवासियों की हत्या कर दी। इतना ही नहीं आदिवासी अपने परिजनों का अंतिम संस्कार भी परंपरागत तरीके से नहीं कर पाए। पुलिस इस मामले में अनदेखी कर दबंगों को आश्रय दे रही है।

आदिवासी समाज की मांग है कि मामले की जांच एसटी एससी निवारण अधिनियम के तहत हो। फायरिंग में मारे गए परिवार को एक-एक करोड़ रूपए का मुआवजा और शासकीय नौकरी देने की मांग भी की गई है। आदिवासियों को जमीन का मालिकाना हक और इलाके में पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात करने की मांग शामिल है।


क्या है वन्य अधिकार कानून 2006

वन्य अधिकार कानून कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2006 में पास किया गया था। इस कानून में जंगलों में रहने वाले आदिवासी समूहों और वन्य निवासियों को संरक्षण देते हुए उनके पारम्परिक रहने के स्थानों को वापस देने का प्रावधान गया था।

इस कानून में सामुदायिक पट्टे का भी प्रावधान था, जिसके अनुसार ग्राम सभा के जंगल और जमीन पर अधिकार स्थानीय ग्राम सभा का ही होगा। वर्ष 2006 के इस कानून के अनुसार केंद्र सरकार को निर्धारित मानदंडों के अनुरूप आदिवासियों और अन्य वन-निवासियों को उनकी पारंपरिक वन्य भूमि को वापस सौंपना था। इसके लिए आदिवासी लोगों को कुछ निश्चित दस्तावेज दिखाकर जमीनों पर अपना दावा करना था। इसके बाद अधिकारी द्वारा इन दस्तावेजों के आधार पर आदिवासी और वन्य निवासियों के दावों की जांच करनी थी।

वृंदा करात की ओर से प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में दिसंबर, 2018 के सरकारी आंकड़े के अनुसार अभी तक इस कानून की मदद से 42.19 आदिवासियों में से सिर्फ 18.89 लाख आदिवासियों को ही उनकी भूमि वापस मिली है। मंगल कुंजाम के अनुसार, 'इस आंकड़े में भी कई आदिवासी ऐसे हैं जिन्हें कागज पर तो अधिकार दिया गया लेकिन कभी वास्तविक रूप से पट्टा नहीं दिया गया। कई बार अधिकारी ही आदिवासियों को उनका हक देने में आना-कानी करते हैं।'

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