संवाद: 21वीं सदी में खुद को कहां देखती हैं महिला किसान

भारतीय महिलाएं सफलता के नए सोपान तय कर रही हैं। खेती बाड़ी में भी वे सफलता की तमाम कहानियों की नायिकाएं हैं। लेकिन महिला दिवस पर हम मध्यवर्ग और शहरी इलाकों की महिलाओं पर ही मुख्य चर्चा करते हैं औऱ ग्रामीण महिलाओं और खासतौर पर खेतिहर श्रम में लगी उन महिलाओं को भुला देते हैं, जिनका इस देश के विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।

Arvind Kumar SinghArvind Kumar Singh   8 March 2021 6:04 AM GMT

संवाद: 21वीं सदी में खुद को कहां देखती हैं महिला किसान

कुछ साल पहले हिमाचल प्रदेश के चौधरी श्रवण कुमार हिमाचल कृषि विश्वविद्यालय का मैने दौरा किया तो यह देख कर हैरानी हुई कि वहां के होम साइंस विभाग में काफी बड़ी संख्या में छात्र नजर आ रहे हैं। सामान्यतया पुरुषों के वर्चस्व वाले देश के कृषि विश्वविद्यालयों में छात्रों को देखना सामान्य बात है। लेकिन होम साइंस विभाग तो महिलाओं के जिम्मे ही माना जाता है। लेकिन हिमाचल प्रदेश की बालिकाओं ने कृषि शिक्षा में पुरुषों का वर्चस्व तोड़ा। हालांकि देश में पहला कृषि विश्वविद्यालय 1962 में शुरू हुआ था लेकिन छात्राओं के लिए खेती रुचि का विषय नहीं रहा था इस नाते उनकी भागीदारी बमुश्किल पांच फीसदी तक होती थी। लेकिन हिमाचल में काफी पहले यह छात्रों से अधिक हो गयी। यहां 1995-96 के बाद बालिकाओं ने कृषि शिक्षा की ओर कदम बढ़ाये और तब उनका नामांकन 14 फीसदी तक पहुंच गया। 2004-05 तक 43 फीसदी और एक दशक पहले 2010 में 54 फीसदी पर आ गया जबकि बालकों का वर्चस्व टूट गया।

यह तो बात विश्वविद्यालय की हुई। लेकिन हिमाचल प्रदेश या देश के पहाड़ी राज्यों से लेकर केरल जैसे प्रांत को देखें तो खेती बाड़ी की रीढ़ महिलाएं ही हैं। भले कृषि शिक्षा में उनकी भागीदारी कम हो लेकिन महिलाओं में एक से एक काबिल किसान हैं। इस समय देश में चल रहे किसान आंदोलन में भी उनकी भूमिका को कमतर नहीं आंका जा रहा है। यह दूसरा मौका है जबकि किसान आंदोलन के मंच से महिला किसानों के सम्मान में आज बहुत कुछ आयोजन हो रहे हैं। किसान आंदोलन के 55वें दिन भी इसकी बागडोर महिला किसानों के हाथ थी और अब 100 दिन से अधिक बीतने के बाद अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भी उनके श्रम और योगदान को किसान संगठन याद कर रहे हैं।

महिलाएं आम तौर पर छोटी और सीमांत किसान हैं, जिनके पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। फोटो: CIAT, Flickr

