गांव कनेक्‍शन सर्वे: जल संकट से जूझ रहा है पश्‍चिम बंगाल, केवल 22.4 फीसद ग्रामीणों के घरों में है पानी

Vivek ShuklaVivek Shukla   8 July 2019 1:19 PM GMT

गांव कनेक्‍शन सर्वे: जल संकट से जूझ रहा है पश्‍चिम बंगाल, केवल 22.4 फीसद ग्रामीणों के घरों में है पानी

लखनऊ। इस समय देश के कई राज्‍यों में जल संकट आ गया है। लोगों को पानी के संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में आम बजट से पहले गाँव कनेक्शन के 19 राज्यों में 18,000 ग्रामीणों के बीच एक सर्वें किया, जिसमें हैरान करने वाले आकड़े सामने आए हैं। इस सर्वें में पता चला कि पश्‍चिम बंगाल में केवल 22.4 फीसदी लोगों के घरों में पानी उपलब्‍ध है।

पश्चिम बंगाल में पीने से लेकर सिंचाई तक हर स्तर पर ग्रामीणों को संघर्ष करना पड़ता है। यहां शहर के साथ-साथ गांवों में भी लोगों के हालात बद्तर होती जा रही हैं। गांव में लोग पानी की किल्लत से परेशान हैं। लोगों के घरों में पानी उपलब्‍ध नहीं है। ग्रामीणों को पानी के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। यहां के नागरिकों का कहना है कि नेता सिर्फ चुनाव के समय वोट मांगने के लिए यहां आते हैं लेकिन किसी को हमारी समस्याओं का ख्याल नहीं रहता है।

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आम बजट से पहले देश के सबसे बड़े रुरल मीडिया प्लेटफार्म गांव कनेक्शन ने एक सर्वें किया, जिसमें देश के 61 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि उनके घर में नल या हैंडपंप वाला पानी उपलब्ध है। 21वीं सदी के भारत में 8 फीसदी लोगों ने कहा कि उनके घरों में पेयजल सप्लाई है। सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार देश के लगभग सभी राज्‍यों में ग्रामीणों को पानी के लिए घर से बाहर निकलना ही पड़ता है।

इसके बारे में जब बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के सोशल ओडिट सुप्रि‍यो साहू से बात की गई तो उन्‍होंने कहा कि गांव में पानी लेने के लिए लोगों को घर से निकलना पड़ता है। यहां आमतौर पर लोग ऐसे ही जीवन यापन कर रहे हैं। नेता वोट लेने के लिए चुनाव के समय दिखाई देते हैं लेकिन असल समस्‍या किसी को नहीं दिखाई दे दी है।

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इस सर्वें में पश्‍चिम बंगाल की स्‍थि‍ति सबसे खराब है। यह एक ऐसा राज्‍य है जिसमें लगभग 65.4 फीसदी लोग पानी के लिए घर से करीब 200 मीटर की दूरी पर जाते हैं, वहीं 10.3 फीसदी लोग घर से करीब आधा किमी दूरी तय करते हैं। इसके अलावा 1.9 फीसदी लोग पानी के लिए घर से एक किमी से अधिक की दूरी तय करते हैं। इसमें 22.4 फीसद ग्रामीणों के घरों में ही पानी उपलब्‍ध है।

गौरतलब है कि वर्ष 2018 में आई नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक देश में दस करोड़ लोग पानी की कमी की समस्या का सामना कर रहे होंगे। इनमें दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे बड़े शहर शामिल हैं। चेन्नई की स्थिति अभी से भयावह हो गई है। वहीं, 2030 तक देश के 40 प्रतिशत नागरिक पीने के पानी की समस्या से बुरी तरह प्रभावित होंगे। जानकारों के मुताबिक इस स्थिति से निपटने के लिए अभी से आपातकालीन कदम उठाने होंगे।


इंडिया वाटर पोर्टल के अनुसार धरती पर कुल 14000 लाख घन किमी पानी है। इतने पानी से पूरी धरती पर 3000 किमी मोटी परत बन सकती है, पर कुल पानी का 2.7 प्रतिशत पानी ही शुद्ध है। इसका भी अधिकांश हिस्सा ध्रुवों पर जमा है। यह पानी उपयोग के लिए नहीं है। इस तरह से एक प्रतिशत से भी कम पानी हमें उपलब्ध है। यह नदियों, झीलों, कुँओं, तालाबों और भूमिगत भंडारों के रूप में है।

देश में पानी का मुद्दा इतना गहरा गया है कि लोकसभा में इस संकट पर व्यापक चर्चा के लिये विशेष सत्र बुलाने या चालू सत्र में दो..चार दिन का समय तय किये जाने की मांग की गई है। निचले सदन में कई सदस्यों ने इससे संबद्धता व्यक्त करते हुए देश के विभि‍न्न हिस्‍सों में पेयजल के संकट को दूर करने का संबद्ध मंत्रालय से अनुरोध किया।

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राज्यसभा और लोकसभा के सदस्यों ने उठाया मुद्दा...

