विशेष : बजट पर 5 राज्यों के किसान और जानकार क्या बोले ?

विशेष : बजट पर 5 राज्यों के किसान और जानकार क्या बोले ?किसानों की मिलीजुली प्रतिक्रिया।

पशुपालकों और मछलीपालकों को आम किसानों की तरह केसीसी देने की घोषणा हुई है, यानि उन्हें पहले जहां 10-12 फीसदी पर कर्ज मिलता था अब 4-7 फीसदी पर मिलेगा। ऑपरेशन ग्रीन की बात हुई, जिसमें क्लस्टर बनाकर फल और सब्जियों की खेती होगी

नरेंद्र मोदी सरकार के 2018-19 के आम बजट से किसानों के बहुत उम्मीदें थीं। हमने बात की देश के अलग-अलग राज्यों के किसानों और कृषि विशेषज्ञों से और पूछा क्या यह बजट उनकी उम्मीदों पर खरा उतरा ? वे यह बोले :

बिहार के युवा और प्रगतिशील किसान राजदेव कुमार को भी बजट उम्मीद भरा तो लगता है लेकिन ये उम्मीदें पूरी हो पाएंगी इसमें उन्हें शक है। राजदेव गया जिले में मशरुम की खेती करने वाले किसान हैं। उनका एक मशरुम लैब सेंटर भी है। जिस समय गांव कनेक्शन ने उनसे संपर्क किया वह किसानों को मशरुम की खेती पर ट्रेनिंग दे रहे थे। बजट पर उन्होंने कहा, बजट में किसानों के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं का ऐलान करना आसान है लेकिन इनका फायदा तो तभी होगा जब इनका पालन होगा। ये योजनाएं लागू तो हों। अगर ऐसा हुआ तभी किसान मानेगा कि सरकार ने उसके भले के लिए कोई ठोस कदम उठाया है।

कमल पांडेय पटना, बिहार के ऐसे युवा सीमांत किसान हैं जो कुछ समय पहले तक परिवार की संयुक्त जमीन पर खेती कर रहे थे। जब जमीन बंटी तो उनके हिस्से में इतनी कम जमीन आई जिसपर खेती करके परिवार का पेट पालना मुमकिन नहीं था। लिहाजा कमल नौकरी की तलाश में दिल्ली चले गए। बजट पर राय मांगी तो बोले, उम्मीदों भरा बजट है और उम्मीदों पर तो दुनिया कायम है। लेकिन ये उम्मीदें बजट की घोषणा वाले दिन तक ही दिखाई देती हैं। इसके बाद ना तो इनका जिक्र मीडिया में होता है और ना ही सरकारी विभाग इनका प्रचार करते हैं।

मजदूर और किसानों को जब पता ही नहीं तो अपना हक कैसे मांगेगे। इतना होने पर भी कमल को भरोसा है कि जिस तरह से शहरों में भीड़ बढ़ रही है, नौकरी के लिए मारामारी हो रही है आने वाले दिन में खेती में ही संभावना बचेगी। कमल का सपना है कुछ पूंजी वगैरह जुटाकर गांव लौटेंगे और अपनी चार कट्ठा जमीन पर मुर्गी पालन वगैरह करेंगे।

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मोदी सरकार द्वारा बजट में न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा से हरियाणा के विक्रम खुश हैं और इसका स्वागत करते हुए कहते हैं कि अगर यह लागू होती है तो निश्चित ही किसानों का फायदा होगा

हरियाणा के सोनीपत में छतेरा बहादुरपुर के युवा किसान विक्रम (30 वर्ष) मोदी सरकार द्वारा बजट में न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा से खुश हैं और इसका स्वागत करते हुए कहते हैं कि अगर यह लागू होती है तो निश्चित ही किसानों का फायदा होगा। लेकिन इसी गांव के जोगिंदर सिंह वित्तमंत्री के इस दावे पर ऐतराज जताते हैं कि रबी की फसलों के एमएसपी में लागत का 50 फीसदी से अधिक लगभग लागू किया जा चुका है। जोगिंदर का कहना है कि यदि ऐसा ही खरीफ़ की फसलों को लेकर हुआ तो फिर क्या फ़ायदा क्योंकि रबी में मूल्य उचित नहीं मिल रहा है।