खेती बाड़ी में महिलाएं आखिर क्या काम नहीं करती हैं। बुवाई, रोपाई, सिंचाई, निराई, कटाई, ढुलाई, छंटाई, भराई, बंधाई और पशुपालन से जुड़े काम जैसे चारा डालना, चराने ले जाना, दूध निकालना, सफाई करना, गोबर बटोरना व कण्डे बनाना, दूध का प्रसंस्करण करना सभी में ज्यादतर महिला श्रम काम आता है। वे ट्रैक्टर भी चलाती हैं और मोटर भी। लेकिन इतना सब होने के बाद भी वे क्या खेती बाड़ी की मुख्यधारा में शामिल हैं। क्या सरकार उनको वास्तव में किसान मानती है। हकीकत तो यही है कि 2011 की जनगणना में महिला किसानों की संख्या 3 करोड़ 60 और महिला कृषि मजदूरों की संख्या सवा छह करोड़ थी, जो अब काफी बढ़ चुकी है। लेकिन खेती लायक जमीनों के स्वामित्व में भूजोतों के हिसाब से महिला किसानों का प्रतिशत 13.87 ही है। उनको तमाम योजनाओं से कितना फायदा हो रहा है यह इस बात से अंदाजा लग सकता है कि पीएम किसान योजना में एक करोड़ 62 लाख 857 महिला किसान ही लाभान्वित हो रही हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में यह उजागर हुआ कि गांवों से शहरों की ओर बढ़ते पलायन से कृषि क्षेत्र में महिलाओं की प्रधानता बढ़ रही है। लेकिन भूमि, कृषि ऋण, जल, बीज और बाजार जैसे संसाधनों में उनके साथ भेदभाव बरकरार है। तमाम नीतिगत खामियों के नाते वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाती हैं।

कृषि विज्ञान केंद्रों से लेकर तमाम संस्थाओं में महिला वैज्ञानिकों और कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है। महिलाएं आम तौर पर छोटी और सीमांत किसान हैं, जिनके पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। उसमें भी अधिकतर मालिकाना हक उनके नाम नहीं है इस नाते तमाम सुविधाओं से वे वंचित रहती हैं। संसद की कृषि संबंधी स्थायी समिति ने कृषि क्षेत्र में महिलाओं को मुख्यधारा में लाने की सिफारिश करते हुए माना था कि कृषि उत्पादन में महिला किसानों की अनूठी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। यूपीए सरकार के दौरान 2007 में राष्ट्रीय कृषि नीति में महिला किसानों को मुख्यधारा में लाने की योजना बनायी गयी थी। कई योजनाओं में 30 फीसदी महिला किसानों को लाभ देने के प्रावधान शामिल हैं।

महिला किसानों के लिए बहुत से उपकरण तो बने हैं, लेकिन अब भी उनकी पहुंच दूर हैं। फोटो: दिवेंद्र सिंह

पुरुषों के हाथ में कई महत्वपूर्ण यंत्र और औजार हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि महिलाएं खुद मशीन हैं। बीज तैयार करने से लेकर कटाई की बाद की प्रक्रिया में उनकी 80 फीसदी से ज्यादा भागीदारी होती है। सभी कृषि संबधी कामों में उनकी भागीदारी समग्र रूप से पुरुषों से अधिक होती है। हरित क्रांति के बाद बड़े पैमाने पर आय़ी तकनीकों और ट्रैक्टर, टिलर व स्पेयर पुरुषों के हाथों में हैं और महिलाएं हाथ से ही जुटी हैं। खेती में 65 फीसदी मानवीय श्रम लगता है। लगातार एक स्थिति में शरीर रखने से मांसपेसियो पर खिंचाव होता है और शारीरिक ऊर्जा की अधिक खपत होती है। इससे महिलाएं कई बीमारियों की चपेट में आ जाती है।

काम को सरल और थकान कम करने की तमाम तकनीकें विकसित हुई हैं। बहुत से उपकरण बने हैं, लेकिन वे उन तक बहुत कम पहुंचे हैं। कृषक महिलाएं परिवार के बारे में सोचती हैं, अपने बारे में नहीं। इसी नाते लगातार खटने से उनकी सेहत पर काफी असर पड़ता है और कार्य कुशलता पर भी। तमाम शोध के बाद महिला किसानों के लिए जो तमाम उपकरण बनाए गए हैं वे बहुत सस्ते हैं और कुछ तो ऐसे हैं जिनको लुहार भी बना सकता है। पहाड़ की महिला किसानों के लिए फॉडर कलेक्टर, चाय की पत्तियों की चुनाई का उपकरण, छाता, घास उठाने का यंत्र, पंखा करने का यंत्र और कटर आदि बनें हैं लेकिन ये प्रयोगशाला से आम महिला किसानों तक सुलभ तो हों।