वहीं राज्यसभा और लोकसभा में विभिन्न दलों के सदस्यों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ रहे पेयजल संकट का मुद्दा केंद्र के सामने उठाया हैं साथ ही सरकार से नदियों को जोड़ने व भूजल का स्तर बढ़ाने की खातिर वर्षा जल संचयन जैसे कदम उठाते हुए समय रहते समाधान निकालने की मांग की हैं।

शून्यकाल में भाजपा के सत्यनारायण जटिया ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि यह पुरानी समस्या है जो दिन पर दिन गंभीर रूप लेती जा रही है। मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड, राजस्थान के बाड़मेर और बीकानेर, महाराष्‍ट्र के विदर्भ में अत्यंत चिंताजनक स्थिति है जहां पेयजल संकट बना रहता है लेकिन अब कर्नाटक, झारखंड और देश के विभिन्न हिस्सों में समस्या विकराल रूप लेती जा रही है।

टीआर बालू ने केंद्र सरकार से मांग की कि तमिलनाडु में जल को तरस रही जनता को राहत पहुंचाने के लिए तत्काल रेल टैंकरों से पानी की आपूर्ति सुनिश्चित कराई जाए। पश्चिम बंगाल के माल्दा उत्तर से भाजपा के खगेन मुर्मू ने अपने क्षेत्र में बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने की मांग की।

जून के आखिरी हफ्ते में भले ही मॉनसून ने मुंबई को पानी-पानी कर दिया हो लेकिन महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा सूखे से जूझ रहा है। बारिश न होने पर फसल चौपट हो गई है और लोग पीने के पानी के लिए ही कड़ा संघर्ष कर रहे हैं। सूखे के कारण लोगों के सामने आर्थिक संकट भी खड़ा हो गया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के चार बड़े जलाशयों में भी महज 2 फीसदी पानी बचा है। वहां के छह बड़े जलाशयों का पानी इस्तेमाल के लायक नहीं बचा है। राज्य में मांग हो रही है कि सरकार जलाशयों को जोड़ने की योजना और इस पर कानून बनाए।

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गांव कनेक्शन के अनुसार महाराष्‍ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 34.8 फीसदी लोगों को अपने घर में पानी मिल पाता है। सर्वे के अनुसार 43.3 फीसदी लोगों को अपने घर से 200 मीटर दूर पानी लेने के लिए जाना पड़ता है। इसके बाद 16.6 फीसदी लोगों को पानी के लिए घर से आधा किमी दूर जाना पड़ता है। इसके अलावा 3.6 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्‍हें पानी लेने के लिए एक या दो किमी दूर जाना पड़ता है। देश के 1.6 फीसदी ग्रामीणों को पानी के लिए घर से 3 से 5 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है।



पिछले साल मध्यप्रदेश में अच्‍छी बारिश हुई थी, नदी, तालाब और कुंए लबालब हो गए थे। लेकिन मार्च के महीने में पड़ी भीषण गर्मी के कारण इन जगहों की सूरत बदल गई। पानी के सभी स्‍त्रोत सूख गए, यहां जल संकट गहराने के कारण लोगों को कई किलोमीटर का रास्ता तय करने के बाद ही पानी मिल रहा है। इसी के कारण बीते दिनों गृह विभाग ने जल स्त्रोतों पर पहरा लगाने के पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे दिए थे।

अगर बात करें मध्‍यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों की तो यहां के हालात बहुत खराब हैं। यहां 35.7 फीसदी लोगों को घरों में पानी उपलब्‍ध है। यहां के 29.5 फीसदी ग्रामीणों को पानी के लिए घर से करीब 200 मीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। सर्वें में सामने आया कि 25.6 फीसदी ग्रामीण पानी के करीब आधा किमी की दूरी तय करते हैं। इसके बाद एक और चौकानें वाली बात सामने आई कि यहां ग्रामीण अन्‍य सभी राज्‍यों की तुलना में सबसे अधिक 7.4 फीसदी लोग पानी के लिए अपने घर से 1 से 2 किमी की दूरी तय करते हैं।

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जमीन के लिहाज से भारत के पास पृथ्वी का केवल 2.5 फीसदी हिस्सा है। दुनिया में पीने के पानी का बड़ा हिस्सा भूमिगत जल से मिलता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड मुताबिक भारत में भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिर रहा है। दुनिया भर के कुल भूमिगत जल का 24 फीसदी हिस्सा हमारे देश में इस्तेमाल हो रहा है।

