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यूपी बाढ़: हजारों एकड़ फसल, सैकड़ों गांव बाढ़ से तबाह, अपने ही हाथों घर तोड़ने को मजबूर हुए लोग

उत्तर प्रदेश में अब तक 17 जिले बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं। इस बाढ़ में एक बार फिर गाँव के गाँव तबाह हो गए हैं, खेतों से लेकर ग्रामीणों के घर तक नदी के कटान में डूब रहे हैं, तीन महीनों के बाद भी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।

बाढ़ के चलते यूपी के करीब 900 गाँव प्रभावित हो चुके हैं। दर्जनों गांव पूरी तरह पानी में समा गए हैं। हजारों एकड़ फसल और सैकड़ों एकड़ खेती योग्य जमीन नदी में कट गई है। जिनके यहां तक तक सैकड़ों कुंतल अनाज होता था उनमें से कई दाने दाने को मोहताज हो गए हैँ। लखीमपुर से मोहित शुक्ला और बाराबंकी से वीरेंद्र सिंह की आंखों देखी रिपोर्ट।

सालों पहले पाई-पाई जोड़ कर सियाराम ने बड़ी मेहनत से अपना घर बनाया था। उन्हें उम्मीद थी कि बुढ़ापे में आराम से रह सकेंगे, मगर आज सत्तर साल की उम्र में सियाराम खुद अपने ही घर में फावड़ा चला रहे हैं, उन्हें डर है कि मुश्किल से बीस कदम दूर बाढ़ में उफना रही सरयू नदी कभी भी उनका घर लील सकती है।

"घाघरा (अब सरयू नदी) का कटान बहुत तेज है। गाँव की जमीन बाढ़ में बही जा रही है, नदी घर तक पहुंच गई है, किसी भी वक्त हमारा घर कट जाएगा। इसलिए घर तोड़ रहे हैं कम से कम ईंट ही बच जाएंगी।" हाथ में फावड़ा लिए सियाराम कहते हैं।

सियाराम तिलवारी गाँव में रहते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले में सिरौलीगौसपुर तहसील का एक गाँव, जहाँ करीब तीन महीनों से ग्रामीण सरयू नदी में आई बाढ़ की चपेट में हैं। नदी के कटान तेज होने से इस गाँव में अब तक कई घर बाढ़ में डूब चुके हैं, जबकि सियाराम की तरह कई ग्रामीण अपना घर खुद ही तोड़ रहे हैं ताकि बंधे में कहीं ऊँची जगह पर जाकर रहने की कुछ व्यवस्था की जा सके।

बाराबंकी के सिरौली गौसपुर तहसील के गाँव तिलवारी में भी नदी के कटान की वजह ग्रामीण खुद अपना घर तोड़ रहे। फोटो : गाँव कनेक्शन

तिलवारी गाँव की यह तस्वीर बताती है कि बाढ़ से प्रभावित गांवों में हजारों ग्रामीण किस तरह अपनी फसलें, उपजाऊ जमीनें और घर बाढ़ में खो रहे हैं।

उनके पास रहने के लिए घर भी नहीं बचा है, सैंकड़ों बीघा खेत के खेत बाढ़ में समा गए, यहाँ तक कि परिवार के लोगों के लिए खाने-पीने के लिए भी उनके पास कुछ नहीं है, बाढ़ ने इनका सब कुछ छीन लिया, कुछ भी नहीं बचा। सिर्फ बाराबंकी नहीं, सीतापुर के बलेसरपुरवा, लखीमपुर जिले के धौराहरा ब्लॉक में भी दर्जनों ग्रामीणों के घर नदी में समा गए या फिर उन्होंने उन्हें बचाने के लिए खुद ही तोड़ने को मजबूर हुए।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के 17 जिलों के करीब 893 गाँव में रहने वाली तीन लाख से ज्यादा की आबादी बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुई है। इनमें अम्बेडकरनगर, अयोध्या, आजमगढ़, बहराइच, बलिया, बाराबंकी, बस्ती, देवरिया, फर्रूखाबाद, गोंडा, गोरखपुर, कासगंज, लखीमपुर खीरी, कुशीनगर, मऊ, शाहजहांपुर और सीतापुर जिले शामिल हैं। हालांकि तीन सितंबर तक बाढ़ का पानी कम होने से प्रभावित जिलों की संख्या 14 रह गई।