वैसे तो 18वीं शताब्दी में उद्योगों में यंत्रीकरण के बाद से कृषि उपकरणों और यंत्रों का बनना भी आरंभ हो गया। 20वीं शताब्दी में हलों में पर्याप्त सुधार हुआ और आगे रबड़ के पहिए के कारण कृषि यंत्रों और ट्रैक्टरों के भार खींचने में काफी सुविधा हुई। आज तमाम उन्नतशील कृषि यंत्रों का निर्माण हो रहा है। छोटी जोतों के कारण यंत्रीकरण बहुत गति नहीं पकड़ पाया। छोटे किसानों और महिलाओं की जरूरतों के आधार पर कृषि यंत्र बनाने में कंपनियों की खास रुचि नहीं है। क्योकि यह अधिक मुनाफे का कारोबार उनको नही लगता।

महिला किसानों के कंधों पर खेती टिकी है लेकिन कृषि नीतियां उनको किसान ही नहीं मानती। फोटो: USAID, Flickr

आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में इस बात को खुल कर स्वीकारा गया कि पुरूषों का गांव से शहर में पलायन होने की वजह से महिलाओं की हिस्सेदारी कृषि के क्षेत्र में बढ़ रही है। वे कृषि में विभिन्न भूमिकाओं में दिख रही है। जरूरत इस बात की है कि महिलाओं तक जमीन, पानी, क्रेडिट और प्रौद्योगिकी पहुंच बढ़ाई जाए। साथ ही ग्रामीण महिलाओं को कृषि को लेकर प्रशिक्षण मिले।

पशुपालन क्षेत्र में 71 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि डेयरी क्षेत्र में 1.5 करोड़ पुरुषों की तुलना में 7.5 करोड महिलाएं है। चारा देने, दूध निकालने का काम महिलाएं करती हैं, जबकि पशुओं का परिवहन में उपयोग करने और चराने और जोतने जैसी गतिविधि पुरुषों के हाथ होती है। महिलाएं डेयरी सहकारिता आंदोलन की रीढ़ है। जो महिलां पहले खेती का काम करती थी लेकिन किसान नहीं कहलाती थीं वे आज गांव की खेती के क्षत्र में सलाहकार की भूमिका में है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने खेती-बाड़ी के विकास को काफी महत्व दिया है। ग्रामीण महिलाओं के लिए कई योजनाएं लायी। लेकिन महिला किसानों की दशाओं को बेहतर बनाने की दिशा में अहम कदम नहीं उठा।

हमारी महिला किसान सामान्यतया छोटी और सीमांत किसान हैं। आधे महिला किसानों के पास आधा हेक्टेयर से भी कम जमीन है। और कागजों पर तो नाममात्र की महिलाओं के पास अपने नाम जमीन है। ऐसे में उनको न खेती के लिए सुविधाएं मिलती हैं न ही कर्ज। भले उनके कंधों पर खेती टिकी है लेकिन कृषि नीतियां उनको किसान ही नहीं मानती। हालांकि 15 अक्टूबर 2017 को पहली बार महिला किसान दिवस मनाने के साथ भारत ने दुनिया को यह संकेत दे दिया है कि वह महिला किसानों के योगदान को स्वीकार रहा है। लेकिन अगर जमीनी हकीकत को देखें तो यह सब प्रतीकात्मकता से कुछ अधिक नहीं लगता है। क्योंकि खेती बाड़ी की रीढ़ होने के बावजूद महिला किसान हाशिए पर और अधिकार विहीन ही हैं। अधिकतर राज्यों की नीतियों के केंद्र से वे बाहर हैं और राज्य सरकारें भी उनको सशक्त बनाने की दिशा में कुछ ठोस पहल नहीं कर रही हैं।

महिलाएं खेती में किसान के रुप में हो या सह-किसान, पारिवारिक मजदूर, दिहाड़ी मजदूर या फिर प्रबंधक के रूप में हो सब जगह भूमिका में हैं। फोटो: दिवेंद्र सिंह

