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जब फसल की लागत हर प्रदेश में अलग-अलग, तो एमएसपी पूरे देश में एक क्यों ?

कृषि लागत और मूल्य आयोग की ही रिपोर्ट के अनुसार किसी एक फसल की लागत हर राज्यों में अलग-अलग आती है। ऐसे में सवाल यह है कि जब लागत अलग-अलग है तो न्यूनतम समर्थन मूल्य पूरे देश के लिए एक क्यों है, क्या इस नीति को अब बदलने की जरूरत है ?

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   23 Jan 2020 6:30 AM GMT

जब फसल की लागत हर प्रदेश में अलग-अलग, तो एमएसपी पूरे देश में एक क्यों ?

आंध्र प्रदेश में एक हेक्टेयर की धान की खेती में कुल खर्च आता है 80,303 रुपए। उत्तर प्रदेश में इतने ही क्षेत्र में धान की खेती में 58,429 और पंजाब में 76,079 रुपए का खर्च बैठता है। कृषि लागत और मूल्य आयोग की रिपोर्ट देखेंगे तो धान ही नहीं, देश के हर प्रदेश में एक फसल की लागत अलग-अलग आती है। फिर ऐसे में सवाल यह है कि जब लागत अलग-अलग है तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) एक कैसे हो सकता है?

किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू की गई है। अगर कभी फसलों की कीमत गिर जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है। इसके जरिये सरकार उनका नुकसान कम करने की कोश‍िश करती है। किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है और इसके तहत अभी 23 फसलों की खरीद की जा रही है।

कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP-सीएसीपी) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय की जाती है। वर्ष 2009 से आयोग एमएसपी के निर्धारण में लागत, मांग, आपूर्ति की स्थिति, मूल्यों में परिवर्तन, मंडी मूल्यों का रुख, अलग-अलग लागत और अन्तराष्ट्रीय बाजार के मूल्यों के आधार पर किसी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता है। कृषि मंत्रालय यह भी कहता है कि खेती के उत्पादन लागत के निर्धारण में नकदी खर्च ही नहीं बल्कि खेत और परिवार के श्रम का खर्च (बाजार के अनुसार) भी शामिल होता है, मतलब खेतिहर मजदूरी दर की लागत का ख्याल भी एमएसपी तय करने समय रखा जाता है।

धान के अलावा मक्के को भी उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं। वर्ष 2016-17 में कर्नाटक के किसानों ने जब एक हेक्टेयर में मक्के की खेती की तो उनका कुल खर्च 28,220 रुपए आया जबकि बिहार के किसानों का इतने ही क्षेत्र में खेती के लिए 32,262 रुपए, झारखंड के किसानों का 24,716 और महाराष्ट्र के किसानों का 51,408 रुपए खर्च हुआ, जबकि मक्के पर केंद्र सरकार ने 1760 रुपए एमएसपी देती है।


कृषि लागत और मूल्य आयोग के अनुसार देश में वर्ष 2017-18 के दौरान एक हेक्टेयर में औसतन 33 कुंतल मक्के की पैदावार हुई थी। लेकिन उत्पादन में राज्यवार अलग-अलग है। तमिलनाडु में एक हेक्टेयर में 65.5 कुंतल जबकि आंध्र प्रदेश में इतने ही क्षेत्र में 68.2 कुंतल मक्का पैदा हुआ। बिहार में यही उत्पादन 36.4 कुंतल प्रति हेक्टेयर है।

कृषि लागत और मूल्य आयोग एक फसल के लिए अलग-अलग प्रदेश की लागत मूल्य को एक करके औसत निकालता है फिर उस फसल की एमएसपी तय कर दी जाती है। आयोग की ही वेबसाइट पर कई ऐसी रिपोर्ट हैं, जिसके अनुसार देश में किसी एक फसल की कुल लागत (श्रम, बीज, उर्वरक, मशीन, सिंचाई, कीटनाशी, बीज, ब्याज और अन्य खर्चे) अलग-अलग आती है।

कृषि मजदूरी दर को ही देखें तो आंध्र प्रदेश में एक दिन की कृषि मजदूरी दर 312 रुपए है (जनवरी 2018 के अनुसार) जबकि अमस में यही दर 277, बिहार में 264, गुजरात में 236, हरियाणा में 367, हिमाचल प्रदेश में 439, कर्नाटक में 321, केरल में 691, मध्य प्रदेश में 298, ओडिशा में 226, पंजाब में 349, राजस्थान में 267, तमिलनाडु में 424, उत्तर प्रदेश में 243 और पंजाब में 275 रुपए है जबकि अखिल भारतीय औसत कृषि मजदूरी दर मात्र 283 रुपए है।


