वाराणसी में दृष्टिबाधित छात्रों के भविष्य से खिलवाड़, अंध स्कूल की कक्षाएं बंद करने का फरमान, प्रधानमंत्री से गुहार

बनारस के हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय में 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई को बंद करने का निर्णय लिया गया है, जिसकी वजह आर्थिक तंगी बताई जा रही है।

Akash PandeyAkash Pandey   3 Aug 2020 6:30 AM GMT

आकाश, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में दृष्टिहीन छात्रों के विद्यालय ने कक्षा 9 से 12 तक की कक्षाएं बंद करने का फरमान सुना दिया है। कोरोना काल में घर भेजे गए छात्रों को कक्षाएं बंद होने की सूचना चिट्ठी से मिली, जिसके बाद पहले से ही कुदरत के सताए दृष्टिहीन छात्रों का भविष्य और अंधकारमय दिखने लगा है। छात्र और उनके परिजनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपना विद्यालय बचाने की मांग की है।

छात्रों के अंदर अपने भविष्य को लेकर डर बैठ गया है। आजमगढ़ जिले के निवासी और विद्यालय के छात्र रवि राय कहते हैं, "जब पूरे विश्व को कोरोना जैसी महामारी ने झकझोर कर रख दिया है, ऐसे वक्त में विद्यालय प्रबंधन ने हम बच्चों को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। हमारे भविष्य को अंधरे में लटका दिया है, हमारे भविष्य का आधार सिर्फ हमारी शिक्षा ही है।"

विद्यालय के पूर्व छात्र और प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ विजुअली चैलेंज (ईस्ट जोन) के सचिव शिवशंकर उपाध्याय कहते हैं, "विद्यालय प्रबंधन आर्थिक परेशानी का हवाला देकर कक्षाएं बंद कर रहा है। पिछली साल भी यहां हो रहा तो जिला प्रशासन और हम सबने दिल्ली तक दौड़कर 49 लाख रुपए की ग्रांट दिलाई थी। इन्हें जून में लॉकडाउन के दौरान आर्थिक तंगी की समझ आई। ये सब साजिश है। ट्रस्ट चरणबंद्ध तरीके से स्कूल को बंद करके यहां मॉल बनवाना चाहता है।"

वाराणसी में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से कुछ आगे बढ़ाने पर दुर्गाकुंड मंदिर के पास हनुमान प्रसाद हनुमान प्रसाद पोद्दार उच्चतर अंध विद्यालय है। पिछले कई दशकों से ये विद्यालय उत्तर प्रदेश और बिहार के बच्चों के जीवन में रौशनी की नई किरण बना हुआ था।

विद्यालय प्रशासन ने कक्षा 9 से 12 तक की कक्षाएं फंड की कमी का हवाला देते हुए बंद करने का फैसला किया है। चूंकि कक्षा 10 और 12 का रजिस्ट्रेशन हो चुका है इसलिए इस वर्ष पढ़ाने का फैसला किया है लेकिन नए छात्रों के दाखिले नहीं लिए जाएंगे।

विद्यालय के पूर्व छात्र और वर्तमान छात्रों के हक की आवाज उठा रहे शिवशंकर उपाध्याय करते हैं, "विद्यालय की स्थापना 1972 में हुई थी और उसे स्मृति सेवा ट्रस्ट संचालित करता है। भारत सरकार का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय इसे फंड देता है। पिछले साल भी विद्यलाय प्रबंधन ने कक्षाएं बंद करने की बात कही थी। मैं खुद दिल्ली तक गया था। डीएम ने तीन बार लेटर लिखा तो विद्यालय को 49 लाख रुपए की ग्रांट मिली थी। साल 2017 में पीएम मोदी जी ने कौशल विकास योजना के लिए 32 लाख रुपए दिए थे। फिर आर्थिक तंगी कहां से आ गई। विद्यालय प्रबंधन कुछ ग्रांट लेने में देरी करता है।"

शिवशंकर विद्यालय ट्रस्ट की खामियां गिनाते हुए उनकी मंशा पर सवाल खड़े करते हैं, लेकिन जिन छात्रों के घरों में कोरोना काल में कक्षाएं बंद होने की चिट्ठियां पहुंची हैं वे दशहत और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। वर्तमान में विद्यालय में वर्तमान में कक्षा नौ और ग्यारहवीं के छात्रों की संख्या कुल मिलाकर तकरीबन 24-25 हैं।

