राहुल गांधी जिस वायनाड से लड़ रहे हैं चुनाव, वहां के किसानों का हाल जान हैरान रह जाएंगे आप

वायनाड के किसानों और लोगों ने एक चार्टर न‍िकाला है, जिसके माध्‍यम से वो बता रहे हैं कि वायनाड में किसानों की क्‍या समस्‍याएं हैं और वायनाड की असल जरूरतें क्‍या हैं। यहां तीसरे चरण में 23 अप्रैल को मतदान हो रहा है।

Ranvijay SinghRanvijay Singh   23 April 2019 5:30 AM GMT

राहुल गांधी जिस वायनाड से लड़ रहे हैं चुनाव, वहां के किसानों का हाल जान हैरान रह जाएंगे आप

'एक किसान कॉफी के खेत में मृत पाया गया। इस किसान ने जहर खाकर आत्‍महत्‍या की है। उसके रिश्‍तेदारों का कहना है कि किसान ने अलग-अलग स्रोतों से करीब 6 लाख रुपए का कर्ज ले रखा था और यह कर्ज का बोझ उसकी सांस पर भारी पड़ा।' यह लाइनें द हिंदू की वेबसाइट पर लगी एक रिपोर्ट की हैं, जो केरल के वायनाड में किसानों की आत्‍महत्‍या की कहानी बयान करती है।

केरल का वायनाड एक बार फिर सुर्खियों में है। इसके सुर्खियों में होने की वजह कांग्रेस के अध्‍यक्ष राहुल गांधी का यहां से लोकसभा चुनाव लड़ना है। हालांकि वायनाड पहले भी खबरों में जगह बनाता रहा है, लेकिन किसानों की अत्‍महत्‍याओं को लेकर। ऐसे में राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने की खबरों के बीच वायनाड के किसानों और लोगों ने एक चार्टर न‍िकाला है, जिसके माध्‍यम से वो बता रहे हैं कि वायनाड में किसानों की क्‍या समस्‍याएं हैं और वायनाड की असल जरूरतें क्‍या हैं। यहां तीसरे चरण में २३ अप्रैल को मतदान हो रहा है।

यह चार्टर वायनाड फार्मर्स कलेक्‍ट‍िव की ओर से जारी किया गया है। वायनाड फार्मर्स कलेक्‍ट‍िव के अध्‍यक्ष राजेश कृष्‍णन गांव कनेक्‍शन को फोन पर बताते हैं, ''वायनाड की आबादी करीब 8.5 लाख है। इनमें से 80 प्रतिशत लोगों की आजीविका सीधे तौर पर खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। लेकिन खेती में हो रहे लगातार नुकसान और उससे बढ़ रहे तनाव की वजह से यहां किसानों के आत्‍महत्‍याओं का आंकड़ा भी तेजी से बढ़ रहा है। पिछले 18 साल (2000 से 2018) में यहां करीब 2000 किसान आत्‍महत्‍या कर चुके हैं।''

जब राजेश कृष्‍णन से पूछा गया कि किसानों के आत्‍महत्‍याओं का आंकड़ा उन्‍होंने कहां से हासिल किया। इसपर वो कहते हैं, ''यह आंकड़े एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो) के नहीं हैं, क्‍योंकि 2016 के बाद से ही केंद्र सरकार किसानों के आत्‍महत्‍या के आंकड़े जारी नहीं कर रही। वायनाड में किसानों की आत्‍महत्‍या को लेकर 2008 में एक स्‍टडी हुई थी। उसके मुताबिक 2000 से लेकर 2008 तक 1690 किसानों ने आत्‍महत्‍या की थी। इसके बाद हमने अंग्रजी अखबारों की रिपोर्ट्स को भी आधार बनाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि पिछले 18 साल में करीब-करीब 2000 किसान आत्‍महत्‍या कर चुके हैं।'' राजेश कहते हैं, ''वायनाड को महाराष्‍ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश की तरह किसानों के आत्‍महत्‍या के लिए जाना जाता है। क्‍योंकि यह हिंदी बेल्‍ट नहीं है, ऐसे में यहां की खबरें उस हिसाब से उभर कर नहीं आईं।''

वायनाड के किसानों की आत्‍महत्‍या पर की गई स्‍टडी। इस स्‍टडी का नाम 'Wayanad suicides, A psycho - social autopsy' है। वायनाड के किसानों की आत्‍महत्‍या पर की गई स्‍टडी। इस स्‍टडी का नाम 'Wayanad suicides, A psycho - social autopsy' है।