सर्वे में ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्र की भी हालत खराब है। बीते दिनों एक मीडिया की रिपोर्ट में एनएनआई के अनुसार बताया गया था कि यहां अर्जुनशाही गांव के लोगों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए गंदे पानी का उपयोग करना पड़ता है। इनके क्षेत्रों में कुओं, नलकूपों या किसी स्वच्छ पेयजल का संसाधन ही उपलब्‍ध नहीं है। यहां बड़ी संख्या में महिलाएं अपने सिर के ऊपर बर्तन रखकर खेतों से पानी लाने के मजबूर है।

वहीं जब गांव कनेक्‍शन ने सर्वे किया तो पाया कि यहां के ग्रामीणों में लगभग 36.8 फीसदी लोगों के ही घरो में बस पानी की व्‍यवस्‍था है। इसके अलावा 29.3 फीसदी ग्रामीणों को पानी लेने के लिए अपने घर से आधा किमी दूर जाना पड़ता है। सर्वें में सामने आया कि 18.2 फीसदी ग्रामीण पानी के लिए अपने घर से करीब 200 मीटर की दूरी तय करते हैं। इसमें 6.6 फीसदी ग्रामीण पानी के लिए तीन से पांच किमी की दूरी तय करती हैं। इस सर्वें में 4.0 फीसदी ऐसे लोग भी हैं जो पानी के लिए 5 किमी से अधिक की दूरी तय करते हैं।

अब मानसून की कछुआ चाल को नापने का जो आंकड़ा मौसम विभाग ने दिया है, वह सूखे का स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहा है। 22 जून तक विभाग ने औसतन 39 फीसदी कम बारिश दर्ज की है। ओडिशा और लक्षद्वीप संभागों में सामान्य वर्षा दर्ज की गई है। जबकि जम्मू-कश्‍मीर और पूर्वी राजस्थान में अधिक वर्षा हुई है। इनके विपरीत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बहुत अधिक वर्षा हुई हैं। इन क्षेत्रों के जलाशयों में जल बिल्कुल निचले स्तर तक पहुंच जाने के कारण सूखे की स्थिति निर्मित हो गई है।



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अगर बात की जाए जम्मू-कश्‍मीर की तो यहां के आंकड़े संतोषजनक हैं यहां 77.4 फीसदी ग्रामीणों के घरों में पानी उपलब्‍ध है। वहीं 11.9 फीसदी ग्रामीणों को पानी के लिए अपने घरों से करीब 200 मीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। सर्वें में पता चला कि 6.5 फीसदी लोगों को पानी के लिए अपने घर 3 से 5 की दूरी तय करते हैं। इस सर्वें में एक चौकानें वाला मामला सामने आया जिसमें पता चला कि 2.2 फीसदी ग्रामीण पानी के लिए पांच किमी से अधिक की दूरी तय करते हैं। यह आकड़ा अन्‍य राज्‍यों की तुलना में दूसरे नंबर पर है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था वाटर एड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक दुनिया के 21 शहरों में डे-जीरो (Day Zero) जैसे हालात बन जाएंगे। 2040 तक भारत समेत 33 देश पानी के लिए तरसने लगेंगे। जबकि वर्ष 2050 तक दुनिया के 200 शहर खुद को डे-जीरो वाले हालात में पाएंगे।

गावं कनेक्‍शन के सर्वें में आया कि उत्‍तर प्रदेश में 74.3 फीसदी ग्रामीणों के घरों में पानी उपलब्‍ध है। यहां 19.0 फीसदी ग्रामीण पानी के लिए अपने घरों से करीब 200 मीटर की दूर जाते हैं। वहीं 4.3 फीसदी ग्रामीण पानी के लिए अपने घरों से आधा किमी दूर जाते हैं। वहीं झारखंड में 38.2 फीसदी लोगों के घरों में पानी उपलब्‍ध है। वहीं 4.4 फीसदी ग्रामीण नानी के लिए अपने घरों से करीब एक या दो किमी की दूरी तय करते हैं। इसमें 30.6 फीसदी ऐसे ग्रामीण हैं जो पानी के लिए अपने घर से आधे किमी की दूरी तय करते हैं। इसके अलावा 25.9 फीसदी ऐसे ग्रामीण हैं जो पानी के लिए करीब 200 मीटर की दूरी तय करते हैं।

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए सरकार ने अपना दूसरा कार्यकाल जल संकट के बीच शुरू किया है। नई सरकार ने जल शक्ति नाम से नया जल मंत्रालय बनाया है। मंत्रालय की अहम जिम्मेदारी देश में जल संकट को कम करने की है और उसने ऐलान किया है कि मंत्रालय ने 2024 तक भारत में हर घर में पाइप के जरिए पानी का कनेक्शन देने की योजना बनाई है। ऐसे में देखना होगा कि जिस तरह से जल संकट बना हुआ है और पीने वाले जल सूखते जा रहे हैं। उस प्रकार से सरकार कितनी तेजी के साथ काम कर सकती है।


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