एहसान फरामोश: कमाई कराने वाली गाय-भैंस के शवों की दुर्गति का जिम्मेदार कौन?

सड़क पर मरे पड़े शव न सिर्फ बदबू और बीमारियां फैलाते हैं। बल्कि ये उदासीनता भी है उस इंसान की जो उसे पालता है और उस सरकारी तंत्र की जो इन पशुओं की खाल और हड्डी से कमाई करता है। पशुओं के शवों के साथ होने वाली इस घोर लापरवाही पर गांव कनेक्शन की विशेष सीरीज- जानवर से बद्तर का भाग-1

Diti BajpaiDiti Bajpai   10 Nov 2018 6:58 AM GMT

एहसान फरामोश: कमाई कराने वाली गाय-भैंस के शवों की दुर्गति का जिम्मेदार कौन?

लखनऊ। सड़कों पर, नहर के किनारे और गांवों के बहुत नजदीक गाय-भैंस के शवों को आपने कई बार देखा होगा। यह वहीं पशु है जिनका दूध और उससे बने उत्पाद हम सभी खाते हैं, इन गाय भैंसों और दूसरे पशुओं की बदलौत लाखों लोगों की रोजी-रोटी चलती है। लेकिन मरने के बाद इनके बाद इनके शवों को सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, जिससे कई बीमारियां फैलती हैं, पर्यावरण को नुकसान होता है।

मृत पशु के शरीर का क्या करते हैं? गांव कनेक्शन ने ये सवाल कई राज्यों में दर्जनों लोगों से पूछा। सबका जवाब लगभग एक सा था, फेंकवा देते हैं। उत्तर प्रदेश के गोड़ा जिले के हरेंद्रा शुक्ल गांव में रहने वाले रामकुमार वर्मा (40 वर्ष) पिछले कई वर्षों से डेयरी चला रहे हैं। रामकुमार बताते हैं, ''गाँव में किसी का जानवर मरता है तो विशेष जाति के लोगों को बुलाते हैं वो उसका चमड़ा निकाल कर उसे सड़क के किनारे या नहर के आस-पास फेंक देते हैं। यह लोग बड़े पशुओं का 500 रूपए और छोटे पशुओं का 200 रूपए लेते है। ऐसा आज से नहीं वर्षों से हो रहा है।'' खुले में फेंके जाने वाले यही शव अब पर्यावरण के लिए खतरा बन रहे हैं।

"खाल निकालकर जहां खाली जगह मिलती है वहां छोड़ देते हैं। कुत्ते-सियार शव खा जाते हैं।" शव गाड़ने के सवाल पर वो अपना तर्क देते हैं, शहर में तो जगह ही नहीं है। गांव में भी लोग कहते हैं मेरे खेत में ना डालो तो सड़क किनारे छोड़ना पड़ता है।' गुुड्डू, ठेका कर्मचारी

पशु वैज्ञानिक डॉ आनंद सिंह बताते हैं, ''मरने के 24 घंटे के बाद ही पशु का शरीर पर्यावरण को दूषित करना शुरु कर देता है। साथ ही इंसानों में होने वाली कई बीमारियों का कारण बनता है। शव ऐसे ही पड़ा रहता है तो इलाके में हेपेटाइटिस बी सी, टीबी, कालरा, टाइफाइड जैसी कई बीमारियां फैलने का खतरा रहता है।" आज के 2 से 3 दशक पहले तक पशुओं के शव गिद्धों का मुख्य आहार हुआ करते थे, वो सड़ने से पहले ही शव को खा जाते थे। लेकिन अब गिद्ध नहीं रहे।"

मशूहर पक्षीविद डाक्टर सालिम अली ने अपनी पुस्तक इंडियन बर्ड्स में गिद्धों का वर्णन करते हुए लिखा कि गिद्धों का एक दल एक मरे हुए सांड को केवल 30 मिनट में ही साफ कर सकता है। सिर्फ सफाई ही नहीं बल्कि गिद्धों की संख्या में तेजी से हो रही कमी पर्यावरण की खाद्य कड़ी के लिए भी खतरा है।"

मनुष्य सिर्फ अपना स्वार्थ देखता है। उसे किसी जीव से मतलब नहीं। उनका पशुओं से प्रेम तभी तक है जब तक वो जिंदा है, उनके काम आ रहा है।" पशुप्रेमी अखिलेश अवस्थी