अंध स्कूल में 9वीं से 12वीं तक की कक्षाएं बंद करने के आदेश

यूपी में आजमगढ़ के रहने वाले छात्र सुमित सिंह सिंह कहते हैं, विद्यालय ने कक्षाएं बंद करने का फरमान तो सुना दिया, लेकिन ये नहीं सोचा हम लोग कहां जाएंगे। हम लोगों से कहा गया कि आप गोरखपुर, लखऩऊ या फिर बांदा के अँध विद्यालयों में एडमिशन ले लो। हमने इन विद्यायलों में बात की तो पता चला कि वहां कोई सीट नहीं है। पहले से ही अंधों के लिए पढ़ना आसान नहीं है, जो बची खुची भविष्य की उम्मीद है वह ये लोग छीने ले रहे हैं।"

फतेहपुर जिले के छात्र मोहम्मद हसीब और उनके परिजन भी काफी परेशान हैं। वो कहते हैं, मैने 2009 में यहां दाखिला लिया था, "उस वक्त कहा गया था कि यहां पढ़ने वालों का जीवन बन जाता है। लेकिन 2012 के बाद से यहां सब गड़बड़ शुरु हो गई और उसके बाद से ही लगातार 9से 12वीं तक कक्षाएं बंद करने की बात हो रही है। अब तो जिला प्रशासन भी हम लोगों की बात नहीं सुनता।'

विद्यालय का इतिहास

विद्यालय की स्थापना सन् 1972 में गीता प्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार की स्मृति में की गई थी। शुरुआत में यह विद्यालय सिर्फ पांचवीं तक था, विद्यालय को जूनियर हाईस्कूल की मान्यता 1984 में, हाईस्कूल की मान्यता 1990 में और इंटरमीडिएट तक की मान्यता 1993 में मिली।

1987 बैच के छात्र रहे शिवशंकर उपाध्याय बताते हैं, "उस वक्त हमारे विद्यालय की शिक्षा की गुणवत्ता बहुत ही उच्च थी। उस जमाने में हमें टाइपराइटर और कुछ समय बाद कम्प्यूटर आदि भी सिखाया जाने लगा था। तब हमारे विद्यालय को देखने और हमसे मिलने विदेशी आया करते थे।"

शिव शंकर आगे बताते हैं, "विद्यालय में हम छात्र कुर्सियां बनाने का काम भी करते थे, जिन्हें बेचकर हमारी आय हुआ करती थी। वो समय हमारे विद्यालय का स्वर्णिम काल था।"

लेकिन नेक नियत के साथ शुरू हुई इस स्कूल में कुछ दशकों में ही घुन लगने शुरू हो गए थे। 2014 में विद्यालय से निकले और वर्तमान में जेएनयू में पढ़ रहे शशिभूषण बताते हैं, "जब वे नवीं में 2010 में दाखिला लेने आए थे बड़ा नाम सुना था इस विद्यालय का, लेकिन जब यहां आए तो पता लगा कि जेल में आ गए हैं। इतनी बंदिशें थी कि लगता था विद्यालय में नहीं जेल में हैं। स्कूल प्रशासन और ट्रस्ट पर मनमानी का आरोप लगाते हुए वो कहते हैं, "छात्रों को बेहतर सुविधाएं देने की मांग करने के कारण मुझे दो बार स्कूल से निकाला गया। आवाज उठाने पर हमें खाना तक नहीं दिया जाता था।"

वो आगे कहते हैं, "ट्रस्ट में व्यापारियों का जमघट लग गया है वो जानते हैं कि सभी छात्र कोरोना के चलते घर पर हैं वो विरोध करने नहीं आएंगे। पीएम मोदी के आपदा में अवसर बनाने के बयान को ध्यान में रखते हए ये लोग (ट्रस्ट) आपदा को छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का अवसर बनाया और कक्षाएं बंद कर रहे हैं।"

