सर्दियों की साथी: 25-30 दिन में बनकर तैयार होती है एक दन, 40 साल तक देती है साथ

इस सर्दियों में अगर ठंडक का लुत्फ लेना है तो उत्तराखंंड की दन और पश्मीना शॉल जरुर आजमाइएगा... ये बहुत खास होती हैं।

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)। उत्तराखंड में नेपाल से सटे कई गाँवों में हथकरघा से बना दन, कालीन और पशमीना शॉल खूब प्रसिद्ध है। लेकिन यहां के हथकरघा कारीगरों में एक निराशा भी है कि उनके बनाए सामानों का उन्हें उचित मूल्य नहीं मिलता है जिससे लोग इस व्यवसाय से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं।

पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 219 किलोमीटर दूर धारचूला ब्लॉक के आस-पास के कई गाँव में हथकरघा का काम होता है। नागलिंग गाँव में रहने वाली गीता बनियाल (30 वर्ष) दन बनाते हुए बताती हैं, "ये हमारी पुश्तैनी काम है इसे हम मायके में भी बनाते थे और यहां भी बना रहे हैं। हम लोग घर पर बनाते हैं और पुरुष लोग बेचने जाते हैं। हमारे यहां हथकरघा का हुनर हर हाथों में है, कोई घर ऐसा नहीं होगा जिस घर की बेटी और बहु को ये हुनर न आता हो।" गीता की तरह यहां की सैकड़ों महिलाओं के हाथों का हुनर इनके बनाए दन, कालीन और पशमीना शॉल में साफ दिखाई पड़ता है। इनके हाथों की बनी एक खूबसूरत दन या कालीन में 25 से 30 दिन लगते हैं वहीं ये कालीन 40 से 45 साल तक खराब नहीं होती है।


हथकरघा यहाँ का पुश्तैनी काम होने के बावजूद लोग धीरे-धीरे इस व्यवसाय से दूर होते जा रहे हैं। पिथौरागढ़ की मुख्य विकास अधिकारी वन्दना का कहना है, "ये हथकरघा कारीगर पिछले कई वर्षों से परम्परागत तरीके से कालीन और शॉल बनाने का काम कर रहे हैं, अगर इनके काम को बाजार की मांग के अनुसार इन्हें प्रशिक्षित किया जाए और इनके बनाए सामान को हम उचित दाम दिला पाएं तो इनका ये हुनर कभी खत्म नहीं होगा।

उन्होंने आगे कहा, "पिथौरागढ़ प्रशासन इस व्यवसाय को सही भाव दिलाने के लिए प्रयासरत है, जल्द ही धारचूला में कालीन बनाने की फैक्ट्री लगेगी जिससे इस व्यवसाय से जुड़े कारीगरों को वाजिब मजदूरी मिल सकेगी और इनकी बनाई कालीन को उचित बाजार भी मिलेगा।"

कालीन विक्रेता देवेन्द्र लाल (40 वर्ष) बताते हैं, "बचपन से अपने गाँव में यही काम होते देखा है, घर की बहन-बेटियां इसे बनाती हैं और आदमी लोग इसे बेचने जाते हैं। अगर दो बहने दिनभर इसे बनाती हैं तो 20 से 25 दिन लग जाते हैं अगर कोई इसे अकेले बनाएगा तो एक से डेढ़ महीने का समय लगता है।"

वो आगे बताते हैं, "एक दन की कीमत तीन से चार हजार होती है जिसे बनाने में 25-30 दिन लगते हैं और ये 40 से 45 साल तक इसकी गुणवत्ता में कमी नहीं आती है। जिस कीमत पर दन बिकती है उस हिसाब से हमारी रोज की मजदूरी 30 रुपए निकलती है जो बहुत कम है। जबसे बाजार में चाइनीज दन, कालीन आने लगी है तबसे उनकी बिक्री ज्यादा होती है क्योंकि वो दिखने में खूबसूरत और कम दामों की होती है।"

पिथौरागढ़ का हुनर :

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