बुंदेलखंड के बांदा जिले में एक सड़क किनारे मृत पड़ा पशु का शव। छुट्टा गायों की समस्या से जूझ रहे बुंदेलखंड में अक्सर ऐसे नजारे दिखते हैं। फोटो- गांव कनेक्शनबुंदेलखंड के बांदा जिले में एक सड़क किनारे मृत पड़ा पशु का शव। छुट्टा गायों की समस्या से जूझ रहे बुंदेलखंड में अक्सर ऐसे नजारे दिखते हैं। फोटो- गांव कनेक्शन



देश में करीब 7 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया डेयरियां यानि गाय-भैंस हैं। दुग्ध और मांस उत्पादन के अलावा कई पशु खेती बाड़ी और दूसरे कामों में काम आते हैं। पिछले तीन वर्षों से 176.35 मिलियन टन उत्पादन के साथ भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना हुआ है। देश में हर छह साल में पशुधन गणना की जाती हैं पिछली पशुगणना 2012 में की गई थी, जिसके मुताबिक देश में गाय और भैंस (दूध देने वाले और दूध न देने वाले) पशुओं की संख्या 118.59 मिलियन है। इनमें से हर रोज कई लाख जानवरों की मौत होती होगी, हालांकि इसका आंकड़ा विभागों के पास नहीं है। पशु शव निस्तारण की समस्या के लिए पशुप्रेमी और जानकार पशुपालन विभाग और मनुष्य को जिम्मेदार मानते हैं।

"मनुष्य सिर्फ अपना स्वार्थ देखता है। उसे किसी जीव से मतलब नहीं। उनका पशुओं से प्रेम तभी तक है जब तक वो जिंदा है, उनके काम आ रहा है।" यूपी के उन्नाव में बीमार और लाचार गायों और दूसरे जीव-जंतुओं के लिए आस्रम चलाने वाले पशुप्रेमी अखिलेश अवस्थी बताते हैं।

पशु शव निस्तारण की समस्या को प्राकृतिक से छेड़खानी का परिणाम बताते हुए अखिलेश अवस्थी कहते हैं, "जीव जीवस्य भोजनम, यानि जीव जीव का भोजन होते हैं। पहले हर गांव के बाहर एक जगह होती थी, जहां मरे हुए पशुओं को छोड़ा जाता था, खाल निकालने वाले खाल निकाल ले जाते थे। उसके बाद गिद्ध, कौए और कुत्ते शव को कुछ ही घंटों में चट कर जाते थे। लेकिन गिद्ध तो बचे नहीं,कौए भी कम हुए हैं, तो वो शव वहीं कई दिनों तक पड़ा रहता है।"

उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में शव निस्तारण की जिम्मेदारी ग्रामीण इलाकों में ग्राम पंचायत और शहरी इलाकों में नगर निगम की है। इसके लिए बाकायदा टेंडर जारी हैं। टेंडरधारक हर न्याय पंचायत में अपने कर्मचारी नियुक्त करता है।

उत्तर प्रदेश के पशुपालन विभाग में पीवीएस एसोसिशएन के अध्यक्ष डॉ. राकेश शुक्ला बताते हैं, "पशुओं के शव को खुले में छोड़ना गंभीर लापरवाही है। शव निस्तारण के लिए टेंडर जारी होंते हैं। नियमत शव उठाकर उसका जमीन में 8 फीट गड्ढा खोदकर दफनाना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में ग्राम प्रधान के माध्यम से ठेकेदार को सूचना देनी होती है। जबकि नगरीय इलाकों में स्वास्थ्य अधिकारी नोडल अधिकारी होता है।"

देश में चमड़ा उद्योग के संगठन काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट्स (सीएलई) की छह अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक भारत हर साल 573 करोड़ का चमड़ा निर्यात करता है, जिसे 2024-15 तक दोगुना करना है। इस निर्यात का एक बड़ा हिस्सा भी ऐसे ही पशुओं से आता है।

बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिक डॉ.रनवीर बताते हैं, "ये मरे पशु भी बहुत काम के होते हैं, इनकी खाल तो महंगी बिकती ही है, हड्डियां भी बोन मिल में जाती हैं। पशुओं की वसा की कास्मेटिक उद्योग में काफी मांग है। इन सबसे देश को हर साल करोड़ों रुपए मिलते हैं। सरकार की तरफ से पशु शव के सही डिस्पोजल (निस्तारण) का नियम है। लेकिन स्थानीय कर्मचारियों और किसानों में जागरुकता न होने से ये समस्या है।'

