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आम बजट 2021 से महिलाओं, बच्चों और आदिवासी समुदाय को क्या मिला? आवंटित बजट पर क्या कहते हैं जानकार?

आम बजट 2021 पर हर वर्ग और समुदाय की नजर थी। यह बजट इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि देश पिछले साल से एक बड़ी महामारी से होकर गुजर रहा है। इस महामारी से महिलाएं, बच्चे और वंचित समुदायों के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वित्त वर्ष 2021-2022 के बजट से महिलाओं, बच्चों और आदिवासी समुदाय को क्या मिला? गाँव कैफे की लाइव चर्चा में एक्सपर्ट्स ने क्या कहा? पढ़िए खबर ...

Neetu SinghNeetu Singh   7 Feb 2021 7:55 AM GMT

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए वित्त वर्ष 2021-22 में 24,435 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। यह राशि संशोधित अनुमानों की तुलना में 16% अधिक है लेकिन पिछले साल की बजट घोषणाओं की तुलना में ये 18.5% कम है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय के बजट में मामूली बढ़ोत्तरी कर 7,524.87 करोड़ रुपए आवंटित किया गया है।

गाँव कनेक्शन के विशेष शो गाँव कैफ़े में पांच फरवरी को अलग-अलग राज्यों में महिलाओं, बच्चों और आदिवासी समुदाय के मुद्दों पर काम करने वाले कुछ जानकारों के साथ इस वर्ष के बजट पर महत्वपूर्ण चर्चा की गई।

चर्चा में शामिल पब्लिक हेल्थ सर्विस, दिल्ली से जुड़ीं डॉ वंदना प्रसाद कहती हैं, "हर जगह चर्चा है कि स्वास्थ्य बजट में 137% की बढ़ोत्तरी हुई है जो कि गलत है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष स्वास्थ्य बजट में केवल 10% बढ़ोत्तरी हुई है। जो 137% कहा जा रहा है उसमें वाटर एंड सेनिटेशन, कोविड वैक्सीन सभी को एक में शामिल करके बताया जा रहा है। इस पेंडमिक (महामारी) में स्वास्थ्य बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा लग रहा था लेकिन बजट में वो देखने को नहीं मिला।"

महिला एवं बाल विकास विभाग के बजट में इस वर्ष हुई कटौती. फोटो : नीतू सिंह

डॉ वंदना आगे कहती हैं, "जीडीपी का केवल एक प्रतिशत ही स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है जो कि पर्याप्त नहीं है। जब तक (ये बजट) जीडीपी का दो-ढाई प्रतिशत तक नहीं पहुँचेगा तब तक हालात सुधरने वाले नहीं हैं। गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण योजना प्रधानमंत्री मातृ वंदना समेत तीन-चार और ज़रुरी योजनाओं को मिलाकर एक नया नाम 'सामर्थ्य' दे दिया गया है जिसमें बजट एक योजना का ही आवंटित हुआ है बाकी की योजनाओं पर खर्च करने के लिए बजट कहाँ से आएगा? गर्भवती महिलाओं, बच्चों के पोषण और किशोरियों के लिए चलने वाली एक मात्र अहम कड़ी आंगनबाड़ी (के बजट) को इस बार पोषण अभियान में शामिल कर दिया।"

वित्त वर्ष 2020-21 में आंगनबाड़ी सेवाओं के लिए 20,532.38 करोड़ रुपए का बजट दिया गया था। इस बार अंब्रेला आंगनवाड़ी सेवाएं, पोषण अभियान, किशोरियों के लिए योजना और राष्ट्रीय क्रेच योजना को मिलाकर कुल 20,105 करोड़ रुपए आवंटित किए गये हैं जो काफी कम है।

पिछले वित्त वर्ष 2020-2021 में प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के बजट में 2,500 करोड़ रुपए आवंटित किये गये थे जिसे बाद में संशोधित करके 1,300 करोड़ कर दिया था। यह बजट ऐसे समय में कम किया गया था जब गर्भवती महिलाओं को सबसे ज्यादा इसकी जरुरत थी। इस वर्ष प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, कौशल कार्यक्रम, क्रेच, जेंडर बजट सबको एक साथ मिलाकर एक नया नाम, 'सामर्थ्य' दे दिया गया है जिसे 2021-2022 के लिए कुल 2,522 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं जिसमें यह स्पष्ट नहीं है कि किस अभियान पर कितना पैसा खर्च किया जाएगा?

इस बजट से हर किसी को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन वित्तीय वर्ष 2021 में विशेष आवंटन न होने की वजह से हर वर्ग को निराशा हुई.

