चंदा जुटाकर शिक्षकों ने बदल डाला सरकारी स्कूलों का हुलिया, ब्लैकबोर्ड नहीं प्रोजेक्टर पर होती है पढ़ाई

चंदा जुटाकर शिक्षकों ने बदल डाला सरकारी स्कूलों का हुलिया, ब्लैकबोर्ड नहीं प्रोजेक्टर पर होती है पढ़ाईसरकारी स्कूलों के अध्यापकों ने एक नई मुहिम चलाते हुए क्राउड फंड की व्यवस्था की। फोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस

लखनऊ। एक ओर शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों में यह सामने आया कि देश के 20 राज्यों में पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.3 करोड़ की कमी आई है वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र के सरकारी स्कूल इन दिनों अच्छी वजह से चर्चा में हैं।

दरअसल महाराष्ट्र के मराठी मीडियम सरकारी स्कूलों के अध्यापकों ने एक नई मुहिम चलाते हुए क्राउड फंड प्रोग्राम चलाया। इसमें अध्यापकों ने ग्रामीणों को प्रोत्साहित करते हुए उनसे चंदा जुटाया और उसे स्कूलों की व्यवस्था सुधारने में लगाया। आज जो स्कूल पहले सुविधाओं से वंचित थे उनकी तस्वीर अब बदली-बदली है।

मुंबई से उत्तर पूर्व दिशा से करीब 360 किमी की दूरी पर जलगाँव के अंबानेर तालुका में धेकुसिम नाम का गाँव स्थित है, यहां करीब 1800 लोग रहते हैं। गाँव के जिला परिषद स्कूल के हेडमास्टर सुरेश पाटिल कहते हैं कि स्कूलों में बदलाव जैसे 2000 वर्ग फीट की दीवार और पुनर्निमित क्लासरूम, ये सब कुछ सरकार की मदद से नहीं बल्कि ग्रामीणों द्वारा फंड इकट्ठा करने की वजह से संभव हुआ है।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, करीब 78,000 कीमत वाले एक एलसीडी प्रोजेक्टर, एक लेनेवो लैपटॉप और वाय-फाई से सक्षम क्लासरूम अब महाराष्ट्र के एक गाँव के मराठी मीडियम सरकारी स्कूलों की नई पहचान बन गए हैं।

मुंबई से उत्तर पूर्व दिशा से करीब 360 किमी की दूरी पर जलगाँव के अंबानेर तालुका में धेकुसिम नाम का गाँव स्थित है, यहां करीब 1800 लोग रहते हैं।

गाँव के जिला परिषद स्कूल के हेडमास्टर सुरेश पाटिल कहते हैं कि स्कूलों में बदलाव जैसे 2000 वर्ग फीट की दीवार और पुनर्निमित क्लासरूम, ये सब कुछ सरकार की मदद से नहीं बल्कि ग्रामीणों द्वारा फंड इकट्ठा करने की वजह से संभव हुआ है।

हम जब स्कूलों की व्यवस्था में सुधार के लिए लोगों के पास गए तो ग्रामीणों ने हमें करीब 5.5 लाख रुपए दान किए। आज देखिए, करीब 10 विद्यार्थी प्राइवेट स्कूलों को छोड़कर हमारा स्कूल जॉइन कर रहे हैं। अब हमारे छात्रों की संख्या अब 42 से 78 हो गई है।

अहमदनगर जिले ने दिया सबसे ज्यादा फंड

यह महाराष्ट्र की केवल एक कहानी नहीं है। महाराष्ट्र स्टेट काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एमएससीईआरटी) के जुलाई 2015 और दिसंबर 2016 के बीच जारी डाटा के अनुसार, राज्य के स्कूल टीचरों ने लोगों की मदद के जरिए अब तक 216 करोड़ रुपए इकट्ठा किए हैं। इस फंड का इस्तेमाल क्लासरूम की मरम्मत के साथ, नए वॉशरूम के निर्माण और क्लासरूम का डिजिटलीकरण करने में किया गया। एमएससीईआरटी डाटा के अनुसार, अहमदनगर जिले में अधिकतम लोगों ने फंड रेज करने में योगदान दिया। यहां करीब 30 करोड़ रुपए फंड इकट्ठा किया गया। इसके बाद पुणे (19.82 करोड़), सोलापुर (19.03 करोड़), औरंगाबाद (15.59 करोड़) और नासिक (14.80 करोड़) में फंड दिया गया।

