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पश्चिम बंगाल के मजदूरों का दर्द, लॉकडाउन ने रोजगार छीना, अम्फान ने घर और फसल

लॉकडाउन के चलते करोड़ों मजदूर बेरोजगार हुए और आजीविका के लिए पैदल, ट्रक, साइकिल, ट्रेन से घर लौट आए। लेकिन पश्चिम बंगाल के हजारों मजदूर पर दोहरी मार पड़ी है। न रोजगार है न घर बचा है ...

Kushal MishraKushal Mishra   30 May 2020 7:57 AM GMT

पश्चिम बंगाल के मजदूरों का दर्द, लॉकडाउन ने रोजगार छीना, अम्फान ने घर और फसलपश्चिम बंगाल के गांवों से बाहर गए प्रवासी मजदूरों पर लॉकडाउन और अम्फान चक्रवात की दोहरी मार पड़ी है।

"गाँव में हमारा मिट्टी का घर उजड़ गया और अभी तक मैं अपने घर भी नहीं पहुँच सका हूँ, मेरी माँ और पत्नी वहां अकेले हैं," पश्चिम बंगाल से करीब 2500 किलोमीटर दूर केरल के मल्लापुरम में मजदूरी के लिए गए देबव्रत प्रमानिक बताते हैं। लॉकडाउन और अम्फान तूफ़ान की वजह से देबव्रत जैसे पश्चिम बंगाल के हजारों प्रवासी मजदूरों पर दोहरी मार पड़ी है और अब वे और भी बड़ी मुसीबत में फँस चुके हैं।

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में कुल्ताली ब्लॉक के पूरब गुरगुरिया गांव में रहने वाले देबव्रत के पास के गाँव मध्य गुरगुरिया में अम्फान चक्रवात की वजह से बना बाँध टूट चुका है। बाँध गिरने से ग्रामीणों के घरों में पानी भर गया और बची-खुची कसर तूफ़ान ने पूरी कर दी। तेज हवाओं की वजह से उनके घर ढह गए। गाँव के लोगों के पास रहने की भी जगह नहीं बची है।

इन गांवों से ज्यादातर लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए जाया करते हैं, मगर लॉकडाउन की वजह से वे इस मुसीबत के समय में भी अपनों से दूर हैं और चाहकर भी कोई भी मदद नहीं कर पा रहे हैं।

केरल के मल्लापुरम में मजदूरी के लिए गए देबव्रत लॉकडाउन की वजह से अकेले नहीं फंसे हैं, उनके साथ 28 मजदूर और हैं जिन्हें पश्चिम बंगाल में अपने घर जाने के लिए अभी तक ट्रेन नहीं मिल सकी है।

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गांवों में लोगों के घर भरा नदी का पानी, तूफ़ान ने उजाड़ दिया घर। फोटो साभार : तन्मय घोष

देबव्रत 'गाँव कनेक्शन' से फ़ोन पर बताते हैं, "बहुत मुसीबत में हूँ, तूफ़ान की वजह से घर का छत भी नहीं बचा है, जो थोड़ा अनाज-राशन रखा था घर में, वो भी घर में पानी घुस गया तो भीग गया, घर में केवल माँ, पत्नी और मेरे डेढ़ साल का बेटा है, अभी तो इतना पैसा भी नहीं है उनके पास कि कोई मिस्त्री बुलाकर सही करा सकें।"

पहले ही कोरोना महामारी से जूझ रहे पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए बंगाल की खाड़ी में बना चक्रवाती तूफ़ान अम्फान और भी बड़ी मुसीबत बनकर आया है। भारतीय मौसम विभाग ने इस चक्रवाती तूफ़ान को 'सुपर साईक्लोन' का दर्जा दिया है। वर्ष 1999 के बाद यह पहली बार है जब इस तूफ़ान की रफ़्तार 220 से 240 किलोमीटर प्रति घंटा तक दर्ज की गयी। अब तक इस तूफ़ान की वजह से पश्चिम बंगाल में 86 लोगों की जान जा चुकी है और सुंदरबन, दक्षिण 24 परगना समेत करीब 14 जिलों के आधारभूत ढाँचे को खासा नुकसान पहुंचा है।

तूफ़ान की वजह से गाँव में बिजली भी नहीं है, कई जगह टावर उखड़ चुके हैं। नेटवर्क की समस्या होने की वजह से बाहर दूसरे राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूर गाँव में अपने घर वालों से बातचीत भी नहीं कर पा रहे हैं।

देबव्रत बताते हैं, "पिछली बार जब माँ से बात हुई थी तो बता रही थीं कि कई लोगों के घर ढह गए हैं, गाँव के स्कूल में लोग कुछ व्यवस्था कर रहे हैं, बाकी खाने-पीने का बहुत दिक्कत है वहां, इधर हम लोगों को भी ट्रेन नहीं मिल रहा है, कब का हम लोग रजिस्ट्रेशन भी करा चुके हैं, मगर बार-बार टाल रहे हैं।"

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दक्षिण 24 परगना के पश्चिम राधा नगर गाँव में अम्फान चक्रवात से ग्रामीणों के घर ढह गए।

