गांव वालों 80,000,000,000 रुपयों का हिसाब लगाइए, ये आपके ही हैं

गांव वालों 80,000,000,000 रुपयों का हिसाब लगाइए, ये आपके ही हैं

लखनऊ। गांव में रहने वाले लोगों की किस्मत बदलने के लिए केंद्र और राज्य मिलकर एक साल में कितना पैसा खर्च करते हैं, आपको शायद अंदाजा न हो। इस बार गाँवों में विकास और निर्माण कार्य के पंचायती राज से 80 अरब रुपए ग्राम पंचायतों के खातों में भेजा जा रहा है। शौचालय निर्माण के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) से 4 हजार 942 करोड़ और मनरेगा का वर्ष 2018-19 के लिए 5833 करोड़ रुपए का बजट है।

14वें वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग और विभिन्न सरकारी योजनाओं का बजट जोड़ा जाए तो करीब 17 हजार करोड़ से कहीं ज्यादा होगा। उत्तर प्रदेश में कुल 59,163 ग्राम पंचायतें हैं, प्रदेश में 16 करोड़ लोग गांव में रहते हैं। इस तरह बजट का वार्षिक औसत निकाला जाए तो एक पंचायत को 20 लाख से 30 लाख रुपए मिलते हैं। पूरे भारत में 250,000 ग्राम पंचायते हैं। जिन्हें लभगभ इसी अनुपात में पैसा मिलता है। अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी और अनुपात देखते हुए पूरे देश में पंचायतों को मिलने वाला फंड कम या ज्यादा होता है। यानि अगर किसी पंचायत में ऐसे समुदाय की आबादी ज्यादा है तो उसे ज्यादा पैसा मिलेगा।

पूरे भारत में 250,000 ग्राम पंचायते हैं। जिन्हें लभगभ इसी अनुपात में पैसा मिलता है। अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी और अनुपात देखते हुए पूरे देश में पंचायतों को मिलने वाला फंड कम या ज्यादा होता है। यानि अगर किसी पंचायत में ऐसे समुदाय की आबादी ज्यादा है तो उसे ज्यादा पैसा मिलेगा।

एक मोटे अनुमान पर हर साल एक व्यक्ति पर औसतन 500 रुपए पंचायती राज विभाग खर्च करता है, जबकि कुल विभागों का बजट जोड़ा जाए तो 1094 रुपए होता है। ये आंकड़े आपको बताने इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि इन्हीं पैसों से आपके लिए पानी, घर के सामने की नाली, आपकी सड़क, शौचालय, स्कूल का प्रबंधन, साफ-सफाई और तालाब बनते हैं।

ये पैसा एक साल का है, यानि एक पंचवर्षीय में अगर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सही तरीके से खर्च किया जाए तो गांव की तस्वीर बदल सकती है। गांव में सड़कें, नालियां, हैंडपंप, तालाब भी हैं। लेकिन पैसों के आंकड़ों का ये पक्ष जितना चमकदार है, इसकी दूसरी तस्वीर कई सवाल खड़े करती है।

45 हजार खर्च किए और निजी सबमर्सिबल लगवाया

यूपी में ही कानपुर देहात जिले में राजपुर ब्लॉक में डाढ़ापुर गांव के रामसेवक सिंह को एक बाल्टी पानी भरने में आधे घंटे से ज्यादा समय लगता है। इनके मोहल्ले में 20-30 घर हैं। दो सरकारी नल हैं, लेकिन एक अक्सर खराब रहता है, पिछले दिनों ही उन्होंने 45 हजार रुपए खर्च कर निजी सबमर्सिबल लगवाया है क्योंकि गांव का प्रधान और पंचायत उनके लिए पानी की व्यवस्था नहीं कर पाया था।

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"सरकार की तरफ से बजट की कोई कमी नहीं है। सैकड़ों ग्राम पंचायतें ऐसी हैं, वो अपना पूरा बजट नहीं खर्च पातीं। समस्या बजट में नहीं, योजनाओं के क्रियान्वयन में है। 60-70 फीसदी को पता नहीं उन्हें करना क्या है। जो काम न होने और पैसों की बंदरबांट की वजह बनता है।" आदित्य तिवारी बताते हैं, आदित्य तिवारी को हाल ही स्टेट रिसोर्स पर्सन के रूप में चुना गया है। आदित्य के साथ 16 अन्य लोगों को भी राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद द्वारा चयन किया गया है, जो पंचायतों को प्रबंधन सिखाएंगे, यानि अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करेंगे।

सरकार ने पंचायतों को खूब पैसा दिया हैं, लेकिन काम करने और कराने को जो तरीके (गाइडलाइंस) हैं, उनमें व्यवहारिक दिक्कतें हैं। जो पैसा खर्च हो रहा है उसकी मॉनिटरिंग की सशक्त व्यवस्था नहीं है। पंचायतों में अब काम ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) बनाकर हो रहे हैं, इसमें भी घालमेल है।
पंकज नाथ कल्कि, अध्यक्ष, सामाजिक कार्यकर्ता और मतदाता संघ

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सामाजिक कार्यकर्ता और मतदाता संघ के अध्यक्ष पंकज नाथ कल्कि कहते हैं, "सरकार ने पंचायतों को खूब पैसा दिया हैं, लेकिन काम करने और कराने को जो तरीके (गाइडलाइंस) हैं, उनमें व्यवहारिक दिक्कतें हैं। जो पैसा खर्च हो रहा है उसकी मॉनिटरिंग की सशक्त व्यवस्था नहीं है। पंचायतों में अब काम ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) बनाकर हो रहे हैं, इसमें भी घालमेल है।"

