सरदार सरोवर बांध की कीमत चुकाते नर्मदा के किनारे बसे कई गाँव

सरदार सरोवर बांध की कीमत चुकाते नर्मदा के किनारे बसे कई गाँव

पुष्पेंद्र वैद्य, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

बडवानी (मध्य प्रदेश)। सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई लगातार बढ़ाए जाने से इलाके में बसे तमाम गांवों में बैक वाटर की वजह से पानी भर गया है। गाँव, घर, खेत और खलिहान सबकुछ जलमग्न हो चुके हैं। लोगों को ना जमीन मिली है ना मुआवजा। कई लोगों को पुनर्वास स्थल पर भेज दिया गया है, लेकिन यहां इन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो रहा है। भूखे बच्चों को खाने के लिए तरसना पड़ रहा है। ऐसे परिवारों की बड़ी चिंता अब इस बात की भी है कि उनके घर, जमीन सब कुछ डूब चुके हैं। पुनर्वास स्थलों पर कई जगह ताले पड़े हैं। कुछ पुनर्वास स्थलों पर पीने के पानी की समस्या के कारण प्रशासन एन वक्त पर नलकूप खनन करवा रहा है।

नर्मदा घाटी के तमाम गाँवों में इन दिनों तबाही जैसे हालात बने हुए हैं। लोगों की जिंदगी भर की कमाई पानी में डूब चुकी है। घरों में कहीं दो फीट तो कहीं चार से पांच फीट तक पानी भर गया है। कहीं घरों की छतें दिखाई दे रही है तो कहीं नामों निशान ही डूब चुका है। पिछोड़ी गांव के रहने वाले अरविंद बडोले बताते हैं, "मैं अभी भी मूल गांव में रह रहा हूं। गाँव के ही कई लोगो को पात्र माना गया है जबकि कुछ लोगों को अपात्र माना गया है। हमें अभी तक प्लाट नहीं मिला है। जिनको मिला है उन्हें पांच किलोमीटर दूर दिया गया है। गाँव के जिन लोगों को बसाया गया है उन्हे अलग-अलग जगह प्लाट दिए गए हैं।"


पिछोडी के ही बलराम सोलंकी बताते हैं, "मुझे अभी तक प्लाट नहीं दिया गया। चार दिन पहले कलेक्टर आए थे उन्होंने कहा था कि प्लाट जल्द ही दे देंगे। अगले दिन हम एनवीडीए (नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण) के दफ्तर गए लेकिन वहां आज नहीं कल आने की बात कह रहे हैं। हमारा सब कुछ डूब गया है। कहां जाएं कुछ समझ नहीं आ रहा। "

डूब प्रभाविक इलाके अंवला से अंजड के पुनर्वास स्थल आए संजय सरकारी अफसरों से नाराज हैं। वो कहते हैं, "दो वक्त का खाना तो मिल रहा है लेकिन वक्त तय नहीं है। बच्चों को भूख लगती है तो उन्हें दिलासा देकर चुप कराना पड़ता है। सरकारी अफसरों को आना चाहिए लेकिन उनकी सुध लेने कोई नहीं आ रहा। पुनर्वास स्थल पर पीने के पानी का इंतजाम नहीं है। आग लगी तब कुंआ खोदने की तर्ज पर अब नलकूप खोदा जा रहा है। कई पुनर्वास स्थलों पर ताले डले हैं।"

धार जिले के खापरखेड़ा गांव की रहने वाली रंजना बाई दहाड़े मार-मार कर रो रही हैं। उनके घर के भीतर चार फीट तक पानी भर गया है। परिवार के लोग उन्हें समझा कर पानी से बाहर निकाल रहे हैं। रोते हुए रंजना कह रहीं हैं, "उनके पति की सरकारी नौकरी है। सरकार उन्हें ना मुआवजा दे रही है ना ही प्लॉट। कहा जा रहा है कि सरकारी आदमी हो इसलिए कोई लाभ नहीं मिलेगा। अब कहां जाएंगें। कई पीढ़ियों से यहां रह रहे थे।


बांध की ऊंचाई 138 मीटर तक बढ़ाई जानी है। फिलहाल 136 मीटर ऊंचाई तक पानी भरा जा चुका है। दो मीटर और बढ़ाया जाना बाकी है। प्रदेश सरकार भी बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने का विरोध कर रही है। नर्मदा घाटी में प्रभावित गाँवों की संख्या 192 और एक नगर है। प्रभावितों की कुल संख्या 32 हजार है। इससे पहले शिवराज सिंह सरकार महज 76 गाँवों को ही प्रभावित मानकर कोर्ट में झूठे हलफनामें पेश करती रही। मेधा पाटकर के सत्याग्रह के बाद प्रदेश सरकार ने प्रभावित गांवों की संख्या 178 मान ली है। यही वजह है कि अब पानी का स्तर बढ़ने के साथ ही आनन-फानन में लोगों के निपटारे भी किए जा रहे हैं।

बांध के इस बैक वाटर में आम जान माल के साथ-साथ देवताओं के धाम, मन्दिर, चबूतरे, आश्रम, घाट और पेड़ सब कुछ डूब जाएंगे। सैकड़ों सालों से इंसानी आस्था में चाहे इन्हें देवता होने का मान मिलता रहा हो लेकिन डूब के दर्द से ये भी अछूते नहीं हैं। इस इलाके में सैकड़ों छोटे-बड़े मन्दिर और अन्य स्मारक अब इतिहास में तब्दील होते जा रहे हैं। पानी के लगातार बढ़ते जल स्तर से एक के बाद एक धरोहरें डूबती जा रही हैं।

