पत्नी की यातनाओं से परेशान पति को मिला तलाक, देना होगा एक करोड़ का फ्लैट और गुजारा भत्ता

पत्नी की यातनाओं से परेशान पति को मिला तलाक, देना होगा एक करोड़ का फ्लैट और गुजारा भत्तासुप्रीम कोर्ट ने कहा पत्नी ने लगाए झूठे आरोप।

नई दिल्ली। उदयपुर के राज तलरेजा का विवाह 1989 में कविता तलरेजा से हुआ था। शादी के लगभग 10 साल बाद तक दोनों साथ रहे। लेकिन 1999 से आपसी मनमुटाव के कारण दोनों अलग रहने लगे। इसके एक साल यानि 2000 में राज ने पत्नी कविता से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर दी। इस याचिका के बाद पत्नी ने राज के खिलाफ कई शिकायतें कीं।

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17 साल से यह मामला कोर्ट में चल रहा था। आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी की झूठी शिकायतें निश्चित रूप से पति को बदनाम करने के मकसद से की गईं थी। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत यह क्रूरता के दायरे में आता है। हालांकि यह हो सकता है कि पति के तलाक की याचिका दायर करने पर पत्नी ने गुस्से में यह कदम उठाया हो, लेकिन कानून किसी भी नागरिक को झूठी और मनगढ़ंत शिकायतें करने की इजाजत नहीं देता। पति को परेशान करने का यह हथकंडा पति को अलग रहने और तलाक पाने का हक देता है।

देना पड़ेगा एक करोड़ रुपये का फ्लैट और 50 लाख रुपये गुजारा भत्ता

सुप्रीम कोर्ट ने भारी-भरकम आर्थिक भत्ते के साथ 17 साल से पत्नी की यातनाओं के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ रहे पति की तलाक की चाहत को पूरा कर दिया सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में तलाक की मांग कर रहे पति से कहा कि वह पत्नी को एक करोड़ रुपए का फ्लैट 50 लाख रुपए एकमुश्त गुजारा-भत्ता दे ताकि वह सम्मानपूर्वक अपना जीवन यापन कर सके। जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने कहा कि पत्नी ने पति के खिलाफ लगातार झूठी शिकायतें कीं। स्थानीय पुलिस से लेकर राजस्थान के मुख्यमंत्री और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को शिकायती पत्र लिखे। पुलिस ने जांच में पत्नी की शिकायतों को फर्जी पाया। पुलिस ने झूठी एफआईआर दर्ज करने के आरोप में पत्नी के खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत उलटा उसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया। दोनों अदालतों ने पत्नी के उस बयान पर ज्यादा भरोसा जताया जिसमें कहा गया था कि उसका पति अलग रहने के बावजूद अक्सर उसके पास आता है और वह उसके वैवाहिक दायित्वों को निभाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि झूठी शिकायतों के ठोस प्रमाण को नजरअंदाज करके दोनों अदालतों ने महिला के बयान पर यकीन किया जो कानूनी रूप से जायज नहीं है।

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