डॉ. राकेश शुक्ला आगे बताते हैं, "स्वच्छ भारत मिशन में भी इसे शामिल किया गया है। दूसरा 14वें वित्त आयोग में इसकी व्यवस्था की गई है। दूसरा प्रधान चाहे तो मनरेगा के तहत भी पशुओं के शव के लिए गड्डे खुदवा सकता है।' लेकिन जमीन पर हालात अलग हैं।

"मरे पशु भी बहुत काम के होते हैं, इनकी खाल तो महंगी बिकती ही है, हड्डियां भी बोन मिल में जाती हैं। इन सबसे देश को हर साल करोड़ों रुपए मिलते हैं। सरकार की तरफ से पशु शव के सही डिस्पोजल (निस्तारण) का नियम है। लेकिन स्थानीय कर्मचारियों और किसानों में जागरुकता न होने से ये समस्या है।'

लखनऊ शहर में ऐसे ही एक टेंडर धारक गुड्डू फोन पर गांव कनेक्शन को बताते हैं, "दलितों की सोसायटी को शव उठाने का ठेका मिलता है। इस काम को सिर्फ दलित ही कर सकते हैं। हमारी आमदनी हड्डी और खाल बेचकर होती है। सरकार से हमें कोई पैसा नहीं मिलता है। बल्कि कई जगहों पर हमारे जैसे लोगों को जिला पंचायत या नगर निगम तक में पैसे (घूस) तक देनी पड़ जाती है।'

शव का निस्तारण कैसे करते हैं, इस सवाल के जवाब गुड्डू कहते हैं, "खाल निकालकर जहां खाली जगह मिलती है वहां छोड़ देते हैं। कुत्ते-सियार शव खा जाते हैं।" शव गाड़ने के सवाल पर वो अपना तर्क देते हैं, शहर में तो जगह ही नहीं है। गांव में भी लोग कहते हैं मेरे खेत में ना डालो तो सड़क किनारे छोड़ना पड़ता है।'

ये भी पढ़ें- अगर गिद्ध खत्म हुए तो खतरे में पड़ जाएगी सबकी सेहत

गिद्धों को पर्यावरण का सफाई कर्मचारी कहा जाता था, गिद्दों की संख्या कम होने के बाद मरे हुए पशुओं के शवों की समस्या बढ़ी है।गिद्धों को पर्यावरण का सफाई कर्मचारी कहा जाता था, गिद्दों की संख्या कम होने के बाद मरे हुए पशुओं के शवों की समस्या बढ़ी है।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के तीर्थस्थल देवां में मुख्य सड़क पर एक घोड़े की मौत हो गई। उसका शव कई दिनों तक सड़क पर पड़ा रहा। सड़क पर चलने वाले लोग नाक बंद कर निकलते, कई लोग हादसों का शिकार होते-होते बचे।

बनारस स्थित पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र में पर्यावरणविद् प्रोफेसर बी.डी त्रिपाठी ने बताया, ''मरे हुए जानवरों में बैक्टीरिया बढ़ने से सडन और बदबू आती है। ये बैक्टियां हवा मक्खियों के माध्यम से इंसानों तक पहुंत कर बीमारियां देते हैं। इसलिए किसानों को चाहिए वो पशु शवों का सही से निस्तारण करें। अगर पशुओं को जला सकें तो ठीक दफना देना चाहिए। पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार को शवदाह गृह बनवाने चाहिए। क्योंकि इससे जो वातावरण प्रदूषित होता है उसको काफी हद तक रोका जा सकता है।''

शवों को खुले में न छोड़े इसके लिए मुंबई में बृहन्मुंबई महानगर पालिका ने पालतू पशुओं के शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए हाल ही में तीन शवदाह गृहों की स्थापना की है। इसके साथ ही मृत पशुओं के निस्तारण बिहार और गुरुग्राम में भी पशु शवदाह गृह तैयार किए गए हैं। पटना नगर निगम के बैरिया स्थित कूड़ा डंपिंग यार्ड के एक हिस्से में अत्याधुनिक पशु शवदाह बनाया गया है जहां पर रोजाना मृत पशुओं का निस्तारण किया जा रहा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों तक ये पशु शवदाह कब बनेंगे कहना मुश्किल है। बाराबंकी जिले के सलेमाबाद गाँव में रहने वाले बराती गौतम बताते हैं, "मरे हुए जानवर को फेंकना ही पड़ता है गाँव के आस-पास कोई जमीन नहीं होती है कि जानवर को दफना दें।"