कृषि में महिलाओं की भागीदारी को ध्यान में रखते हुए 1996 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भुवनेश्वर में सेंट्रल इंस्टीट्यूट फार वूमेन इन एग्रीकल्चर स्थापित किया था। यह कृषि में महिलाओं से जुड़े विभिन्न आयामों पर अध्ययन और अनुसंधान कर रहा है। तमाम तकनीकों का विकास किया है जिससे खेती में महिलाओं की कठिनाइयां कम हो सकें। लेकिन सच बात यह है कि प्रयोगशाला से जैसे खेत के बीच दूरियां हैं, वही यहां भी कायम हैं। सरकार ने देश के सभी कृषि विज्ञान केद्रों में एक-एक महिला कृषि वैज्ञानिक की तैनाती का भी आदेश भी दिया है। लेकिन हकीकत यह है कि अभी अधिकतर केंद्रों पर गृह विज्ञान में ही काम हो रहा है। जिसमे वे खुद पारंगत हैं।

खेतिहर मजदूरों में भी महिलाओं का अनुपात लगातार बढ़ रहा है लेकिन उनकी स्थिति कोई बहुत बेहतर नहीं है। वैसे तो 1991 में बलराम जाखड़ के कृषि मंत्री काल में महिलाओं को कृषि क्षेत्र में प्रशिक्षित करने के लिए एक नयी योजना आरंभ की गयी और कृषि विज्ञान केंद्रों को भी इस लिहाज से मजबूत बनाया गया। खादी सेक्टर में भी ग्रामीण महिलाओं को अनाज और दालों के प्रसंस्करण, पापड़ और मसाले बनाने, अखाद्य तिलहनों का संग्रह से लेकर तमाम क्षेत्रों में प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया। लेकिन अभी बहुत कुछ करने की दरकार है। बहुत कम महिलाओं को तकनीकी ज्ञान मिल पाता है।

मनरेगा ने ग्रामीण महिला श्रमिकों की दशा को उन इलाको में थोड़ा बेहतर बनाया है जहां इसका जमीनी क्रियान्वयन ठीक है। लेकिन आयोजना के स्तर पर महिलाओं का योगदान अधिक नहीं है क्योंकि वे इतनी शिक्षित औऱ जागरूक नहीं है। मनरेगा की अनुसूची 2 में पैरा 27 में साफ पानी बच्चों के लिए शिशु सदन, विश्राम जैसी व्यवस्था अधिकतर जगहों पर कागजों पर ही है। ग्रामीण भारत की अधिकांश महिलाएं अब भी रोज़गार के लिए कृषि पर ही आश्रित हैं। अगर रोज़गार की गुणवत्ता की बात की जाए, तो यह अनिश्चित ही है।

बेशक भारतीय महिलाएं सफलता के नए सोपान तय कर रही हैं। खेती बाड़ी में भी वे सफलता की तमाम कहानियों की नायिकाएं हैं। लेकिन महिला दिवस पर हम मध्यवर्ग और शहरी इलाकों की महिलाओं पर ही मुख्य चर्चा करते हैं औऱ ग्रामीण महिलाओं और खासतौर पर खेतिहर श्रम में लगी उन महिलाओं को भुला देते हैं, जिनका इस देश के विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।

आज भी खेती हमारी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। कोरोना संकट ने खेती के महत्व को और समझाया है। देश में आज भी रोज़गार का सबसे बड़ा ज़रिया खेती ही है जिससे 57 फीसदी लोगों की जीविका चलती है। महिलाएं खेती में किसान के रुप में हो या सह-किसान, पारिवारिक मजदूर, दिहाड़ी मजदूर या फिर प्रबंधक के रूप में हो सब जगह भूमिका में हैं। बागवानी, पशु-पालन और मछली पालन में इजाफा होने के साथ महिलाओं की भूमिका और बढ़ी है। पुरुषों ने अलाभकारी खेती को महिलाओं के भरोसे छोड़ कर शहरों की ओर अपने को केंद्रित कर दिया। तमाम गांव महिलाओं के कंधों पर खड़े हैं। लेकिन क्या महिला दिवस देश की रीढ़ इन महिला किसानों और खेतिहर श्रमिकों पर भी निगाह डाल पाता है।

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