जोगिंदर सिंह और विक्रम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ ना मिलने और जबदस्ती (अनिवार्य) इसके लिए बैंकों द्वारा प्रीमियम काट लेने से नाराज़ हैं। इनका कहना है कि अगर किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) ले रखा है तो बैंक अपने-आप फसल बीमा का पैसा काट तो लेती है लेकिन पिछले जब इनकी फसल बर्बाद हुई तो मुआवज़ा नहीं मिला।

ये किसान और पशुपालकों के लिए उम्मीदों वाला बजट है। पशुपालकों और मछली पालकों को केसीसी दिए जाने से उन्हें सस्ता कर्ज मिल सकेगा।
डॉ. अनूप कालरा , पशुधन विशेषज्ञ और सीईओ आयुर्वेट

पशुधन विशेषज्ञ और आयुर्वेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अनूप कालरा बजट को किसान और पशुपालकों के लिहाज से उम्मीदों वाला बताते हैं। बजट के कुछ बिंदुओं पर फोकस करते हुए वह कहते हैं, पशुपालकों और मछलीपालकों को आम किसानों की तरह केसीसी देने की घोषणा हुई है, यानि उन्हें पहले जहां 10-12 फीसदी पर कर्ज मिलता था अब 4-7 फीसदी पर मिलेगा।

ऑपरेशन ग्रीन की बात हुई, जिसमें क्लस्टर बनाकर फल और सब्जियों की खेती होगी, ये अच्छी पहल है। किसानों की कंपनियों फार्मर प्रड्यूसर कंपनी पर टैक्स से राहत मिली है, इससे ज्यादा से ज्यादा कंपनियां बनेगी और उसका मुनाफा सीधे किसान को होगा। इसके साथ ही गांवों के लिए गोवर्धन योजना यानि स्वच्छ भारत के तहत गोबर की खाद बनाने के लिए जो प्रोत्साहन मिलेगा उससे देश के पशुपालकों का काफी लाभ होगा। औषधीय खेती को बढ़ावा देना भी सराहनीय है।

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हालांकि बजट में स्थायी खेती और पशुपालन पर किसी पहल की कमी उन्हें खलती है। डॉ. कालरा कहते हैं, पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने खेती और पशुपालन के समन्वय से जिस तरह की खेती की बात की थी वह भी इस बजट में नजर नहीं आई। अगर ऐसा होता तो बेहतर होता, फिलहाल ये बजट उम्मीदों वाला है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान गुजरात के पूर्व निदेशक एमएस बासु ने बजट पर अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, किसानों के लिए बजट ठीक हो सकता है, अगर इतना भी जमीन पर उतरे, वर्ना ज्यादातर चीजें जुमले जैसी हैं। लेकिन अच्छी बात ये रही कि सरकार की बातों में किसान की बात इतनी जोरशोर से हुई इसे गुजरात चुनावों के ग्रामीण इलाकों के नतीजों का असर माना जा सकता है। शायद सरकार ये समझ गई है कि किसानों को दरकिनार करने से बात नहीं बनेगी।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान गुजरात के पूर्व निदेशक एमएस बासु ने बजट पर अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, किसानों के लिए बजट ठीक हो सकता है, अगर इतना भी जमीन पर उतरे, वर्ना ज्यादातर चीजें जुमले जैसी हैं।

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के किसान कन्हैया लाल मेहता कहते हैं, पहली नजर में बजट किसानों के लिए ठीक लग रहा है, लेकिन आगे देखिए क्या होता है। क्या ये योजनाएं लागू हो पाएंगी, क्या लागत का डेढ़ गुना मूल्य मिल पाएगा। यह तो भविष्य ही बताएगा।