अब जब कृषि लागत और मूल्य आयोग ने वर्ष 2019-20 में फसलों खरीफ फसलों की एमएसपी तय की तब उसमें कृषि मजदूरी दर औसतन 190.78 रुपए ही जोड़ा। जबकि ऊपर दिये आंकड़ों पर गौर करेंगे तो यह दर हर प्रदेश में अलग-अलग है। इसी तरह अन्य खर्चे जैसे सिंचाई, कीटनाशक और बीज के खर्च भी राज्यवार अलग-अलग हैं, फिर एमएसपी की दर पूरे देश में एक क्यों है और क्या अब इस नीति में बदलाव की जरूरत है?


कृषि लागत और मूल्य आयोग के सहायक निदेशक सूबे सिंह कहते हैं, "केंद्र सरकार औसत खर्च को आधार मानकर ही एमएसपी तय करती है। यह राज्य का भी मामला है, ऐसे में प्रदेश सरकारों को अपने अनुसार एमएसपी बढ़ाने का भी अधिकार है, वे बढ़ा सकती हैं।"

संविधान के मुताबिक कृषि राज्य सरकार का मामला है। फिर राज्य सरकारें भी तो एमएसपी की दरें बढ़ा सकती हैं, लेकिन ऐसा होता क्यों नहीं?

मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष केदार सिरोही इस बारे में बताते हैं। वे कहते हैं, "भले ही केंद्र सरकार यह कहे कि कृषि राज्य का मामला है लेकिन सच तो यह है कि व्यापार संगठन से लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि व्यापार नीतियों तक को तय करने का काम केंद्र सरकार करती है, ऐसे में प्रदेश सरकार के पास बचता ही क्या है।"

"अगर प्रदेश सरकार किसी फसल की एमएसपी बढ़ा देती है जिसे हम बोनस कहते हैं, तो केंद्र सरकार उस फसल को तो अपनी तय एमएसपी पर ही खरीदती है। इसके अलावा राज्यों का कोटा भी निर्धारित कर दिया जाता है, उससे ऊपर सरकार खरीदती नहीं। ऐसे में राज्य सरकरों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए अब जरूरी है कि एमएसपी की नीतियों में बदलाव किया जाए। वैसे भी इससे किसानों को फायदा नहीं पहुंचता। इस नीति पर फिर से नये सिरे से विचार-विमर्श करने की जरूरत है," केदार सिरोही आगे कहते हैं।


कृषि लागत और मूल्य आयोग अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकरों द्वारा एमएसपी के ऊपर दिये जाने वाले बोनस को विकृति कहता है। खरीफ 2019-20 की रिपोर्ट में इसका उल्लेख भी है। रिपोर्ट में लिखा है, "कुछ राज्य सरकारें पिछले कुछ वर्षों के दौरान विशेष रूप से धान के लिए न्यूनतम समर्थन पर बोनस दे रही हैं, जिससे बाजार में विकृतियां पैदा होती हैं, इससे प्राइवेट सेक्टर को नुकसान होता है। वर्ष 2017-18 और 2018-19 के दौरान, केरल, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने धान के लिए बोनस घोषित किया है। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ ने 2018-19 में धान के लिए 750 रुपए प्रति कुंतल का बोनस घोषित किया, जो एमएसपी का लगभग 43 प्रतिशत है। इसी तरह, केरल ने 2018-19 में धान ग्रेड ए के लिए 760 रुपए प्रति कुंतल और धान सामान्य के लिए 780 रुपए प्रति कुंतल के बोनस का भुगतान किया।"

रिपोर्ट में आगे उल्लेख है, "छत्तीसगढ़ में चावल की सरकारी खरीद एनएफएसए (राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) और अन्य योजनाओं के तहत आवश्यकता से बहुत अधिक है। इसलिए, राज्य को अतिरिक्त भंडार का निपटान करना मुश्किल होगा। एमएसपी पर बोनस फसल संतुलन को प्रभावित करता है। आयोग ने अपनी पहले की अनुशंसा को फिर से दोहराया है कि इस तरह के बोनस/प्रोत्साहन को रोका जाना चाहिए, खासकर जिन राज्यों में चावल का उत्पादन ज्यादा होता है।"