बाराबंकी की बात करें तो जिले की तीन तहसीलें रामनगर, रामसनेहीघाट और सिरौलीगौसपुर में अब तक 88 गाँव बाढ़ से प्रभावित हैं। इन गांवों में बाढ़ से अब तक सात लोगों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। जिला प्रशासन के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इन गांवों में 60,785 की आबादी बाढ़ की चपेट में है, जबकि ग्रामीणों के साथ 16,300 पशु भी बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। इन 88 गांवों में से तीन गाँव ऐसे हैं जहाँ नदी के कटान की वजह से गांव में जाने के लिए रास्ता भी नहीं बचा है। तिलवारी गाँव इन्हीं में से एक है।

तिलवारी गाँव में दूर तक किसानों के खेत के खेत डूबे नजर आते हैं, जबकि मटमैले और गंदे पानी में गाँव के रास्ते पहले ही गायब हो चुके हैं। अब ग्रामीणों के घर भी इस नदी के कटान के जद में हैं।

रैनी गाँव में नदी के पास छप्पर के नीचे अपनी बच्ची के साथ बैठी एक ग्रामीण महिला। फोटो : गाँव कनेक्शन

तिलवारी गाँव की ममता सिंह 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "घाघरा नदी के कटान में अब तक चार-पांच घर बाढ़ में बह चुके हैं, और बाकी कई घर नदी के कटान के जद में हैं, हम बुरी तरह फंसे हुए हैं और इसकी सूचना भी हम अधिकारियों को दे चुके हैं, मगर अब तक कोई सरकारी मदद हम लोगों को नहीं मिल सकी है।"

इस गांव के किसान अकबाल सिंह ने इस साल अपनी बेटी की शादी तय की थी। उन्हें उम्मीद थी कि सब कुछ अच्छे से निपट जाएगा। लेकिन इस साल बाढ़ की वजह से उनके सारे सपने अधूरे रह गए। बाढ़ में पहले उनकी पूरी फसल डूब गई और अब वो अपना घर बचाने के लिए मुश्किल में हैं।

अकबाल कहते हैं, "साल 2014 के बाद बाढ़ ने इस बार इतनी तबाही मचाई है, मेरी गन्ने की फसल लगी थी, पूरी फसल तबाह हो गई, अब जब नदी खतरे के निशान से नीचे है तो हमारी मुसीबतें बढ़ रही हैं, पहले फसल गई और अब कटान हमारे घरों को भी अपने में समा रहा है। बेटी की शादी तय की थी, वो भी नहीं हो सकी, जैसे सब कुछ तबाह हो गया हमारा।"

सिरौलीगौसपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर बाराबंकी की फतेहपुर तहसील में भी बाढ़ से हालात भयावह हैं। इसी तहसील में बिंदौरा, गुड़ियन पुरवा पुल बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब चुका है। ऐसे में आने-जाने के लिए करीब 100 गांवों के लोग प्रभावित हैं। इन ग्रामीणों को लखनऊ के लिए 30 से 40 किलोमीटर घूम कर जाना पड़ रहा है। इसी तरह यहाँ बाराबंकी और सीतापुर को जोड़ने वाला बेहड़ा पुल भी पानी में डूब चुका है। बीती 29 अगस्त को इसी पुल के पास तीन युवक तेज बहाव में डूब गए थे।

बाराबंकी के बेहड़ा पुल में बैलगाड़ी को खींच कर जरूरतमंद लोगों को इधर से उधर पहुंचा रहे हैं ग्रामीण । फोटो : गाँव कनेक्शन

आवागमन के लिए कोई सरकारी मदद न मिलने के कारण गाँव के कुछ युवा बेहड़ा पुल से ग्रामीणों को बैलगाड़ी के जरिये इधर से उधर पहुंचाने का काम कर रहे हैं। खतरे के बावजूद लोग अपनी मोटरसाइकिल, साइकिल इस गाड़ी में लाद कर दूसरी तरफ पहुँच रहे हैं।

इस पुल में अपने अन्य साथियों के साथ जरूरतमंद ग्रामीणों की मदद कर रहे किशोर 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "जब से नदियों में उफान आया है तब से बेहड़ा पुल पर तीन फीट ऊंचा बाढ़ का पानी है। बाराबंकी और सीतापुर को यह पुल जोड़ता है, तेज बहाव भी है, लेकिन इसी पुल से लोग राजधानी के लिए जाते हैं, सरकारी बसें भी यहीं से आती-जाती थीं, मगर अब हम लोग बैलगाड़ी से घसीट कर जरूरतमंद लोगों को उधर पहुंचा रहे हैं, सरकार ने तो नाव की भी कोई व्यवस्था नहीं की है यहाँ।"