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के श्याम तिवारी के शब्दों में इस बजट में केवल अंकों की जादूगरी दिखाई गई है। मनमोहन सरकार की तुलना में फसलों के समर्थन मूल्य लागत से बहुत कम है। इससे किसानों को कुछ खास फायदा होने वाला नहीं है।

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मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के राकेश दुबे बजट को चुनावी जुमलों से भरा मानते हैं। उनका कहना है कि सरकारी रैवये को देखते हुए इसमें कोई भी घोषणा लागू करना मुमकिन नहीं लगता। किसानों की सहायता केवल किसान ही कर सकता है, उसे सरकार के भरोसे नहीं बैठना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में बागवानी विशेषज्ञ और एग्रो प्रोजेक्ट कंसल्टेंट फिरोज हसन कहते हैं, राजनेता क्या करेंगे किसानों के लिए। बस बजट में झांसा और लॉलीपॉप देंगे ताकि भोले-भाले किसानों का 2019 में वोट मिल जाए।

छत्तीसगढ़ के जिला दुर्ग के नोवेश्वर कुमार सवाल पूछते हैं, सरकार की जो स्कीमें आती हैं उनमें से कितनी आम लोगों तक पहुंचती हैं? सरकार योजनाएं लाती है उसे आसान बनाने की कोशिश करती है, लेकिन अधिकारी मुश्किल बना देते हैं। जब तक ये नहीं आसान होगा किसानों का भला नहीं हो पाएगा। मैं पशुपालन करता हूं, लेकिन सब्सिडी लेने में कितनी परेशानी होती है यह कोई नहीं जानता।

किसान मेहनत करके अपने खेतों में सब्जी उत्पादन करते हैं लेकिन न तो अपनी फसल बेचने के लिए नजदीक का कोई बाजार मिल पाता है और न ही उचित मूल्य। यूपी के ललितपुर जिले के धनीराम वर्मा कहते हैं, उचित भंडारण व्यवस्था के अभाव में हमारे उत्पाद सड़ जाते हैं इसलिए हम उन्हें औने-पौने दामों पर ही बेच देते हैं। धनीराम का सुझाव है कि सरकार को कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था न्याय पंचायत या ब्लॉक पर करनी चाहिए।

ललितपुर जिले के ही किसान शंकरलाल ने पशुपालकों को किसान क्रेडिट कार्ड देने की घोषणा को सार्थक कदम बताते हुए कहा, इससे पशुपालन में बढावा मिलेगा, अब ग्रामीण जानवरों को छुट्टा नही छोडेगे। उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार भी हो सकता है, लेकिन इसे सम्भव बनाने के लिए पूरी पारदर्शिता से धरातल पर उतारना पड़ेगा।

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बजट में सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को किसानों के लिए राहत वाली खबर मानते हुए ललितपुर जिले के कैलाश नारायण विश्वकर्मा कहते हैं, किसानों के उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित होने से अब वह कौड़ियों के भाव नहीं बिकेगा। लेकिन उनकी चिंता बरकरार है, वह कहते हैं जिन फसलों पर समर्थन मूल्य का निर्धारण होता है, उनके उत्पादों को बेचने के लिए बिचौलिए हावी रहते हैं, जिससे किसानों का शोषण होता हैं, व्यापारी इसका भरपूर फायदा उठाते हैं। किसानों का भला तभी होगा जब सरकार बिचौलिओं और दलालों को रोक पाएगी।

यूपी के जिला एटा के धीरेन्द्र सिंह राजपूत कहते हैं कि, खेती के लिए जो भी योजना बनेगी उससे तो लाभ ही होगा, जहां तक किसानों व गरीबो को मकान देने की बात बजट में कही गई उसमें पहले यह देख लिया जाए कि लाभ पात्र व्यक्ति को ही मिले, पहले की सरकारों द्वारा दी गयी योजनाओं का लाभ अपात्र लोग उठा रहे हैं उनकी भी जांच की जाए। गरीब किसान हमेशा ही छला जाता है।