ए2+एफएल को मिलाकर धान (सामान्य) की लागत खरीफ विपणन मौसम 2019-20 में प्रति कुंतल 1208 रुपए है जबकि सरकार इसके लिए 1812 रुपए एमएसपी दे रही है जिसे लागत का 150 फीसदी (डेढ़ गुना ज्यादा) बताया जाता है। इसी तरह ज्वार, रागी, मक्का, तुर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन, तिल, रामतिल और कपास की कीमत भी सरकार लागत का 150 फीसदी दे रही है जबकि बाजारा की कीमत 185 फीसदी मिल रही है।


एमएसपी का आकलन करने के लिए सीएसीपी खेती की लागत को तीन भागों में बांटता है। ए2, ए2+एफएल और सी2। ए2 में फसल उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे- बीज, खाद, ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है जबकि ए2+एफएल में नकद खर्च के साथ पारिवारि श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है। वहीं सी2 में खेती के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया गया है। इसमें कुल नकद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रामिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है।

फरवरी 2018 में केंद्र सरकार की ओर से बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि अब किसानों को उनकी फसल का जो दाम मिलेगा वह उनकी लागत का कम से कम डेढ़ गुना ज्यादा होगा। सीएसीपी ने अपनी रिपोर्ट के देखेंगे तो पता चलता है कि अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है वह ए2+एफएल है।

वर्ष 2004 में प्रो. एम एस स्वामीनाथन की अगुवाई में राष्ट्रीय किसान आयोग के नाम से जो कमेटी बनी थी उसने अक्टूबर 2006 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। रिपोर्ट में किसानों को सी2 लागत पर फसल की कीमत देने की वकालत की गई थी, जबकि ऐसा हो नहीं रहा।


इसे हम धान के उदाहरण से समझते हैं। एक कुंतल धान के लिए ए2+एफएल के हिसाब से कुल लागत 1208 रुपए आ रही है जबकि सी2 के हिसाब से यह 1619 रुपए है। धान सामान्य की एमएसपी इस समय 1812 रुपए। अब सरकार ए2+एफएल हिसाब से कह रही है वे लागत का डेढ़ गुना दे रहे हैं, जबकि अगर सी2 लागत को जोड़ेंगे तो डेढ़ गुना का दावा झूठ नजर आता है।

छत्तीसगढ़, महासमुंद के बागबहरा निवासी किसान दिनेश पैकरा ने अपने पांच एकड़ खेत में पिछले साल धान की खेती की थी। वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, " एमएसपी पर फसल आज तक नहीं बेच पाया। जब भी बेचने जाता हूं मंडी के अधिकारी उसमें कोई न कोई कमी निकाल देते हैं। अब हमें अगली फसल भी लगानी होती है ऐसे में इतना इंतजार कौन करेगा। बाहर के व्यापारियों से जो मिलता है उसी कीमत पर बेच देते हैं।"

वर्ष 2010 से 2020 तक, फसलों की एमएसपी


पिछले वर्ष गांव कनेक्शन के सर्वे में किसानों ने कहा था कि फसल की सही कीमत का ना मिलना उनके लिए सबसे बड़ी समस्या है। आर्थिक सहयोग विकास संगठन और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (OECD-ICAIR) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2017 के बीच किसानों को उत्पाद का सही मूल्य न मिल पाने के कारण 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

वर्ष 2015 में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पुनर्गठन का सुझाव देने के लिए बनी शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि एमएसपी का लाभ सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों को ही मिल पाता जिसका सीधा मतलब है कि देश के 94 फीसदी किसान एमएसपी के फायदे से दूर रहते हैं। वहीं वर्ष 2016 में एमएसपी पर नीति आयोग की एक भी एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार 81 फीसदी किसानों को यह मालूम नहीं था कि सरकार कई फसलों पर एमएसपी देती है।

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कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं, " केंद्र सरकार एमएसपी का अधिकार अपने पास इसलिए रखती है क्योंकि यह उन्हें ही तय करना होता है कि कितना स्टॉक रखना है, बाजार में कितना उपलब्ध करना है, यह सब फैसले केंद्र को ही करना होता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हम इसे राज्यों के हिसाब से लागू नहीं कर सकते। अब अगर मान लीजिए कि पंजाब में गेहूं की लागत 2500 रुपए आती है तो एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) किसानों को 2500 रुपए ही भुगतान करे और अगर बिहार में यही लागत 1500 रुपए आती है तो सरकार 1500 रुपए दे, लेकिन ऐसा इसलिए भी नहीं होता क्योंकि इसका विरोध करने वाले लोग हैं ही नहीं। किसानों को सभी बातें पता नहीं होती और सरकार का काम आसानी से हो जाता है।"