बाराबंकी में तीन महीनों बाद सरयू नदी भले ही खतरे के निशान से नीचे हो गई है, लेकिन ग्रामीणों की मुश्किलें कहीं ज्यादा बढ़ चुकी हैं। हजारों ग्रामीण अभी भी बंधे में अपने परिवार के साथ जीवनयापन करने को मजबूर हैं। बड़ी मुसीबत यह भी है कि मौसम बदलने के साथ इन गांवों में बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ सकता है।

बाराबंकी से करीब 150 किलोमीटर दूर लखीमपुर खीरी जिले में भी बाढ़ से हालात भयावह स्थिति में हैं। यहाँ शारदा नदी उफान पर है और किसानों की सैकड़ों बीघा फसल पहले ही बाढ़ में चौपट हो चुकी है। लखीमपुर के धौरहरा ब्लॉक में आने वाले सिर्फ रैनी गाँव में ही 56 घर बाढ़ के तेज बहाव में शारदा नदी में समा चुके हैं। बाढ़ की वजह से एक हजार की आबादी वाले इस गाँव का नामोनिशान मिटने के कगार पर है। ऐसे में अब इस गाँव में भी ग्रामीण अपने घर तोड़ रहे हैं।

बाढ़ की वजह से कई गाँव में आने जाने के लिए सिर्फ नाव ही है सहारा । फोटो : गाँव कनेक्शन

गाँव कनेक्शन की टीम नाव के जरिये जब इस गाँव में पहुंची तो दूर-दूर तक सिर्फ पानी ही पानी नजर आया। बाढ़ का पानी इतना बढ़ने के बावजूद अभी भी कई ग्रामीण अपने घरों में रह रहे हैं। इनमें एक कन्हई लाल भी थे, जो अपने चार बच्चों और भाई के साथ बड़ी सी मचान पर बैठे नजर आये।

अपने पैर दिखाते हुए कन्हई लाल बताते हैं, "बाढ़ के पानी में चलते-चलते पैर सड़ रहा है। न कोई डॉक्टर आया है, न कोई इलाज मिला, कुछ नहीं रह गया हमारे पास, गल्ला (राशन) जो घर में था, वो भी बह गया, पहले सरकार से थोड़ा बहुत मिला भी था (राशन), मगर धीरे-धीरे सब खत्म हो गया, बाल-बच्चे सब भूखों मर रहे हैं।"

कन्हई के घर से थोड़ी दूर पर अंजलि देवी का भी घर पानी में डूबा हुआ था। घर में रखा राशन वगैरह सब खराब हो गया, और अब तक सरकारी मदद के नाम पर उन्हें सिर्फ एक बार राशन की किट मिल सकी है।

अंजलि देवी कहती हैं, "न घर में राशन है, न कुछ मदद मिली है, तीन-तीन दिन तक भूखे सोना पड़ा है, कोई बीमार है तो कोई पूछने वाला तक नहीं है, कम से कम हम लोगों को राशन की किट तो मिले।"

बल्लियों से सधी मचान पर बैठे कन्हई लाल । फोटो : गाँव कनेक्शन

इस गाँव से ज्यादातर लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाए गए हैं, जहाँ पर सरकार की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए शरणालय बनाया गया है।

इस शरणालय में रह रहे राजू बताते हैं, "नदी की कटान में हमारा गाँव पूरा कट गया है, घरों के छप्पर से भी ऊपर पानी चला गया," सरकार से कोई मदद मिली, के सवाल पर राजू कहते हैं, "कुछ भी नहीं मिला, कोई यहाँ आता ही नहीं है, बस एक-एक बोरी आलू मिला था, उससे क्या होगा।"

पिछले करीब तीन महीनों से बाढ़ के कारण ग्रामीण बहुत मुश्किलों में हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 27 अगस्त को बाढ़ प्रभावित गोंडा जिले का हवाई सर्वेक्षण किया था। इस बीच उन्होंने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए हर संभव मदद करने के लिए आधिकरियों को आदेश दिए। इसके अलावा आगामी 15 सितंबर तक विशेष रूप से सतर्कता बरतने के साथ संवेदनशील स्थानों की विशेष निगरानी करने के भी निर्देश दिए।

बावजूद इसके बड़ी संख्या में ग्रामीण हैं जिनको अब तक राशन किट तक नहीं मिल सकी है। वे जैसे-तैसे बाढ़ के पानी में रहकर गुजारा करने को मजबूर हैं। करीब-करीब हर साल बाढ़ का दंश झेलने वाले इन ग्रामीणों के लिए तीन महीनों बाद भी मुश्किलें किसी पहाड़ जैसी सामने खड़ी हैं।

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