विशेष : छात्र संघ चुनाव की पहली सीढ़ी चढ़ रहे युवाओं को ये भी पढ़ना चाहिए 

विशेष : छात्र संघ चुनाव की पहली सीढ़ी चढ़ रहे युवाओं को ये भी पढ़ना चाहिए छात्र संघ चुनाव विशेष 

लखनऊ। पिछले कई महीनों की अशांति के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हो रहे छात्र संघ चुनावों को लेकर छात्रों में खासा उत्साह है। वोटों की गिनती शनिवार रात से ही शुरू होगी और रविवार सुबह तक नतीजे घोषित कर दिए जाएंगे।

पिछले दो चुनावों में यहां बीजेपी के छात्र संगठन एबीवीपी को ज़बरदस्त जीत मिली थी, ऐसे में यूपी में भी पार्टी की सरकार बनने के बाद उसकी साख दांव पर है। इस चुनाव को विपक्षी पार्टियों ने अपनी नाक का सवाल बना रखा है। अध्यक्ष पद पर एबीवीपी, समाजवादी छात्र सभा और एनएसयूआई में त्रिकोणीय मुकाबला है, जबकि कुछ पदों पर आइसा भी मजबूती से मैदान में हैं।

भारत में विश्वविद्यालय परिसर से कई छात्र नेता निकले जिन्होंने राज्यों और केन्द्र की राजनीति में खासा मुकाम बनाया।

बृजेश पाठक

बृजेश पाठक - 1990 में एलयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे। बाद में बसपा ज्वाइन की। 2004 में उन्नाव से लोकसभा सांसद बने। 2009 में चुनाव हारने के बाद बसपा ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया। इस बार बृजेश पाठक ने भाजपा के टिकट पर लखनऊ मध्य से चुनाव जीत विधानसभा तक का सफर तय किया है।

शैलेश सिंह - शैलू ने एलयू में महामंत्री से लेकर अध्यक्ष तक का चुनाव जीता। शैलू ने पहले बसपा ज्वाइन की, फिर भाजपा में चले गए। 2012 में बलरामपुर के गैसड़ी से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। लेकिन इस बार शैलू एक नजदीकी लड़ाई में बसपा के अलाउद्दीन को दो हजार मतों से हराने में सफल रहे।

अरविंद सिंह गोप - विधायक बनने के बाद अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। गोप को सीएम अखिलेश यादव का करीबी माना जाता है। अखिलेश ने इन्हें बाराबंकी की रामनगर से प्रत्याशी बनाया लेकिन इस बार उन्हें भाजपा के शरद कुमार अवस्थी ने करारी शिकस्त दे दी।

पवन पांडेय - 2012 से सपा को अयोध्या जैसी अहम सीट से जीत दिलाने वाले पवन पांडेय को सपा सरकार ने मंत्री पद का उपहार दिया। लेकिन इस बार पवन पांडेय जीत दोहरा नहीं सके। लखनऊ विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष रहे पवन की गिनती अखिलेश के करीबी नेताओं में रही है।

रिचा सिंह - इलाहाबाद पश्चिम से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी थीं। उन्होंने यहां की सिटिंग विधायक पूजा पाल को तो चुनाव में पछाड़ दिया लेकिन भाजपा के सिद्धार्थनाथ सिंह के हाथों हार गईं। रिचा 2015 से 2016 तक इलाहाबाद छात्र संघ की अध्यक्ष रहीं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 128 साल के इतिहास में रिचा पहली महिला हैं, जो अध्यक्ष बनीं।

लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से निकला एक और नाम अभय सिंह है। माफिया छवि के अभय सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में नब्बे के दशक की अपराध में लिप्त छात्र राजनीति की उपज माने जाते हैं। 2012 में पहली बार सपा के टिकट पर गोसाईंगंज से विधायक बनने में कामयाब हुए। लेकिन इस बार अभय सिंह जीत दोहराने में नाकामयाब साबित हुए।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाहुबली नेताओं में शुमार धनंजय सिंह इस बार निषाद पार्टी के टिकट पर मल्हनी से चुनाव लड़े लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। लखनऊ विश्वविद्यालय के जमाने में कभी अभय सिंह और धनंजय सिंह की दोस्ती खासी चर्चा में रहती थी लेकिन समय बीतने के साथ ही दोनों अलग हो गए। धनंजय सिंह विधायक और सांसद रह चुके हैं।