फ़रवरी 2020 को पेश बजट में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को 30,007.10 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था। लेकिन संशोधित अनुमानों में इस बजट में लगभग 30% की कटौती कर 21,008.31 करोड़ रुपए कर दिया गया था। वो भी तब जब देश में कोरोनावायरस महामारी अपने चरम पर थी, जब महिलाओं और बच्चों को सरकारी मदद की ज़्यादा ज़रूरत थी।

गाँव कैफ़े में छत्तीसगढ़ से जुड़ीं डॉ मनजीत कौर बाल लंबे समय से आदिवासी समुदाय के साथ काम करती हैं। डॉ मनजीत कहती हैं, "आदिवासी समुदाय को बजट में क्या चाहिए ये आवाज़ वहां तक पहुँचती ही नहीं। बजट में हम हर घर नल योजना की बात कर रहे हैं पर आदिवासी क्षेत्रों में तीन-चार किलोमीटर तक पानी ही नहीं है, आज भी लोग झीरिया का पानी पी रहे हैं उनके लिए कोई बात नहीं हुई।"

"पीवीटीजी समुदाय के 95% बच्चे अभी आंगनबाड़ी की पहुंच से दूर हैं इन क्षेत्रों में आंगनबाड़ी बनने का कोई जिक्र ही नहीं। इनके वनोत्पाद को लेकर कोई जिक्र नहीं। हम 750 नए एक्लव्य स्कूल बनाने की बात कर रहे हैं पर जो बने हैं उनकी स्थिति ही ठीक नहीं है। इस बजट में पोस्ट स्कॉलरशिप की बात कर रहे हैं पर प्राइमरी शिक्षा ही इन क्षेत्रों में नहीं पहुंच पा रही है तो ये बच्चे पोस्ट स्कॉलरशिप का कैसे लाभ ले पायेंगे?" मनजीत कौर ने कहा।

सरकार की महत्वपूर्ण योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ में अलग से बजट न देकर दूसरी योजनाओं में मर्ज कर दिया गया.

वित्त वर्ष 2021-22 में जन-जातीय मामलों के मंत्रालय के लिए बजट 7,524.87 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गयी है। वित्त वर्ष 2020-21 में यह आवंटन 7,411.00 करोड़ रुपए हुआ था जिसे बाद में संशोधित करके 5,508 करोड़ रुपए कर दिया गया था। इसके अलावा अनुसूचित जाति के 4 करोड़ विद्यार्थियों के लिए 35 हजार करोड़ रुपए का ऐलान किया गया है। आदिवासी बच्चों के लिए पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप जारी रहेगी। इसके लिए वित्तीय मदद बढ़ाई गई है। अगले 6 साल के लिए 35,219 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। जिससे देश के अनुसूचित जाति के करीब 4 करोड़ स्टूडेंट्स को 10वीं के बाद शिक्षा जारी रखने में मदद मिलेगी।

चर्चा में शामिल दिल्ली से जुड़े जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. जावेद आलम खां ने कहा, "आम जन मानस की जरुरतें पॉलिसी मेकर तक पहुंच नहीं पा रही हैं। जहाँ बजट की सबसे ज्यादा जरुरत है उसी में कटौती हुई है। जबसे प्लानिंग कमीशन ख़त्म हुई है तबसे बजट में और ज्यादा चैलेंजेज़ देखने को मिल रहे हैं। आदिवासी समुदाय की जरुरत क्या है हम उनके वास्तविक मुद्दे को रिफ्लेक्ट ही नहीं कर पा रहे। बजट कॉमन मैन के इंटरेस्ट में नहीं है। बजट प्लानिंग से लेकर क्रियान्वयन तक एक बहुत बड़ा गैप है, रिसोर्सेज़ की कमी है, इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, यही वजह है कि आवंटित बजट भी विभाग खर्च नहीं कर पाता और उसे संशोधित करके कम कर दिया जाता है।"

बच्चों और जेंडर के मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रही मध्य प्रदेश की संस्था, 'विकास संवाद' से जुड़े राकेश कुमार मालवीय ने राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की वर्ष 2019 की रिपोर्ट जिक्र करते हुए कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराध के दर्ज मामलों की संख्या 148,185 है और लंबित मामले 346, 975 हैं। इन बढ़ते आंकड़ों के बावजूद बाल संरक्षण के लिए जारी बजट में इस वर्ष 40% की कटौती की गयी है।


बाल संरक्षण के लिए वित्त वर्ष 2020-21 में जो बजट 1,500 करोड़ रुपए था उसे इस वर्ष घटाकर 900 करोड़ रुपए कर दिया गया। इस वर्ष इसका नाम बदलकर 'मिशन वात्सल्य' कर दिया गया है।

राकेश मालवीय कहते हैं, "मैंने बजट का पूरा भाषण सुना बहुत निराशा हुई कि बच्चों का जिक्र वित्तमंत्री ने तीन बार लिया वो भी अलग-अलग संदर्भ में। देश में बच्चों की स्थिति एक संवेदनशील मुद्दा हैं पर अलग से इनके लिए कुछ सोचने की बजाए जो पहले से था उसमें ही कमी कर दी गई।"

उत्तर प्रदेश से जुड़ी राष्ट्रीय जन आंदोलनों की राष्ट्रीय समन्यवक अरुंधती धुरु महिला सुरक्षा पर बात करते हुए कहती हैं, "इस कोविड काल की ही बात करें तो महिलाओं के प्रति हिंसा तीन गुना बढ़ गई है जो मामले पहले 100 आते थे अब वो 300 हो गये हैं ये एक गंभीर चिंता का विषय है। बड़ी संख्या में महिलाओं को नौकरी से निकाला गया। बजट में इनके कैपिसिटी बिल्डिंग को लेकर कोई बात नहीं है, बजट में हम इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बात कर रहे हैं पर उसके क्रियान्वयन पर कोई बात नहीं है। बजट से आप अंदाजा लगाइए कि सरकार महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा और सम्मान के लिए कितनी ईमानदार है।"

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