किसानों की आत्‍महत्‍या को लेकर राजेश कृष्‍णन की बात पर न्‍यूज 18 की खबर 'Wayanad farmers: From debt trap to death trap' और द हिंदू की खबर 'Dead farmers of Wayanad tell bitter tales' मुहर लगाती हैं। ऐसे ही और कई खबरें हैं जिनमें वायनाड में किसानों की स्‍थ‍िति को लेकर चिंता जाहिर की गई है।

इसी कड़ी में फरवरी 2012 में आई द हिंदू की एक रिपोर्ट में लिखा गया है कि ''वो महत्वाकांक्षी था, अपने परिवार के लिए बहुत कुछ करना चाहता था, इसलिए खेतों में खूब मेहनत करता। जब पिछले साल अदरक की कीमतों में उछाल आया और 60 किलो के बैग के लिए 3 हजार रुपए मिलने लगे तो उसने अदरक की खेती की ओर रुख किया। उसने अदरक की खेती में सब कुछ लगा दिया था। पिछले महीने (जनवरी 2012) जब उसने आत्‍महत्‍या की उस वक्‍त अदरक का दाम 350 रुपए बैग था, और उसपर 3.07 लाख का कुल कर्ज।'' यह कहानी वायनाड जिले के वेल्‍लामुंडा गांव के सी.पी शषिधरन (59 साल) की है, जिसने सुसाइड नोट में यह सारी बातें लिखी थीं।

राजेश बताते हैं, ''वायनाड में सी.पी शष‍िधरन की तरह ही कई कहान‍ियां मिल जाती हैं। इसी साल मार्च में वायनाड जिले के मानंथावाडी तालुका के थ्र‍िस्‍स‍िलेरी गांव में एक किसान ने आत्‍महत्‍या कर ली। किसान का नाम कृष्‍ण कुमार (55 साल) था। कृष्‍ण कुमार पर आठ लाख का कर्ज था, जोकि मार्च में ही चुकाना था। केरल की बाढ़ ने कृष्‍ण कुमार की माली हालत को बिगाड़ दिया था। मुख्‍य रूप से कॉफी, धान और काली मिर्च की खेती करने वाले कृष्‍ण कुमार को खेती से इस कर्ज के चुकता होने की उम्‍मीद नहीं थी। ऐसे में कर्ज चुकाने का बोझ वह सह न सके और आत्‍महत्‍या का रास्‍ता चुन लिया। कृष्‍ण कुमार अपने पीछे एक पत्‍नी और बेटे को छोड़ गए हैं, जिनपर इस कर्ज को चुकाने की जिम्‍मेदारी है।''

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इन आत्‍महत्‍या की घटनाओं को जानने के बाद सवाल उठता है कि आखिर इसके पीछे वजह क्‍या है? वायनाड में किसानों को क्‍या परेशानी है? इसका जवाब वायनाड के पयमपल्‍ली गांव के किसान और रिसर्चर ई.जे जोस इलानजिमट्टम देते हैं। जोस ने वायनाड में किसानों की आत्‍महत्‍या को लेकर 2008 में एक स्‍टडी भी की थी, जिसका जिक्र राजेश कृष्‍णन करते हैं। जोस बताते हैं, ''सबसे बड़ी वजह यह है कि खेती अब मुनाफे का सौदा नहीं रहा है।

वायनाड में किसान मुख्‍य रूप से कॉफी, काली मिर्च और मसाले की खेती करते हैं। इस खेती पर सरकार की आयात पॉलिसी का सीधा असर हो रहा है। सरकार ने मार्केट बाहर की कंपनियों के लिए खोल दिया है। इसकी वजह से कम दाम वाली काली मिर्च और अन्‍य मसाले बाजार में आ जाते हैं और फिर लोकल फार्मर्स को मार्केट से जो दाम मिलना चाहिए वो नहीं मिलता। अगर काली मिर्च के दाम ही देखें तो पिछले साल से इस साल में तीन गुना दाम कम हुए हैं। पिछले साल एक किलो काली मिर्च 900 रुपए तक बेची गई, वहीं इस साल 300 रुपए से ज्‍यादा का दाम नहीं मिल रहा। बाजार में यह जो भाव गिर रहे हैं यह आयात की पॉलिसी के वजह से है। दाम ग्‍लोबल मार्केट में तय हो रहे हैं और किसान इसमें कुछ नहीं कर पाता। ऐसे में उसे घाटा सहना पड़ रहा है।''

