आईटी सेक्टर की नौकरियों पर संकट, दूसरे सेक्टर भी बेहाल, जानिए क्या है वजह

Shefali SrivastavaShefali Srivastava   23 Aug 2017 5:49 PM GMT

आईटी सेक्टर की नौकरियों पर संकट, दूसरे सेक्टर भी बेहाल, जानिए क्या है वजहइन दिनों नौकरियों की कमी व आईटी सेक्टर में मंदी के आसार ने सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा कर दिया (फोटो साभार : इंटरनेट)

लखनऊ। देश के प्रधानमंत्री अक्सर अपने भाषणों में मेक इन इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया तमाम योजनाओं समेत रोजगार के साधनों को बढ़ावा देने की बात करते हैं। यही कारण है कि युवाओं में उनको लेकर काफी क्रेज़ भी दिखा है लेकिन इन दिनों नौकरियों की कमी व आईटी सेक्टर में मंदी के आसार ने सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा कर दिया।

सरकारी नौकरियों में वैकेंसी बेहद कम आ रही हैं तो दूसरी प्राइवेट सेक्टर पर नोटबंदी, जीएसटी व ऑटोमेशन का असर। आईटी सेक्टर में ये असर खासतौर पर देखा जा रहा है।

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आईटी सेक्टर वाले असमंजस में

पिछले दिनों विप्रो, इंफोसिस, टेक महिंद्रा समेक कुछ बड़ी कंपनियों में छटनी की बात सामने आई थी। कंपनियां इसके अलग अलग कारण बता रहीं थी लेकिन ऑटोमेशन इसका मुख्य कारण माना जा रहा है।

मालूम हो कि नरेंद्र मोदी और भाजपा के बाकी नेताओं ने आमचुनाव से पहले तत्कालीन केंद्र सरकार पर बेरोजगारी दूर नहीं करने का आरोप लगाते हुए प्रत्येक साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा किया था लेकिन पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी से कई नौकरियां खतरे में आ गईं।

क्या है ऑटोमेशन

नई टेक्नोलॉजी का आना और कंपनियों में ऑटोमेशन या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल छंटनी की खास वजह है। एकेटीयू के प्रोफेसर मनीष गौड़ के मुताबिक टेक्नॉलजी से जुड़े निचले स्तर के काम को अब ऑटोमेशन के जरिए किया जा रहा है। टेस्टिंग और बेसिक कोड जेनेरेशन के लिए सॉफ्टवेयर्स के इस्तेमाल ने इस एरिया में काम कर रहे है इंजीनियर्स की उपयोगिता तकरीबन खत्म कर दी है।

आपको बताते चलें कि पिछले साल अमेरिकी रिसर्च फर्म ने कहा था कि ऑटोमेशन के चलते अगले पांच साल में भारतीय आईटी इंडस्ट्री को लो स्किल वाली 6.4 लाख जॉब्स का लॉस हो सकता है। लो स्किल जॉब्स वह होती हैं, जिनमें एक तय प्रक्रिया को फॉलो किया जाता है और जिसमें ज्यादा एजुकेशनल क्वॉलिफिकेशन की जरूरत नहीं होती है।

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बैंकों में भी आ चुका है ऑटोमेशन

बैंकों में कस्टमर्स की मदद के लिए रोबोट रखने की शुरुआत की जा चुकी है। उदाहरण के लिए सिटी यूनियन बैंक की रोबोट ‘लक्ष्मी’ और एचडीएफसी बैंक की रोबोट ‘इरा’ इसके उदाहरण हैं। जहां पहले ये काम कोई कर्मचारी करता था उसकी जगह अब ये रोबोट काम करते हैं। ये सब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या ऑटोमेशन की ही देन है।

जिन सेक्टरों पर रोबोटिक सिस्टम और मशीन लर्निंग का ज्यादा असर होगा उनमें आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर और फॉरेस्ट्री शामिल हैं। इसका नतीजा ये होगा कि नई नौकरियां उतनी पैदा नहीं हो पाएंगी जितनी जरूरत है। ऐसे में कम कार्यकुशल कर्मचारियों को दूसरे स्किल्स सिखाने की जरूरत होगी।
साल 2017 में जारी एसोचैम और पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट में कहा गया था

यूपी का हाल बेहाल

पिछले दिनों टीसीएस (टाटा कंसेल्टेंसी सर्विसेज) के जब लखनऊ से शिफ्ट होने की बात हुई तो कई कर्मचारियों की चिंताएं बढ़ गई थीं। खासकर शादीशुदा महिला कर्मचारी जिनके पति दूसरे शहरों में काम रहे थे और अब उन्हें भी अपना घर छोड़ शहर बदलने की नौबत आ रही थी। बाहर से लखनऊ आए लोगों ने भी अपनी फैमिली के साथ यहां शिफ्ट होकर फ्लैट ले लिया था जिसकी ईएमआई भी पूरी नहीं हो पाई थी।

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हालांकि टीसीएस सीईओ राजेश गोपीनाथन और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ की पिछले दिनों मीटिंग के बाद ये तय हो गया कि अब टीसीएस लखनऊ से नहीं जाएगा। हालांकि यह फैसला फिलहाल कब तक के लिए सुनिश्चित है यह नहीं कहा जा सकता है। लोगों का कहना है कि थोड़े समय बाद फिर से कंपनी बाहर शिफ्ट हो सकती है।