कभी जहां सुबह-शाम प्रार्थानाओं के गीत और आरती के घड़ी घंटालों की आवाजें गूँजती रहती थी, अब उन्हीं मन्दिरों के आसपास खौफ का सन्नाटा पसरा पड़ा है। जिनसे कभी लोग अपने दुःख-तकलीफों से पार पाने का हौंसला जुटाते रहे, आज वे देवता के धाम ही डूब रहे हैं। ये उन-उन गाँवों में एक हजार साल से सौ-दो सौ साल पहले से यहाँ के लोगों की जन आस्था से जुड़े रहे हैं लेकिन अब इन्हें इतिहास में बदलने से कोई नहीं रोक पा रहा। नर्मदा नदी के किनारे ऐसे सैकड़ों स्थान हैं जो अब तक अपनी रमणीकता और आस्था के लिए जाने जाते हैं।


धार जिले के कुक्षी में गांगली गाँव का प्राचीन नंदेश्वर महादेव का मंदिर डूब रहा है, इसका उल्लेख नर्मदा पुराण और शिवमहापुराण में भी मिलता है। आज से 9 साल पहले 2010 में यहां से प्रतिमा को अन्यत्र स्थापित किया जा चुका है। प्रतिमा को तो अन्यत्र भेज दिया लेकिन गंगा कुण्ड को कोई किस तरह ले जा सकता है। हर साल गंगा दशहरे पर यहां बड़ा मेला लगता था और दूर-दूर से यहां लोग स्नान के लिए आते थे। मान्यता है कि साल में इसी दिन एक बार गंगा खुद नर्मदा से मिलने आती है लेकिन अब गंगा कैसे मिलेगी नर्मदा से। वे लोग कहां जाएंगे जो बीमारियों के इलाज के लिए सालों से इस कुंड में स्नान करते रहे। शिवमहापुराण में भी पृष्ठ 526 पर गंगा कुंड का उल्लेख मिलता है।

इसी तरह बोधवाड़ा का देवपथ महादेव मंदिर भी डूब में है। इसमें अभी तक मूल स्थान पर ही प्रतिमा है और पुजारी को यहाँ पूजा करने के लिए नाव से जाना पड़ रहा है। पुराणों के अनुसार कहा जाता है कि समुद्र मंथन के बाद देव-दानवों की लडाई में शंकरजी विषपान कर मैकाल पर्वत पर जा पहुँचे। भगवान शिव की पुत्री मानी जाने वाली रेवा (नर्मदा) का उद्गम भी इसी पर्वत श्रृंखलाओं से हुआ है। देवताओं ने शिव को ज़हर पिलाने का भान हुआ तब उन्होंने प्रायश्चित स्वरूप बोधवाडा में स्नान कर उनकी परिक्रमा कर उनसे क्षमा याचना की थी। देवताओं को अपनी गलती का बोध हुआ, इसीलिए इस जगह का नाम बोधवाडा पड़ा था। बताया जाता है कि यह देश का एकमात्र मन्दिर है, जिसकी स्थापना रूद्रयंत्र पर हुई है और इसके गुम्बद में बीसा यंत्र है।

आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने डूब प्रभावित जिन महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक मन्दिरों को शामिल किया है, उनमें धार जिले की मनावर तहसील के एकलरा का एक हजार साल पुराना शिव मन्दिर तथा सौ साल पुराने अन्य चार मन्दिर भी शामिल हैं। इसी तरह कुक्षी तहसील में कवठी गाँव के सौ साल पुराने कृष्ण और हनुमान, गांगली का एक हजार साल पुराना नंदेश्वर, बोधवाड़ा का 700 आल पुराना देवपथ मन्दिर, मलवाडा का डेढ़ हजार साल पुराना बोदेल बाहू का मन्दिर, चिखल्दा के 900 साल पुराने नीलकंठेश्वर और हरेहरश्वर मन्दिर, डेहर गाँव के 300 साल पुराने मन्दिर, कोटेश्वर में दो हजार साल पुराना राम मन्दिर और महादेव मन्दिर भी शामिल हैं।

बडवानी जिले के भी पीपलूद के 200 साल पुराने चार बड़े मन्दिर, बगुद में चार मन्दिर, उचावद में दो, पीपरी में पांच, भीलखेडा में दो हजार साल पुराने शिव मन्दिर सहित पांच मन्दिर, छोटी कसरावद में दो हजार साल पुराने मोजेश्वर सहित तीन मन्दिर और राजघाट में सौ साल पुराने दत्त मन्दिर सहित चार मन्दिर भी डूब चुके हैं या कगार पर हैं।


ये सूची तो केवल बड़े मन्दिरों की है। इसमें लोक देवताओं के चबूतरे और छोटे मन्दिरों का तो कहीं अता पता भी नहीं है न उनका कोई पुनर्वास होगा। लोक के देवी देवताओं की कहानियाँ तो अब किस्सों में ही रह जाएगी। इसके अलावा कई मस्जिदें भी डूब जाएंगी। इस तरह सरदार सरोवर के इस सैलाब में लोग ही नहीं कई भगवान भी बेघर हुए जा रहे हैं।

9 दिनों तक भूखे-प्यासे सत्याग्रह करने वाली नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर अब मध्यप्रदेश सरकार के साथ मिलकर प्रभावितों को हक दिलाने में जुटी हैं। 9 सितंबर को 8 घंटों तक उन्होंने नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के मंत्री सुरेन्द्र सिंह बघेल औरअफसरों के साथ बैठक की। बैठक में डूब प्रभावितों की पात्रता को त्वरित निराकरण और लाभ आवंटित करने के सख्त आदेश दिए गए हैं।

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