झंझट से बचने के लिए पहले ही समझ लें चकबंदी की प्रक्रिया

किसानों को सहूलियत देने के लिए चकबंदी की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन यही चकबंदी आज किसानों के लिए सबसे बड़ा सिर दर्द बन रही है। इसका कारण है सही समय पर उन्हें जानकारी न हो पाना ...

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झंझट से बचने के लिए पहले ही समझ लें चकबंदी की प्रक्रिया

लखनऊ। किसानों की सहूलियत के लिए शुरू की गई चकबंदी की प्रक्रिया काफी अहम होती है, लेकिन इस प्रक्रिया की जानकारी किसानों को काफी कम होती है या गाँव स्तर पर कुछ प्रभावशाली लोग इस प्रक्रिया से आम लोगों को दूर रखना ही बेहतर समझते हैं। इससे पैदा होती है झगड़े की स्थिति। अगर किसान लगातार चकबंदी प्रक्रिया पर नजर रखें और जानकारी लेते रहे तो अपनी ज़मीन से छेड़छाड़ को रोक सकते हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है चकबंदी?

चकबंदी का उद्देश्य है कि किसानों की कई जगहों पर फैली ज़मीन को एक साथ करके उनकी मेहनत को बचाया जाना होता है। मगर किसानों को जानकारी न होने और समय पर चकबंदी प्रक्रिया में भाग न ले पाने से उनका बड़ा नुकसान हो जाता है। इसलिए जरूरी है गाँव में अगर चकबंदी हो रही है तो हमेशा जानकारी लेते रहें।

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कैसे होती है चकबंदी?

महेन्द्र सिंह, उपायुक्त, चकबंदी विभाग, उत्तर प्रदेश

चकबंदी प्रक्रिया को समझाते हुए उत्तर प्रदेश में चकबंदी विभाग के उपायुक्त महेन्द्र सिंह 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "सबसे पहले चकबंदी के लिए ग्रामसभा प्रस्ताव देती है,

चकबंदी विभाग के अधिकारी पड़ताल करने के बाद रिपोर्ट देते हैं कि यह गाँव चकबंदी के लायक है या नहीं, उसके बाद ही जिलाधिकारी द्वारा प्रदेश सरकार को प्रस्ताव भेजा जाता है, उसके बाद सरकार द्वारा धारा-4 लगाने के बाद चकबंदी की प्रक्रिया शुरू होती है।"

ग्राम पंचायत में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू होते ही राजस्व के रिकार्ड तहसील से चकबंदी विभाग को दे दिए जाते हैं। "जब चकबंदी पूरी हो जाती है तो धारा-52 लगा दी जाती है। मतलब चकबंदी पूरी। जिसके बाद राजस्व रिकॉर्ड तहसील को फिर से पहुंचा दिए जाते हैं," उपायुक्त महेन्द्र सिंह बताते हैं।

चकबंदी प्रक्रिया के दौरान पड़ताल का काम बहुत महत्वपूर्ण होता है, इस दौरान यह देखा जाता है कि खतौनी में किसकी कितनी ज़मीन दर्ज है और मौके पर कितनी है। कहां किसकी ज़मीन में ट्यूबवेल लगा है, कहां कुआं।

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"पड़ताल में लिखते हैं कि मौके पर कितना पाया गया। उसके बाद उसकी मालियत लगाई जाती है। अगर किसी की सबसे अच्छी ज़मीन होती है उसकी कीमत ज्यादा होती है। जो खराब होती है उसकी कम होती है। सबसे अच्छी जमीन की कीमत सौ पैसे होती है, सबसे कम पैसे में चालीस पैसे में लगाई जाती है," उपायुक्त चकबंदी महेन्द्र सिंह बताते हैं।

किसानों की भलाई के लिए शुरू की गई चकबंदी की प्रक्रिया में विवाद से जुड़ने के बारे में समझाते हुए महेन्द्र सिंह करते हैं, "चकबंदी में हम सब के साथ अच्छा कर नहीं पाते हैं। किसी को अच्छा चक (खेत) मिल जाता है, तो किसी का नुकसान हो जाता है। नब्बे प्रतिशत तक तो सही होता है, उसके बाद 10 प्रतिशत तो उड़ान चक बनते ही हैं जिसे लेकर लोग विवाद करते हैं।"

'उड़ान चक' उन्हें कहा जाता है जो किसी किसान को मूल स्थान से दूर दे दिए जाते हैं। इसके साथ ही, चकबंदी के दौरान दो से पांच प्रतिशत तक की कटौती की जाती है। बचत की ज़मीन को खेलकूद, पंचायत घर के लिए छोड़ दिया जाता है।

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चकबंदी अधिकारी मोहम्मद असलम बताते हैं, "सबसे मुश्किल काम होता है कब्जा दिलाना। किसान बोलता है हम नहीं देंगे कब्जा। जब कोई किसान संतुष्ट नहीं होता है तो मुकदमा फाइल कर देता है। कब तक यह मुकदमा निपटे यह फिक्स नहीं होता है," लेकिन आगे कहते हैं, "अगर एक बार कागज पर चक बदल गया, तो मुकदमा निपटने के बाद ही उसकी यथा स्थिति हो सकती है। मुकदमे के बीच में जिसे जो दे दिया जाता है वही लेना पड़ता है।"

क्या होते हैं 'चक आउट'खेत?

महेन्द्र सिंह बताते हैं, "बाग, मकान या आबादी से लगा हुआ खेत है, तो उसे चकबंदी से बाहर कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया पड़ताल के बाद की जाती है।"

कौन करता है पूरे पंचायत की चकबंदी की प्लानिंग?

सहायक चकबंदी अधिकारी (एसीओ) की टीम में कानूनगो और लेखपाल का काम महत्वपूर्ण होता है।

महेंद्र सिंह बताते हैं, "सहायक चकबंदी अधिकारी सबसे पहले चक काटने की योजना बनाता है, जो प्लानिंग बनाने का काम होता है वो सहायक चकबंदी अधिकारी का काम होता है, यही चक काटने की योजना बनाता है, वह जितनी अच्छी योजना बना देता है उतने ही विवाद कम होते हैं।"

अगर चकबंदी से किसान असंतुष्ट हैँ तो क्या करें?

अगर कोई चकबंदी से असंतुष्ट है तो एसीओ के बाद चकबंदी अधिकारी (सीओ) के यहां अपील कर सकते हैं। इसके बाद एसओसी फिर डीडीसी के यहां अपील की जाती है। इसके बाद हाई कोर्ट में अपील की जाती है।

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