" केंद्र सरकार नहीं चाहती कि ऐसा हो। अगर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार ने बोनस देने का ऐलान किया तो केंद्र ने यह बोल दिया कि हम उपज नहीं खरीदेंगे। इसका मतलब तो यही हुआ ना कि आप नहीं चाहते कि राज्य सरकारें ऐसा कर पाएं। पूरी पॉलिसी में बदलाव की जरूरत है लेकिन सरकार इसे इसलिए नहीं होने देगी कि क्योंकि अर्थशास्त्रियों की सोच होती है कि खाने की वस्तुएं सस्ती होनी चाहिए। इससे यह होता है कि एक तो महंगाई दर नियंत्रित होती है और इंडस्ट्री को कच्चा माल सस्ती दरों पर दिया जा सकता है।" वे आगे कहते हैं।

"कई बार मैंने मांग की कि किसानों की आय कम से कम 18000 रुपए महीने होनी चाहिए, इस पर कुछ लोगों ने कहा कि अगर ऐसा होगा तो महंगाई बढ़ जायेगी। अब इससे बचने का तरीका यह भी है कि अगर सरकार 1900 रुपए में गेहूं खरीद रही तो वह उसे उसी दर पर खरीदे और लागत में जो अंतर आ रहा है उसे सरकार किसानों के जनधन खाते में भेज दे ताकि महंगाई पर इसका असर न पड़े।" देविंदर शर्मा कहते हैं।

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फसल की मौजूदा एमएसपी नीति पर नीति आयोग भी सवाल उठा चुका है। दिसंबर 2018 में न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के बाद नीति आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि यह एक आशिंक समाधान है। आयोग ने कहा कि कृषि लागत मूल्य आयोग की जगह कृषि समिति बनाने की जरूरत है। इसके अलावा आयोग ने न्यूनतम निश्चित मूल्य के जरिये मंडियों में कृषि उपज की नीलामी की व्यवस्था करने की सिफारिश की और यह भी कहा कि एमएसपी व्यवस्था के लिए बाजारों में कारोबार करने वाले निजी व्यापारियों को सरकार को साथ में लेकर चलना चाहिए। हालांकि इन सुझावों पर कुछ नहीं हो पाया। नीति आयोग केंद्र सरकार के लिए नीति बनाने वाला देश का सबसे बड़ा संस्थान है।

फाइनेंस एंड इकोनॉमिक्स थिंक काउन्सिल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के संस्थापक विक्रांत सिंह इस मुद्दे पर कहते हैं, " एमएसपी से किसानों को फायदा तभी होगा जब केंद्र सरकार की मदद से राज्य सरकार इसे अपने हिसाब से लागू करें। आप राज्य की बात कर रहे हैं, हर क्षेत्र में फसल की लागत-लागत अलग आती है। केंद्र सरकार को चाहिए कि एमएसपी के लिए जीएसटी की तरह कोई नीति बने जिसे राज्यों की मदद से लागू किया जाये लेकिन उसका नियंत्रण केंद्र सरकार के पास हो।"

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इस मुद्दे पर गांव कनेक्शन ने कृषि लागत और मूल्य आयोग में सलाहकार डीके पांडेय से फोन पर बात की। उन्होंने बताया, " एमएसपी केंद्र सरकार का मामला होता है, लेकिन लागत निर्भर करती है मिट्टी कैसी है, वहां की सिंचाई व्यवस्था कैसी है। अब कोई चीज दोमट मिट्टी में बोई जायेगी तो उसकी लागत अलग होगी और कोई चीज बलुई मिट्टी में लगेगी तो उसकी लागत अलग आयेगी। सिंचाई और मजदूरी अलग होने के कारण एक ही फसल की लागत अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग आती है।"

" यह पॅालिसी मैटर है। क्षेत्रीय एमएसपी का कोई प्रारूप नहीं है। इसलिए देश एक, एमएसपी एक है। राज्य सरकार अपने यहां आने वाली लागत को देखकर किसी भी फसल पर बोनस दे सकती है, यह उसका अपना फैसला होता है। लेकिन राज्यों में ज्यादा एमएसपी मिलने लगेगी तो इंटर स्टेट ट्रेडिंग (दूसरे राज्यों में जाकर फसल बेचना) का चलन बढ़ जायेगा। दूसरे राज्यों के किसान भी वहीं जाकर अपनी फसल बेचने लगेंगे जो मांग और आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, इसलिए यह खतरनाक भी है।" डीके पांडेय आगे कहते हैं।


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