एटा के ही रामनरेश का कहना है, किसानों के लिए बजट अच्छा है, लेकिन किसानों के लिए खेती में सबसे मुख्य चीज है खाद, अगर सरकार किसानों को उचित दाम पर खाद दें तो लाभ होगा।"

एटा के अलीगंज ब्लॉक के नेत्रपाल कहते हैं, सरकार ने आलू किसानों के लिए इस बजट में कुछ नहीं दिया, अभी अरबों रुपए का आलू सड़कों पर फेंका गया। आलू का मूल्य सही न मिलने के कारण आलू नष्ट हो गया इसकी भरपाई के बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए था।

एटा के ब्लॉक मारहरा के भरत सिंह ने बताया, "यह बजट किसान के लिए फायदेमंद साबित होगा। लेकिन गरीबों की पहचान कैसे होगी, जमीन के आधार पर या आया के आधार पर।

छोटेलाल एटा के ब्लॉक मारहरा के रहने वाले हैं, वह कहते हैं, फसल की लागत का अनुमान किसान कुछ और लगाता है और सरकार कुछ और। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह किसान के हिसाब से फसल की लागत का अनुमान लगाए।

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औरैया जिले के किसान रामआसरे कहते हैं, "सरकार ने कृषि के लिए बजट पेश किया लेकिन किसानों की आय दोगुनी कैसे होगी यह नहीं बताया। औरैया के ही धीरेंद्र कुशवाह के मुताबिक, सरकार ने बजट में कुछ स्तर तक किसानों का ध्यान रखा है मंडी में बिचौलियों की मध्यस्थता दूर हो जाये तो सही लाभ मिल सकेगा।

औरैया के सहार ब्लॉक के किसान निसार खान का कहना है, "बजट तो अच्छा लेकिन की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत खाद, बीज और पानी है। ये तीन चीजें समय से और बाजार से सस्ती कीमत पर मिले तो हमारे भी अच्छे दिन आ जाएं।

बिधूना ब्लॉक के गाँव रठगाँव के रमेश कुमार ने बताया, सरकार आलू किसानों की तरफ नहीं देख रही है न ही बजट में उनके लिए कुछ है। पिछली आलू की फसल के लिए जो कर्जा लिया था अभी तक नहीं चुका पाए हैं। किसान को तो सिर्फ मरना है चाहे कोई सरकार आये कोई लाभ नहीं है।

आलू के मुद्दे पर जिला कन्नौज के नरेंद्र सिंह (40 वर्ष) कहते हैं, “सरकार को सारा दोष देना ठीक नही है। जब बड़े किसान कोई दूसरी फ़सल नही करेंगे तो आलू की स्थिति ख़राब होगी ही, जिससे छोटे किसान को ज्यादा नुक़सान होता है।

कन्नौज के ही रनबीर सिंह कहते हैं, "सरकार का बजट तो सही है पर किसानों का भी दोष है। आलू की खेती कम करें। सरकार और किसान मिलकर काम करें तभी फायदा होगा। कन्नौज में सब्जी का व्यवसाय करने वाले अभय शरण का कहना है, सरकार को जमाखोरी रोकनी चाहिए। जैसे सरकार आलू और टमाटर के मूल्य में उतार-चढ़ाव के बारे में कदम उठा रही है उसी तरह प्याज के बारे में सोचना चाहिए। प्याज तो बाजार से गायब ही हो जाता है।

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यूपी के जिला फैजाबाद के किसान राकेश दूबे ने कहा, "इस बजट में खरीफ का समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से डेढ़ गुना करने की बात की गई है, लेकिन किसानों का तब तक भला नहीं होगा जब किसान खुद अपनी उपज का दाम नहीं निर्धारित करेगा, उसे कोई कोई फायदा नहीं होने वाला है। सरकार जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात कर रही है, लेकिन बाजार भी मिलेगा इसके बारे में नहीं बात की, हम किसान जैविक खेती करेंगे तो उसे बेचेंगे कहां, ये भी बात करनी चाहिए।

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