रेप-मैरिटल रेप, सड़क से लेकर संसद तक इसकी चर्चा है, जानिए क्या है इस पर विवाद

रेप-मैरिटल रेप, सड़क से लेकर संसद तक इसकी चर्चा है, जानिए क्या है इस पर विवादमैरिटल रेप पर हमारे कानून में विरोधाभास है

लखनऊ। दिल्ली हाईकोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने के लिए याचिका दायर की गई थी जिस पर बहस जारी है। हालांकि इस बीच केंद्र सरकार ने इस पर सफाई देते हुए कहा है कि इसको अपराध मानने से विवाह संस्था खतरे पर पड़ सकती है। इसके बाद ये विवाद और भी बढ़ गया है। हम आपको बता रहे हैं कि मैरिटल रेप और रेप के बारे में हमारा कानून क्या कहता है-

आईपीसी की धारा 375 के मुताबिक कोई व्यक्ति अगर किसी महिला के साथ अगर इन छह परिस्थितियों में शारीरिक संबंध बनाता है तो इसे बलात्कार माना जाएगा।

  • महिला की इच्छा के विरुद्ध
  • महिला की मर्जी के बिना
  • महिला की मर्जी से, लेकिन ये सहमति उसे मौत या नुक़सान पहुंचाने या उसके किसी करीबी व्यक्ति के साथ ऐसा करने का डर दिखाकर हासिल की गई हो
  • महिला की सहमति से, लेकिन महिला ने ये सहमति उस व्यक्ति की ब्याहता होने के भ्रम में दी हो
  • महिला की मर्जी से, लेकिन ये सहमति देते वक्त महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं हो या फिर उस पर किसी नशीले पदार्थ का प्रभाव हो और लड़की सहमति देने के नतीजों को समझने की स्थिति में न हो
  • महिला की उम्र अगर 16 साल से कम हो तो उसकी मर्जी से या उसकी सहमति के बिना किया गया सेक्स
  • अपवाद- पत्नी की उम्र अगर 15 साल से अधिक है तो पति का उसके साथ सेक्स करना बलात्कार नहीं है

वैवाहिक बलात्कार

पत्नी की मर्ज़ी के बिना पति द्वारा उसके साथ जबरन बनाए गए संबंध को वैवाहिक बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता है, हालांकि हमारा कानून इसे रेप नहीं मानता। संविधान की धारा 376 जिसमें बलात्कार की सजा का प्रावधान है उसके अनुसार 12 साल से ज्यादा उम्र की पत्नी के साथ बिना मर्जी के संबंध बनाने पर पति को जुर्माना या उसे दो साल तक की कैद या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं।

वहीं 375 में दिए गए तथ्यों के अनुसार अपराधी को न्यूनतम सात साल और अधिकतम 10 साल की कड़ी सजा दिए जाने का प्रावधान है।

कानून में विरोधाभास

दरअसल हमारे कानून में ही बलात्कार और वैवाहिक बलात्कार को लेकर विरोधाभास है। आर्टिकल 375 जो बलात्कार की स्थिति को बयां करता है उसमें पत्नी के लिए विरोधाभास यह है कि 15 साल से ऊपर की नाबालिग पत्नी की मर्जी का कोई मतलब नहीं है। वहीं अगर वह लड़की कुंआरी है और उसकी मर्जी भी है, तो भी उसके साथ संबंध बलात्कार है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट कहती है, जिसके मुताबिक भारत में हर वर्ष शादीशुदा बलात्कार के करीब 75 फीसदी मामले होते हैं। तब यूएन ने भारत को मैरिटल रेप को क्रिमिनल कैटिगरी में शामिल किए जाने की सलाह भी दी थी। 2015 में मैरिटल रेप के मामले में राज्यसभा में एक सांसद द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक देश के पांच में से एक पुरुष अपनी पत्नी को जबरन संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं और देश में कुल रेप में से करीब 9-15 फीसदी मैरिटल रेप के कारण होते हैं।

2013 में दायर की गई थी याचिका

2013 में जस्टिस जे एस वर्मा की अगुवाई वाली कमेटी ने जोर-शोर से आपराधिक कानून में बदलाव की वकालत की थी। जस्टिस वर्मा कमेटी ने कहा था कि भारतीय दंड संहिता या आईपीसी की धारा 375 में शादीशुदा जिंदगी में यौन अपराध को जो छूट दी गई है, उसे खत्म किया जाना चाहिए। जस्टिस वर्मा ने कानून में बदलाव के लिए संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र से लेकर कई देशों के कानून का हवाला दिया था लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र के हलफनामे से साफ है कि सरकार, जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों से इत्तेफाक नहीं रखती।

किन-किन देशों में वैवाहिक बलात्कार जुर्म है

इसके बरक्स कई देशों जैसे दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और वेल्स, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में दांपत्य जीवन में जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने को बलात्कार का जुर्म माना गया है। संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं से भेदभाव के खात्मे के लिए बनी कमेटी और 1993 का महिलाओं पर जुल्म के खात्मे का घोषणापत्र शादीशुदा जिंदगी में जबरदस्ती को बलात्कार मानता है। यूरोपीय यूनियन का मानवाधिकार आयोग भी वैवाहिक जीवन में महिला की रजामंदी के बगैर सेक्स को अपराध मानता है।

मैरिटल रेप पर लोगों का सोशल मीडिया पर रियेक्शन

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