विद्यालय का ट्रस्ट

दरअसल हनुमान प्रसाद अंध विद्यालय एक ट्रस्ट द्वारा संचालित होता है जिसका नाम है हनुमान प्रसाद पोद्दार स्मृति सेवा ट्रस्ट। इस ट्रस्ट के सभापति बनारस के मशहूर व्यापारी कृष्ण कुमार जालान हैं और दो उपसभापति अशोक कुमार अग्रवाल और जगदीश झुनझुनवाला हैं। इन 18 ट्रस्टी लोगों में सभी व्यापारी हैं और एक मात्र विद्यालय के प्रधानाचार्य जोकि पदेन ट्रस्टी हैं। छात्र इस ट्रस्ट पर जानबूझकर अपने फायदे के लिए विद्यालय को बंद कराने का आरोप लगा रहे हैं।

प्रोग्रेसिव फेडरेशन ऑफ विजुअली चैलेंज, की स्कूल न बंद करने की अपील।

छात्रों को जब पता चला कि कक्षाएं फंड की कमी के कारण बंद की जा रही हैं तो उन्होंने इसके लिए विद्यालय प्रशासन और ट्रस्टियों को ही जिम्मेदार ठहराया। नाम न बताने की शर्त पर विद्यालय के एक पदाधिकारी ने कहा कि विद्यालय में नए प्रधानाचार्य के आने के बाद सिर्फ उनकी सुख-सुविधाओं के लिए लगभग 5-6 लाख रुपए फिजूल खर्च किए गए हैं।

कई छात्रों ने ये भी कहा कि खर्च के नाम पर जो जनरेटर आदि का बिल दिखाया जा रहा है वो भी फिजूलखर्ची है, हमारे लिए तो जनरेटर कभी चलाया ही नहीं जाता। कई छात्रों नाम न बताने की शर्त पर ये भी कहा कि कई ट्रस्टी स्कूल के भवन को अपने व्यापार को गोदाम और साइकिल स्टैंड के लिए उपयोग करने लगे हैं।

विद्यालय के खर्चे और भ्रष्टाचार

विद्यालय का 1 अप्रैल 2018 से लेकर 31 मार्च 2019 तक का कुल खर्च चौसठ लाख तेईस हजार तीन सौ तीरासी रुपए सत्तावन पैसे था। छात्रों ने आरोप लगाया है कि इसमें बिजली, भवन मरम्मत, कौशल विकास आदि के नाम पर जो खर्च किया जाता है वो फिजूलखर्ची है क्योंकि कौशल विकास के नाम पर हमें कुछ सिखाया ही नहीं जाता। बिजली बिल का अधिकतर हिस्सा सिर्फ प्रशासन के कारण ही आता है।

पूर्व छात्र अभय कहते हैं, "छात्र पोषण के नाम पर ये जो खर्च दिखाते हैं वह भी समझ के परे है, क्योंकि छात्रों को खाना तो सरकार खिलाती है।"

वहीं शिवशंकर उपाध्याय बताते हैं, "स्कूल में साल में कम से कम 100 भंडारे होते हैं जिसमें प्रत्येक भंडारे के लिए विद्यालय में साढ़े आठ हजार रुपए जमा किए जाते हैं, यानी स्कूल सलाना साढ़े आठ लाख रुपए भोजन के नाम पर इकट्ठा तो करता है, लेकिन खिलाता वही सरकारी राशन ही है। फिर समझ नहीं आता पैसे कहां जाते हैं।" इसके अलावा भी छात्रों ने बताया कि हर वर्ष मशीनों के नाम पर पैसे में घपला किया जाता है लेकिन हर वर्ष नई मशीन नहीं लाई जाती है।


विद्यालय के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ये एक बहुत बड़ा खेल खेला जा रहा है। वर्तमान समय में शिक्षकों की तनख्वाह समय से नहीं दी जा रही है। कागज पर तनख्वाह 17 हजार है, लेकिन मिलता 10 हजार है और काट-पीट कर हाथ साढ़े आठ हजार रुपए ही आते हैं। कोरोना के टाइम में ये पैसे देने में भी हीलाहवाली की जा रही है।

उन्होंने ट्रस्टियों पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि ये लोग बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, कक्षाएं बंद करने की मंशा के पीछे विद्यालय की करोड़ों की जमीन है।

ये विद्यालय अंध विद्यालय है लेकिन यहाँ अंध शिक्षकों की कोई कद्र नहीं है। यहाँ विशेष शिक्षक बहुत ही कम हैं और लगातार कम हो रहे हैं। यहाँ छात्रों की संख्या में भी लगातार कम हो रही है। विद्यालय में वर्तमान में कक्षा नौ और ग्यारहवीं के छात्रों की संख्या कुल मिलाकर तकरीबन 24-25 होगी। अब ये बताइए कि इन मुट्ठी भर छात्रों का कितना ही खर्च होगा। यह एक पूरी सोची समझी साजिश के तहत किया जा रहा है. इस विद्यालय के माध्यम से काला धन को सफेद करने का भी खेल चलता है।