पशु शव निस्तारण के जलाने या दफनाने के तरीके पर उन्नाव के प्रशु प्रेमी अखिलेश अवस्थी कहते हैं, "ये समस्या सिर्फ पैसों से नहीं खत्म होगी। आज पैसे देकर आप पशुओं का शव मिट्टी में दबवा सकते हैं, 20 साल बाद क्या होगा? जब तक पशु से आत्मिक लगाव नहीं होगा, काम नहीं चलेगा। पशुओं को किसान अपने परिवार का हिस्सा मानता है उसे ही उनके शव को निपटान में आगे आना होगा।'

जहां एक तरफ पशु के अनुपयोगी या मृत होने पर पशुपालक सड़कों गाय-भैंसों को फेंक देते हैं वहीं दूसरी ओर बहुत सारे किसान और पर्यावरण प्रेमी इनका पशु देह का सदुपयोग कर रहे हैं। यूपी के पीलीभीत में कृषि वैज्ञानिक औतार मौर्य मृत गाय की देह से खाद बनाते हैं। उनके मुताबिक एक गाय की खाद से कई एकड़ की अच्छी खाद बन जाती है।

मृत गाय की देह से खाद बनाने की विधि और उपयोग के बारे में राम औतार बताते हैं, ''पिछले वर्ष मेरी एक गाय मर गई थी। मैंने 4 फीट गहरा गड्ढा खोदकर गड्ढा की निचली सतह पर 4 कुंटल गोबर की परत बिछाई और गाय को उस पर लिटा दिया। गड्ढे के किनारों पर चारों तरफ करीब 25 किलो नमक डाला। नमक डालने के उपरांत करीब दो कुंटल गोबर गड्ढे के किनारों पर डाल दिया।''

वो आगे बताते हैं, "इसके बाद गाय के ऊपरी हिस्से पर 10-15 किलो नमक डालकर गड्ढे को पाठ दिया। गाय दबाने के ठीक एक वर्ष बाद मैंने गड्ढे को खोला तो उसमें से सींग, सर, खुर और रीढ़ की हड्डी बाहर निकाल ली। बाकी बची हुई खाद जो मृत गाय से तैयार की गई थी। उसको निकालकर उसको छानकर बोरो में भर लिया।'' मौर्य ने बताया, "उनसे यह पूछने पर कि गड्ढे में कितनी खाद बनकर तैयार हो जाती है तो उन्होंने यह बताया कि "गाय के वजन के अनुसार लगभग एक गड्ढे में 5-6 कुंटल खाद तैयार हो जाती है। जो लगभग 7 एकड़ जमीन में बोई जाने वाली फसल में खाद के रुप में इस्तेमाल की जा सकती है।''

जैविक खाद बनाने के बारे में पीलीभीत जिले के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर जीपी सिंह ने बताया, ''यह स्वभाविक है मृत पशु के शरीर को गोबर और नमक के साथ जमीन में बने गड्ढे में दबाने से जो खाद बनेगी। वह अच्छी गुणवत्ता रखता होगा क्योंकि मृत पशु के शरीर मांस, खाल आदि सड़ने से जीवाशम पैदा होते हैं जो उच्च कोटि की जैविक खाद बनाने में सहायक होते हैं।''

मौर्य पिछले कई वर्षों से जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं। मृत गाय के शरीर से तैयार जैविक खाद की गुणवत्ता के बारे में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एसके ढाका बताते हैं, ''मृत पशु के शरीर के सड़ने से जो बैक्टीरिया पैदा होते हैं वह गोबर के साथ कंपोजिंग करके एक उच्च कोटि की जैविक खाद तैयार करते हैं। इस खाद का फसलों में प्रयोग करने से भूमि में कितनी उर्वरा शक्ति की पूर्ति होती है।''

मृत गायों से बनी खाद के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए मौर्या बताते हैं, ''मृत गाय के शरीर से बनाई गई खाद द्वारा भूमि में सभी आवश्यक तत्व जैसे- नाइट्रोजन, फास्फोरस, बोरान, कॉपर मैंगनीज़ आदि अनेक तत्व भरपूर मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं। इस खाद के प्रयोग करने के बाद खेत में किसी अतिरिक्त अन्य खाद का प्रयोग नहीं करना पड़ता। क्योंकि यह पूर्णता जैविक होती है।'

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