इन देश के शीर्ष नेताओं ने भी छात्र संघ की दहलीज पार की :-

दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र संघों का चुनाव हो रहा है। दिल्ली ही नहीं बल्कि देश कि विभिन्न विश्वविद्यालयों से चुने गए कई छात्र नेताओं का आज राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा कद है।

जानिए ऐसे 10 नेताओं के बारे में :-

सुषमा स्वराज – भारतीय जनता पार्टी

1970 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ हरियाणा में राजनीतिक करियर की शुरुआत की। पेशे से व़कील, 25 वर्ष की उम्र में हरियाणा में मंत्री बनी। 1990 में वे पहली बार राज्य सभा सदस्य बनीं। उन्होंने 1996 में दक्षिण दिल्ली से लोक सभा सीट जीती। उसके बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री, केंद्र में सूचना-प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, लोक सभा में विपक्ष की नेता और अब मौजूदा सरकार में विदेश मंत्री हैं।

लालू प्रसाद यादव – राष्ट्रीय जनता दल

पटना यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई करते हुए पटना यूनिवर्सिटी स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने। 1973 में फिर छात्र संघ चुनाव लड़ने के लिए पटना लॉ कॉलेज में दाखिला लिया, और जीते भी। फिर जेपी आंदोलन से जुड़े और छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष बनाए गए। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर लोक सभा चुनाव जीते। 29 साल के लालू यादव सबसे युवा सांसदों में से एक बने। 1990-97 के बीच लालू बिहार के मुख्यमंत्री रहे, लालू यादव यूपीए सरकार में 2004-09 तक रेल मंत्री भी रहे। फ़िलहाल वो राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

अजय माकन - कांग्रेस

1985 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के अध्यक्ष बने। राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले माकन फिर दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन संघ के अध्यक्ष बने। 1993, 1998 और 2003 में दिल्ली से विधायक चुने गए। 2004 में पहली बार लोकसभा में चुने गए और फिर आवास और शहरी विकास मंत्री, खेल मंत्री और गृह राज्य मंत्री रहे। साल 2015 में दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस की अध्यक्षता की, पर एक भी सीट नहीं जीत पाए। अब वो दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

ममता बनर्जी – तृणमूल कांग्रेस

1970 में कोलकाता में कांग्रेस के छात्र संगठन,'छात्र परिषद', के साथ जुड़ीं और तेज़-तर्रार महिला नेता के तौर पर उभरीं। आपातकाल और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में जादवपुर लोकसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ीं और दिग्गज वाम नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में 'पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस' की अध्यक्ष और फिर नरसिंह राव की सरकार में मानव-संसाधन मंत्री बनीं। 1997 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी, 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' बनाई और 14 साल बाद, 2011 में पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनीं।

सीताराम येचुरी – मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी

हैदराबाद में जन्में येचुरी ने कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली में पूरी की। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ते हुए 1974 में छात्र संगठन स्टुडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) से जुड़े। आपातकाल में जेल गए पर रिहा होने के बाद तीन बार जेएनयू के छात्र संघ का चुनाव जीता। फिर एसएफ़आई के पहले ऐसे अध्यक्ष बने जो केरल या पश्चिम बंगाल से नहीं थे। साल 2005 से येचुरी राज्य सभा सांसद हैं। इसी साल येचुरी निर्विरोध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए।

प्रफुल्ल कुमार महंत – असम गण परिषद

असम के गुवाहाटी में वकालत की पढ़ाई करते हुए प्रभावशाली छात्र संगठन, 'अखिल असम छात्र संघ' से जुड़े और 1979 में उसके अध्यक्ष बनाए गए। ग़ैर-असमिया लोगों के ख़िलाफ़ आंदोलन में प्रभावी नेता के तौर पर उभरे और 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ ऐतिहासिक असम समझौते पर हस्ताक्षर किए। 1985 में ही असम गण परिषद पार्टी बनी और उस साल पार्टी के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया। उस व़क्त वो देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2014 के आम चुनाव में एक भी सीट ना जीत पाने के बाद महंत ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। फ़िलहाल वो असम विधानसभा में विधायक हैं।