विद्यालय प्रशासन का पक्ष

छात्रों द्वारा लगाए गए आरोपों पर विद्यालय प्रशासन का पक्ष जानने के लिए गांव कनेक्शन ने कई लोगों से बात करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो पाई। ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री कृष्ण जालान, एक अन्य ट्रस्टी श्याम सुंदर दास तथा विद्यालय के कार्यवाहक प्रधानाचार्य से बात करने की कोशिश की पर किसी ने फोन नहीं उठाया। विद्यालय के प्रबंधक नीरज दूबे ने हमसे फोन पर बात करते हुए कहा कि इसके मामले के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।

सरकार की लापरवाही

गौरतलब है कि पिछले वर्ष भी ट्रस्ट ने नवीं से बारहवीं तक की कक्षाएं बंद करने का प्रयास किया था, लेकिन तब तात्कालिक जिलाधिकारी ने कहा था कि यदि ट्रस्टी इस विद्यालय को नहीं चला पा रहे हैं तो प्रशासन चलाएगा, इसके बाद से ट्रस्टी थोड़ा पीछे हट गये। शिवशंकर उपाध्याय बताते हैं कि हम लोगों ने लगातार दौड़ भाग करके, दिल्ली, बनारस एक करके पिछली बार मंत्रालय से फंड रिलीज करवाया था। उस वक्त तात्कालिक जिलाधिकारी ने भी हमारी बहुत मदद की थी लेकिन वर्तमान समय में जिला प्रशासन भी मदद नहीं कर रहा है। इसलिए ये लोग अपनी मंशा में कामयाब हो रहे हैं।

इसमें केंद्र सरकार की लापरवाही की ओर इंगित करते हुए शिवशंकर बताते हैं कि ये प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है. यहाँ पूर्वांचल और बिहार के दृष्टिबाधित बच्चों के लिए एक मात्र रोशनी यह विद्यालय है और इसके साथ इस तरह की लापरवाही बहुत ही निंदनीय है। प्रधानमंत्री के दिव्यांग कह देने से हमारा स्कूल नहीं बच जाएगा। विद्यालय को फंड सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से मिलता है। हर बार फंड लेट-लतीफ आता है। इससे ट्रस्टियों को ये सब करने का मौका मिलता है। सरकार को इस विषय पर गंभीरता से सोचना चाहिए और इस विद्यालय को ट्रस्टियों से लेकर सरकार को खुद चलाना चाहिए। "

2011 जनगणना के अनुसार पूरे भारत में लगभग 2.68 करोड़ लोग शारीरिक रूप से अक्षम हैं। इसमें 19% लोग दृष्टिबाधित हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, बांदा और लखनऊ में ही दृष्टिबाधित बच्चों के लिए स्कूल हैं, लेकिन बिहार और पूर्वांचल के लिए बनारस बहुत ही सुलभ होता है ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों को लेकर कहाँ जाएंगे, कक्षाएं बंद होने से ऐसा नहीं है कि सिर्फ इस वर्ष पढ़ रहे कुछ बच्चों का नुकसान होगा. इससे आने वाली पीढ़ियों को नुकसान होगा, हमारे समाज को नुकसान होगा। ऐसे में प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के कारण सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर नहीं भाग सकती।

इसी विद्यालय के छात्र रहे कॉमेडियन और मिमिक्री कलाकार अभय शर्मा ने बताया कि वो भी 2014 में इस विद्यालय से पढ़कर निकले हैं। अभय के मुताबिक उनको विद्यालय ने सिर्फ इसलिए निष्कासित कर दिया था कि वो मैंगो शेक पीने चले गए थे। अभय बताते हैं, "मुझे कक्षा 12वीं में भी निष्कासित किया गया था लेकिन मैंने स्कूल टॉप करके विद्यालय प्रशासन को जवाब दे दिया था। ये कक्षाएं बंद करने का जो खेल ट्रस्ट खेल रहा है उसके पीछे एक पूंजीवादी मानसिकता काम कर रही है।"

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.