कई जगह हुई छंटनी

यह हाल सिर्फ टीसीएस का नहीं बल्कि भारत की सनशाइन इंडस्ट्री आईटी इंडस्ट्री में इस समय व्यापक रूप से छंटनी चल रही है। इसकी शुरुआत मार्च-अप्रैल के महीने में हुई जब भारत की प्रतिष्ठित आईटी कंपनियां इंफोसिस और कॉग्नीजेंट ने परफॉर्मेंस और कार्यकुशलता के नाम पर छंटनी शुरू की। किसी ने एक हजार कर्मचारियों को नोटिस दिया तो किसी ने पांच से 10 हजार को।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के सर्वे के अनुसार इस साल अब तक देश में संगठित क्षेत्रों में 15 लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं। देश भर के 1,61,167 परिवारों से बातचीत पर आधारित सीएमआईई के सर्वे के मुताबिक सितंबर-दिसंबर 2016 के बीच देश में कुल नौकरियों की संख्या 40 करोड़ 65 लाख थी, लेकिन नोटबंदी के बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के बीच नौकरियां घटकर 40 करोड़ 50 लाख रह गई हैं।

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छोटे उद्योगों पर ध्यान नहीं देती सरकारें

वहीं विश्लेषक और प्रोफेसरों का मानना है कि जॉब क्रियेशन में गिरावट की वजह खेती और दूसरे लघु उद्योगों पर ध्यान न देकर आईटी और दूसरे सेक्टरों को सर्वेसर्वा बनाना है। शकुंतला मिश्रा यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. अम्बिका प्रसाद तिवारी का घटते रोजगार के बारे में मानना है कि रोजगार कितना विकसित होगा ये इस बात पर निर्भर करेगी कि प्राथमिक व्यवसायों की कितनी तवज्जो दी जा रही है। खेती, मतस्य, वानिकी और फूड प्रॉसेसिंग, कृषि प्रस्सकरण उद्योग में टिकाऊ विकास जब तक नहीं होगा तब तक औद्योगिक विकास में दिक्कत आएगी। हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में भी अर्थव्यवस्था पर ज्यादा जोर दिया गया लेकिन उसके लिए जरूरी रोजगार पर बात नहीं हुई।

अमेरिका और यूरोप में सरंक्षणवाद भी है भारतीय नौकरियों के खात्मे की वजह

लगातार बढ़ते बेरोजगारी के बारे में एकेटीयू के सेंटर फॉर एडवांस स्टडी के डायरेक्टर मनीष गौड़ कहते हैं, ‘आईटी सेक्टर वो सेक्टर है जो ज्यादातर विदेश के कॉन्ट्रैक्ट और ऑर्डर पर आधारित था। इसी के साथ ज्यादातर कंपनियां अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के लिए आउटसोर्सिंग का काम करती है लेकिन इस समय इन कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्सिंग में कमी आई है। वजह अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में आर्थिक दर पहले से ही कम है इसलिए वे अब सरंक्षणवाद और स्थानीय लोगों को नौकरी देने की नीति पर काम कर रही है।’

पारंपरिक उद्योग खत्म हो रहे हैं

प्रोफेसर अम्बिका प्रसाद बताते हैं, ‘बड़े उद्योगों में श्रम की तुलना में पूंजी अधिक प्रयोग होता है, जो बेरोजगारी का बड़ा कारण है। वहीं छोटे उद्योग धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। परिणाम अर्थव्यवस्था में जॉबलेस ग्रोथ हुई जबकि अभी भी कुटीर और मझोले उद्योग चाहे वो कालीन उद्योग हो, बरेली का फर्नीचर, फिरोजाबाद का बैंगल कटिंग, मुरादाबाद के पारंपरिक पीतल कारोबार में हमारा विदेशों में भी कोई मुकाबला नहीं है लेकिन कभी नोटबंदी तो कभी जीएसटी के कारण इन छोटे व्यवसायों पर असर पड़ रहा है।’

सर्विस सेक्टर में भी वॉइट कॉलर जॉब्स में गिरावट

पिछले दिनों टाटा मोटर्स ने 1500 कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा कर दी थी। कंपनी का कहना है कि यह कदम कंपनी की कार्यकुशलता बढ़ाने तथा इसके खर्चों को कम करने के लिए किया गया है। इस घोषणा के साथ ही टाटा मोटर्स में वाइट कॉलर जॉब्स में से 10 प्रतिशत नौकरियां चली गयी हैं । टाटा मोटर्स के 1500 छंटनियों से पहले जीएम मोटर्स के भारत से जाने पर भी 7000 नौकरियों का नुकसान देश को हो चुका है। इससे पहले एलएंडटी ने 14000 लोगों को नौकरी से निकाला है जबकि एचडीएफसी बैंक ने 10,000 लोगों को निकालने की घोषणा की है। भारत के आईटी सेक्टर में भी अगले 3 साल तक हर साल 2 लाख नौकरियों के जाने का खतरा है।

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