अरुण जेटली – भारतीय जनता पार्टी

Gaon Connection arun jaitley

1974 में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने। उसी दौर में जेपी आंदोलन में छात्र और छात्र संगठनों की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष बने। आपातकाल में डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा। जिसके बाद वकालत की पढ़ाई पूरी कर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील बने। एनडीए सरकार में क़ानून मंत्री बने, पांच साल तक भारतीय जनता पार्टी के महासचिव रहे और उसके बाद राज्य सभा में विपक्ष के नेता बने। अब मौजूदा सरकार में वित्त मंत्री हैं।

नीतीश कुमार – जनता दल यूनाइटेड

इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हुए छात्र नेता के तौर पर उभरे। बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने। फिर जेपी आंदोलन में जुड़े और युवाओं की 'छात्र संघर्ष समिति' में अहम भूमिका निभाई। 1975-1977 के बीच आपातकाल के चलते जेल जाना पड़ा। 1985 में लोक दल से विधायक चुने गए और 1989 के बाद छह बार लोकसभा की सीट जीती। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्रालय भी संभाला। नीतीश कुमार वर्ष 2005 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे।

डी राजा – कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया

तमिलनाडु के भूमिहीन खेत मज़दूरों के घर में पैदा हुए डी राजा अपने गांव में ग्रेजुएशन की डिग्री लेने वाले पहले छात्र बने। मद्रास विश्वविद्यालय से जुड़े कॉलेजों में पढ़ाई करते व़क्त छात्र राजनीति में कदम रखा। साल 1994 से डी राजा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय सचिव हैं। वर्ष 2007 में वो तमिलनाडु से राज्य सभा सांसद हैं।

सीपी जोशी – कांग्रेस

1973 में राजस्थान के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष बने। इसके बाद नाथद्वारा से विधायक का चुनाव जीता। चार बार विधायक बने और राज्य सरकार में कई मंत्रालय संभाले। 2008 के चुनाव में नाथद्वारा से एक वोट से हारे। 2009 में भीलवाड़ा लोकसभा सीट से जीत कर पहली बार सांसद बने। तत्कालीन यूपीए सरकार में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बने। राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके जोशी फ़िलहाल कांग्रेस पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता हैं।

रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ।

मनोज सिन्हा - आईआईटी बीएचयू से पढ़े मनोज सिन्हा की छवि काफी साफ सुथरी है। मनोज सिन्हा राजनीति में सक्रिय रहे और सिन्हा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष थे। 1989 में बीजेपी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य बने। 1996, 1999, 2014 में ग़ाज़ीपुर से सांसद बने। मोदी सरकार में रेल राज्य मंत्री बने, पीएम मोदी की नजर में उन्होंने वाराणसी के लिए अच्छा काम किया। मनोज सिन्हा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। पीएम मोदी और मनोज सिन्हा के बीच आरएसएस के दिनों से ही अच्छे संबंध हैं।

चंद्रशेखर - दस नवंबर 1990 से 21 जून 1991 के बीच 11वें प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व करने वाले चंद्रशेखर की बचपन से ही राजनीति में गहरी रुचि थी। छात्र राजनीति के दौर से ही उनके भीतर तेजतर्रार आदर्शवाद और क्रांतिकारी तेवर विद्‍यमान थे। 1950-1951 के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्‍यालय से राजनीति शास्त्र में स्नात्तकोत्तर डिग्री हासिल की और उसके बाद वह समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए। वे आचार्य नरेंद्र देव से बहुत करीब से जुड़े थे और सालभर के भीतर ही बलिया की जिला प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सचिव चुने गए। इसके पश्चात चंद्रशेखर ने 1955-56 के दौरान उत्तरप्रदेश प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव का पद भार संभाला।

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top