स्मॉग से सबसे ज्यादा परेशानी सांस के मरीजों को

स्मॉग सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच रहा है, इससे फेफड़ों का संक्रमण और सांस की नली में सूजन हो रही है

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   22 Nov 2019 12:00 PM GMT

स्मॉग से सबसे ज्यादा परेशानी सांस के मरीजों कोप्रतीकात्मक तस्वीर-साभार: इंटरनेट

वायु प्रदूषण हमारी सेहत पर कई तरह के बुरे असर डाल रहा है। जहरीली हवा से अस्थमा, दिल से जुड़ी बीमारियां और सांस लेने में दिक्कतें हो रही हैं। प्रदूषण का बढ़ता स्तर स्मॉग की स्थिति पैदा कर रहा है। वायु प्रदूषण में इजाफा हो रहा है। प्रदूषण के कण, कोहरे और नमी से मिलकर स्मॉग बनाते हैं। स्मॉग सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच रहा है, इससे फेफड़ों का संक्रमण और सांस की नली में सूजन हो रही है।

किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍वविद्यालय, लखनऊ के डिपार्टमेंट ऑफ पल्‍मोनरी एंड क्रिटिकल केयर के विभागाध्‍यक्ष डॉ. वेद प्रकाश ने बताया, " इस समय स्मॉग से देश के ज्यादातर शहर जूझ रहे हैं। स्मॉग की वजह से सांस से जुड़ी बीमारियां के फेफड़े, ह्दय रोग और चर्म रोग जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी सांस लेने वाली बीमारी सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) के मरीजों को हो रही है। सीओपीडी फेफड़े से जुड़ी बीमारी होती है जो सांसों को अवरुद्ध करती है और इससे सांस लेने में मुश्किल होती है। क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज अभी तक बीड़ी या सिगरेट पीने वालों में ही ज्यादातर देखने को मिलती थी लेकिन अब ये बीमारी उन लोगों में भी तेजी से हो रही जो स्मोकिंग नहीं करते। इसके पीछे सिर्फ खतरनाक होता वायु प्रदूषण और स्मॉग है।"

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वर्ष 2017 में, हृदय रोग के बाद क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) भारत में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण था। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी, 2018 के अनुसार 2017 में लगभग 10 लाख भारतीयों की मृत्यु इस रोग के कारण हुई है। भारत में होने वाली कुल मौतों में से 13 फीसदी सीओपीडी के कारण हुई है और 2016 में 75 लाख लोगों को बीमारी का खतरा था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2018 में बताया था। पश्चिम में सीओपीडी के अधिकांश मामले तम्बाकू के सेवन या धूम्रपान के कारण होते हैं, लेकिन भारत सहित विकासशील देशों में, अधिकांश सीओपीडी इनडोर और बाहरी वायु प्रदूषण से होते हैं, विशेष रूप से जलने वाले बायोमास, लकड़ी और गोबर से निकलने वाले प्रदूषण से।

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" वायु प्रदूषण की मौजूदा स्थिति ने सीओपीडी को चिंता का सबब बना दिया है। सीओपीडी की एक प्रमुख बीमारी है। उत्तर प्रदेश में लगभग 60 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। यह बीमारी लम्बे समय तक धूल, धुआं व गर्दा के दुष्प्रभाव से होती है। इस बीमारी के लक्षण 30 वर्ष की उम्र के बाद प्रारम्भ होते हैं। सबसे पहला लक्षण सुबह-सुबह खांसी आना होता है। इसके बाद धीरे-धीरे सर्दी के मौसम में एवं फिर बाद में साल भर खांसी आती रहती है। सीओपीडी सिर्फ फेफड़े की ही बीमारी नही है, बल्कि बीमारी की तीव्रता बढ़ने पर हृदय, गुर्दा व अन्य अंग भी प्रभावित हो जाते है। शरीर कमजोर हो जाता है, भूख कम लगती है तथा हड्डियां भी कमजोर हो जाती हैं।" डा. वेद आगे बताया।

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स्मॉग शब्द स्मोक (धुआं) और फॉग (धुंध) से बना है। ठंड के मौसम में तापमान में गिरावट और वातावरण में नमी बढ़ने के साथ हवा में मौजूद जहरीली गैसें जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड और हाइड्रो कार्बन के मोटे कण जमीन से थोड़ा ऊपर हवा में एक आवरण बना लेते हैं, जिन्हें हम स्माग कहते हैं। देखने में यह बिल्कुल धुंध जैसे दिखाई देते हैं।

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नेशनल चेस्ट सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र प्रसाद बताते हैं, " विकासशील देशों में सीओपीडी से होने वाली करीब 50 प्रतिशत मौतें बायोमास के धुएं के कारण होती हैं, जिसमें से 75 प्रतिशत महिलाएं हैं। बायोमास ईंधन लकड़ी, पशुओं का गोबर, फसल के अवशेष, धूम्रपान करने जितना ही जोखिम पैदा करते हैं। इसीलिए महिलाओं में सीओपीडी की करीब तीन गुना बढ़ोतरी देखी गई है। खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और लड़कियां रसोईघर में अधिक समय बिताती हैं।"

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