किसान और रिसर्चर ई.जे जोस इलानजिमट्टमकिसान और रिसर्चर ई.जे जोस इलानजिमट्टम

जोस बताते हैं, ''दूसरी वजह क्‍लाइमेट चेंज भी है। पहले साल में 6 महीना हमें पानी मिल जाता था, बारिश समय पर होती थी। अब ग्‍लोबल वार्मिंग की वजह से बारिश भी कम होने लगी है और अगर होती है तो एक ही बार में तेज हो जाती है। इसकी वजह से फसलों को नुकसान होता है। ग्राउंड वॉटर लेवल भी दिन पर दिन नीचे जा रहा है। इसकी वजह से खेती करना मुश्‍किल और महंगा हो गया है। आप कह सकते हैं कि क्‍लाइमेट चेंज की वजह से वायनाड में कृषि व्‍यवस्‍था चौपट हो गई है।''

जोस बताते हैं, ''ऐसे में होता यह है कि किसान लगातार घाटे में खेती करता जाता है। वायनाड में एक चलन और है कि किसान एक साल में एक तरह की फसल लगाता है, ऐसे में यह घाटा और ज्‍यादा बढ़ जाता है। अब इससे उबरने के लिए वो कई जगह से कर्ज लेता है। यह कर्ज परिवार चलाने से लेकर खेती करने तक के लिए लेना पड़ता है। इस स्‍थ‍िति में कई बार किसान कर्ज के बोझ में इतना दब जाता है कि आत्‍महत्‍या के अलावा कोई रास्‍ता बचता ही नहीं।''

राजेश कृष्‍णन कहते हैं, वायनाड में जो भी फसलें लगती हैं उसका सीधा कनेक्‍शन क्‍लाइमेट से है। जैसे कॉफी के लिए एक खास तरह का टेंपरेचर चाहिए। काली मिर्च के लिए पानी चाहिए। प्रकृति के तौर पर देखें तो वायनाड बहुत बढ़‍िया है। यहां की 40 फीसदी जमीन पर जंगल है, हमारे यहां से 11 नदियां होकर गुजरती हैं। वायनाड में पिछले 1 हजार साल से खेती हो रही है, लेकिन 70 के दशक से स्‍थ‍िति बदलने लगी। जंगलों को काट कर ऐसे पेड़ लगाए गए जिसे बेच कर फायदा हो सके। साल, महाबनी जैसे पेड़ लगाए गए हैं। सड़कों का निर्माण, टाउनशिप और इस जैसे कई प्रोजेक्‍ट्स की वजह से वायनाड को नुकसान हो रहा है। क्‍लाइमेट चेंज में इसका बहुत असर हुआ है।

राजेश कृष्‍णन की बात को climate south asia network पर लगी एक रिपोर्ट 'Climate change exacerbates the plight of farmers in Wayanad, Kerala' भी प्रमाणित करती है। क्‍लाइमेट रिसर्चर सुबिनी एस. नायर की इस रिपोर्ट के मुताबिक, वायनाड के कुल क्षेत्रफल का 54 फीसदी हिस्‍से का उपयोग कृषि के लिए किया जाता है। चाय, कॉफी, इलायची, कोको और काली मिर्च यहां की प्रमुख फसलें हैं और ये सभी फसलें तापमान के प्रति संवेदनशील हैं। वनों की कटाई के कारण केरल के अन्‍य हिस्‍सों के मुकाबले इस क्षेत्र में तापमान में बहुत अधिक वृद्धि हुई है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि, क्‍लाइमेट चेंज की वजह से किसान एक ही साल में कई तरह की फसलें भी लगाने लगे हैं, ताकि वो नुकसान से सीधे तौर पर बच सकें। वहीं इस वजह से काली मिर्च के रकबे में भी कमी आई है। वर्ष 2005-06 में वायनाड में काली मिर्च की खेती का क्षेत्रफल 20,900 हेक्टेयर था, जिसमें 11,483 टन का उत्पादन हुआ था, जबकि 2013-14 तक यह क्षेत्र घटकर 8633 हेक्टेयर रह गया और उत्पादन घटकर सिर्फ 2524 टन रह गया।

रोजश कृष्‍णन बताते हैं, ''हमने किसानों का चार्टर इसी लिए निकाला है ताकि लोकसभा चुनाव में प्रत्‍याशी समझ सकें कि वायनाड की जरूरतें क्‍या हैं। यहां के किसान क्‍यों आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हैं, उनकी समस्‍या क्‍या है। हमें सड़कें और कंकरीट के जंगल नहीं चाहिए। वायनाड की खूबसूरती उसके प्रकृति से ही है। नीति निर्माताओं को यह बात समझनी चाहिए। इस लिए यह चार्टर निकाला गया है ताकि प्रत्‍याशी जान सकें और इस दिशा में कुछ काम करें, जिससे किसानों को आत्‍महत्‍या जैसा कदम न उठाना पड़े।''


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