अध्यापक कर रहे लोगों को प्रोत्साहित

आखिर महाराष्ट्र के इन सरकारी स्कूलों को फंड रेज के लिए किसने प्रभावित किया? इस सवाल के जवाब में राज्य शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव नंद कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘इसमें एक वजह राज्य सरकारों द्वारा चलाए गए प्रगत शैक्षणिक प्रोग्राम हो सकता है।’ इस प्रोग्राम का एक अवयव लोगों की भागीदारी की रिपोर्टिंग करना था। इससे पहले स्कूलों ने सक्रिय रूप से बाहर के धन की तलाश नहीं की थी लेकिन अब, जब कार्यक्रम ने सार्वजनिक भागीदारी का दस्तावेज पेश किया, तब से शिक्षक सक्रिय रूप से समुदाय तक पहुंच रहे हैं और उन्हें कॉर्पोरेट सहायता के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

नौ स्कूलों से शुरू हुआ अभियान 1103 स्कूलों तक पहुंच गया

इस तरह शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है जो कई तरह के सर्वे में दिखाई दे रहा है। ज्यादातर जिलों में, समुदाय की मदद से काफी हद तक बदलाव आया है। महाराष्ट्र का धुले जिला जहां के सरकारी स्कूलों में 100 फीसदी डिजिटल क्लासरूम हैं, इसका श्रेय 35 वर्षीय इंवेस्टमेंट बैंकर हर्षल विभंडिक को जाता है। हर्षल बताते हैं, ‘मैं न्यूयॉर्क में रहता था और दो साल पहले अपने होमटाउन धुले आया। मेरे पास नौ लाख रुपए थे और कुछ स्कूलों के देखने के बाद मैंने नौ स्कूलों पर पैसे लगाने का निर्णय लिया। इसके बाद ग्रामीणों ने भी इसमें सहयोग दिया।’ विदेश के बैंकर दोस्त, ग्रामीण और लोकल एनजीओ की मदद से नौ स्कूलों से शुरू हुआ अभियान अब 1103 जिला परिषद स्कूलों तक पहुंच गया है।

टेबल फैन से लेकर डस्टर तक में लिखा जा रहा दानकर्ता का नाम

विभंडिक अब भारत से ही काम कर रहे हैं और अन्य जिलों में भी यात्रा कर रहे हैं। विभंडिक कहते हैं, लोग अब इसमें भागीदारी दे रहे हैं और इस तरह एक अद्भुत बदलाव देखने को मिल रहा है।सरकार द्वारा आर्थिक मदद के लंबे इंतजार को लोगों की भागीदारी ने कम किया है और जिला परिषद स्कूलों की तस्वीर भी बदल गई है। पुणे के शिरूर तालुका में कर्देलवाड़ी जिला परिषद में सभी दान की गई सामग्री- टेबल फैन से लेकर ब्लैकबोर्ड डस्टर तक में स्पॉन्सर का नाम है। प्राइमरी स्कूल के अध्यापक दत्तात्रेय और बेबिनंदा साकेत कहते हैं कि इस तरह के अभ्यास से लोगों को ज्यादा से ज्यादा दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

हमने दानकर्ताओं का नाम उनके द्वारा दी गई चीजों में लिखना शुरू किया। अब हमें किसी भी चीज की जरूरत होती है तो हम ग्रामीणों के पास जाते हैं और वे तुरंत ही हमारी जरूरत पूरी कर देते हैं। इस तरह कंप्यूटर से साइंस लैब तक, हमारे छोटे से ग्रामीण स्कूल में जहां 100 से कम छात्र हैं, वह सारी सुविधाएं हैं जो बड़े स्कूलों में उपलब्ध कराई जाती हैं। यह असल में शिक्षा के लिए लोगों के आंदोलन जैसा है- बेबिनंदा कहती हैं।

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