लॉकडाउन के कारण दो महीने से काम न मिलने की वजह से देबव्रत के पास इतने भी पैसे नहीं है कि खुद से कुछ व्यवस्था करके निकल सकें। वह बताते हैं, "सिर्फ 400 रुपए पड़े हैं, खाने-पीने में भी हम लोग सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं, लॉकडाउन के दौरान जो खाना हम लोगों को बाहर से मिलता था तो दिन का खाना भी हम लोग रात में खाए हैं, एक ही बार खाना खाते हैं, सरकार से भी हम लोगों को कोई सुविधा भी नहीं मिला।"

दक्षिण 24 परगना के पश्चिम राधा नगर गाँव में बबला सरदार (19 वर्ष) का घर भी अम्फान की वजह से पूरी तरह उजड़ गया है। गाँव में अभी बबला के साथ परिवार में उसकी मां और भाभी हैं, जबकि मजदूरी के लिए गए उसके पिताजी और बड़ा भाई तमिलनाडु और केरल में अभी तक फँसे हुए हैं।

फ़ोन पर बातचीत में बाबला बताते हैं, "घर की छत, बल्लियाँ, सब ढह गयी हैं, कुछ भी नहीं बचा है, हम लोग बड़ी मुश्किल में हैं। बाबा (पिताजी) और भाई भी बाहर फँसे हैं, उन्हें ट्रेन नहीं मिल पा रही है," आगे कहते हैं, "यहाँ बिजली भी नहीं है, नेटवर्क भी बार-बार कट रहा है कि फ़ोन पर बात कर सकें, बड़ी मुश्किल से हम लोग 15-20 मिनट के लिए फ़ोन चार्ज कर पा रहे हैं ताकि उन्हें खबर कर सकें।"

बाबला के पिताजी उत्तम सरदार तमिलनाडु के इस्सा इलाके में फँसे हैं। वह फ़ोन पर बताते हैं, "यहाँ से कोई गाड़ी (ट्रेन) नहीं मिल रही है, अगर वहां होता तो शायद कुछ मदद भी कर पाता, छोटे बेटे का फ़ोन आया था तो बता रहा था, घर में कुछ नहीं बचा है। लॉकडाउन और तूफ़ान ने हमारा सब कुछ बर्बाद कर दिया।"

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अम्फान तूफ़ान से ढह चुके अपने घर पर खड़े बाबला सरदार

इन गांवों से बाहर गए प्रवासी मजदूर लॉकडाउन में अपना न सिर्फ अपना रोजगार खो चुके हैं बल्कि अम्फान की वजह से ऐसे हजारों मजदूरों के घर तबाह हो गए हैं। पहले ही बेरोजगारी और भुखमरी की मार झेल रहे इन ग्रामीणों के लिए मुसीबतें कई गुना बढ़ चुकी हैं।

दक्षिण 24 परगना जिले के कृष्णदासपुर गाँव के पास बने बाँध टूट जाने की वजह से सैकड़ों लोगों के घर नदी का पानी भर गया। किसी तरह कोलकाता से अपने गाँव कृष्णदासपुर पहुंचे बानी बताते हैं, "घर में नदी का पानी भर गया, अब हम लोगों के पास छत भी नहीं बची है, जब बरसात होती है तो पानी घर में ही गिरता है, हमें नहीं लगता कि हम दोबारा यहाँ रह पायेंगे।"

गाँव में बानी के पिता जी किसान हैं, वह कहते हैं, "गाँव में पापा की जो खेती थी वो भी बर्बाद हो गयी, शायद इस साल यहाँ खेती भी नहीं होगी। लोगों के पास न तो पैसा बचा है, न ही खाने के लिए सब्जियां हैं।"

अम्फान ने सैकड़ों गांवों के लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई ऐसे गाँव भी हैं जहाँ ज्यादातर ग्रामीण मजदूर हैं और दूसरे राज्यों में काम के लिए जाते हैं। गांवों में इनके घर टूट गए हैं। इसके बावजूद अभी तक इन्हें सरकारी मदद नहीं मिल सकी है।

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दक्षिण 24 परगना जिले के कृष्णदासपुर गाँव में नदी का पानी घुसने के बाद गिर गया बानी का घर।

तूफ़ान से प्रभावित गांवों में ग्रामीणों की भोजन और उनके रहने-खाने की मदद कर रहे बंगाल संस्कृति मंच के सचिव तन्मय घोष बताते हैं, "उत्तर 24 परगना के मिनखा में हरिनुल्ला गाँव है, करीब 3000 की आबादी वाले इस गाँव में लगभग सभी लोग मजदूर हैं और दूसरे शहरों-राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं।"

वह बताते हैं, "अभी तक न तो प्रशासन और न ही कोई राजनीतिक दल का व्यक्ति वहां मदद के लिए पहुंचा है, गाँव के लोगों के पास खाने के लिए कुछ नहीं है, हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि वहां लोगों तक भोजन का प्रबंध किया जाए। मगर स्थिति अभी भी बहुत खराब है।"

वहीं प्रभावित लोगों तक मदद पहुँचाने का काम कर रही एक और संस्था पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति की मृणालिनी बताती हैं, "अभी ऐसे लोगों के सामने पैसों की बहुत दिक्कत है, इनके घर बर्बाद हो गए हैं और इनके पास इतने भी पैसे नहीं है कि ये दोबारा अपना घर बनवाने के लिए कुछ खरीद सकें, हम लोग इनके भोजन-पानी की मदद कर रहे हैं, मगर अभी भी इन्हें बहुत मदद की जरूरत है।"

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