मनरेगा के अलावा कोई काम नहीं हो पाया

14वां वित्त लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश पंचायत व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए। न सिर्फ बजट कई गुना बढ़ा, बल्कि पारदर्शिता लाने के लिए भी कड़ी गाइडलाइंस आईं। ऐसे में शुरुआत को करीब डेढ़ साल तक गांवों में मनरेगा के अलावा कोई काम नहीं हो पाया। गांव कनेक्शन ने इस पर विशेष सीरीज भी की थी।

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अपनी बात को जारी रखते हुए कल्कि बताते हैं, "14वें वित्त के तहत की जितना पैसा किसी ब्लॉक को मिलता है, उसका करीब 7 से 10 फीसदी पैसा (कंटेजेंसी फंड) तकनीकी पक्ष और प्रशासनिक सहयोग के लिए था, वो बजट खर्च नहीं हुआ। सीतापुर जिले को इस बार करीब 71 करोड़ रुपए मिला है, इसमें से 7 करोड़ रुपए न्याय पंचायत पर कंप्यूटर, इंटरनेट, जूनियर इंजीनियर को रखने के हैं। लेकिन ये पैसा खर्च नहीं होगा। ये ही गांवों की त्रासदी है। मैंने इस पर आरटीआई लगाई हैं।"

गांवों में 27 विभागों की योजनाएं चलती हैं

गांवों के विकास के लिए वैसे तो केंद्र और राज्य मिलाकर कई 27 विभागों की योजनाएं चलती हैं। लेकिन सबसे अहम भूमिका पंचायती राज की है। इस बारे में बात करने पर उत्तर प्रदेश के पंचायती राज निदेशक आकाश दीप गांव कनेक्शन को बताते हैं, "पंचायतों के लिए फंड की कोई कमी नहीं है, यूपी बहुत बड़ा राज्य है और हजारों गांवों में आप को विकास दिखेगा। पक्की सड़कें दिखेंगी, शौचालय दिखेंगे। लेकिन बहुत काम किया जाना बाकी है। रही बात मॉनिटरिंग की हो यूपी इस दिशा में तेजी से से आगे बढ़ा है। इस बार का सारा काम कंप्यूटर में दर्ज है। 8 हजार के करीब पंचायतों में कम्प्यूटर की व्यवस्था की गई है, डिस्ट्रिक रिसोर्स पर्सन और स्टेट रिसोर्स पर्सन चुने जा रहे हैं, प्रधानों और पंचायत सचिवों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जीपीडीपी में यूपी इस वर्ष पूरे देश में नंबर एक है।"

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पंचायतों और ब्लॉक स्तर पर जूनियर इंजीनिटर और कंप्यूटर ऑपरेटर की अभी तक भर्ती न होने के सवाल पर आकाश दीप बताते हैं, "इसमें संविदा के तहत लोग रखे जाने हैं, लेकिन शुरुआत में ही कोर्ट में इसके खिलाफ एक रिट (याचिका) दाखिल हो गई थी, कानूनी पक्षों को सुलझाकर जल्द ये प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी। जबतक स्वच्छ भारत मिशन और दूसरे संसाधनों से काम किया जा रहा है।'

हर काम की जियो टैगिंग हो

लाखों रुपए के बजट के बाद पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल पर वो कहते हैं, "एक पंचायत में 16-17 कार्य सिर्फ पंचायती राज के होते हैं, यानि सभी ग्राम पंचायतों में करीब 8 लाख वर्क (कार्य) पूरे साल में। कोशिश जारी है कि हर काम की जियो टैगिंग हो। अब तक कोई भी काम कराने से पहले और बाद में फोटो मंगाए जाते हैं।'

पंकज नाथ कल्की कहते हैं, "पंचायतों को स्वाय्त यानि स्वतंत्रता देनी होगी। गांव के लोग देखें कि उन्हें ये पैसा कहां खर्च करना है, और कैसे खर्च करना है सरकार उनकी मानिटरिंग करें, फिर सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। यही पंचायती राज का सपना भी है।'

पंचायती राज में ये काम होना बाकी है

पंचायती राज और ग्राम विकास विभाग के तहत मनरेगा दोनों केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन काम करते हैं। लेकिन मनरेगा ने अप्रैल 2014 में अपने सभी कार्यों को पब्लिक डोमेन में ला दिया था, जबकि पंचायती राज में ये काम होना बाकी है। गांवों के विकास में एक बड़ी बाधा कई विभागों का होने भी है।

एक तरफ जहां प्रधानों के कामकाज को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं, वहीं प्रधानों के अपने मुद्दे हैं। देश में प्रधान पंचायती राज व्यवस्था की रीढ़ हैं। गांव के विकास का जिम्मा उनके ऊपर है। मनरेगा और स्वच्छ भारत समेत करीब 27 तरह की सरकारी योजनाओं को लागू कराने की जिम्मेदारी भी प्रधानों पर होती है। गांवों के बजट में कई गुना बढ़ोतरी हो गई है। लेकिन इन सारे कामों के बदले प्रधान को सिर्फ 3500 रुपए का मासिक भत्ता मिलता है। कई प्रधान इतने कम भत्ते को ही भ्रष्टाचार की जड़ बताते हैं,प्रधानो का कहना है की फायदा न हो न सही पर घर से तो न खर्च हो।

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