गांवों का करोड़ों टन कूड़ा जाता कहां है?

भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रतिदिन 30 से 40 लाख कुंतल कचरा निकलता है, जिसके निस्‍तारण की कोई खास योजना नहीं है।

Ranvijay SinghRanvijay Singh   12 Nov 2019 12:52 PM GMT

गांवों का करोड़ों टन कूड़ा जाता कहां है?

''हमारे गांव में कचरे को फेंकने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। इसलिए सभी लोग एक तालाब में ही कचरा फेंकते आए हैं। कचरे की वजह से तालाब भर रहा है और सिमट रहा है।'' तालाब में पड़े कचरे को दिखाते हुए यह बात 30 साल के रामजी मिश्रा कहते हैं।

रामजी मिश्रा उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर जिले के ब्रम्‍हावली गांव के रहने वाले हैं। इस गांव में कूड़े के प्रबंधन को लेकर कोई काम नहीं किया गया है, जिसकी वजह से लोग कूड़ा घर से निकाल कर कहीं भी फेंक देते हैं। रामजी बताते हैं, ''हमारे गांव में लोग कूड़ा सड़कों पर भी फेंक देते हैं। अगर किसी के घर से कूड़ा फेंकने की जगह दूर होती है तो एक घर के दरवाजे से दूसरे के घर के दरवाजे तक कूड़ा बुहार दिया जाता है।''

ऐसा नहीं है कि कूड़े के प्रबंधन की यह समस्‍या सिर्फ ब्रम्‍हावली गांव तक सीमित है। यह समस्‍या देश के करीब 6.63 लाख गांव की समस्‍या है। 2016 में आई 'सॉलिड वेस्‍ट मैनेजमेंट इन रूरल एरिया' रिपोर्ट में बताया है कि भारत के ग्रामीण घरों में से निकलने वाला घरेलू कचरा लगातार बढ़ता जा रहा है और यह गंभीर चिंता का विषय है। भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रतिदिन 0.3 से 0.4 मिलियन मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जिसके निस्‍तारण की कोई खास योजना नहीं है। 0.4 मिलियन मीट्रिक टन यानि करीब 40 लाख कुंतल कचरा हर दिन ग्रामीण भारत पैदा कर रहा है। अनुमान के मुताबिक, एक ट्रक में करीब 100 कुंतल कचरा आता है। ऐसे में ग्रामीण भारत से हर दिन करीब-करीब 40 हजार ट्रक कचरा निकल रहा है।

गांव के इस कूड़े के प्रबंधन की जिम्‍मेदारी सीधे-सीधे ग्राम पंचायतों पर होती है, लेकिन यह पंचायतें इस काम में नाकाम साबित होती दिख रही हैं। भारत में 2.39 लाख ग्राम पंचायतें हैं, ऐसे में समझा जा सकता है कि यह नाकामी कितनी बड़ी सामूहिक नाकामी है।

उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर जिले के ब्रम्‍हावली गांव का तालाब जो कूड़े से भरा जा रहा है।

उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर जिले के ब्रम्‍हावली गांव का तालाब जो कूड़े से भरा जा रहा है।

इस नाकामी का एक उदाहरण उत्‍तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के गांवों में भी देखने को मिल जाता है। उत्‍तर प्रदेश की राजधानी से सिर्फ 60 किमी दूरी पर रंजीतपुर ग्राम पंचायत और छेदा ग्राम पंचायत स्‍थ‍ित है। इन दोनों ही ग्राम पंचायतों में कूड़े के निस्‍तारण को लेकर कोई खास योजना नहीं है।

रंजीतपुर गांव के रहने वाले शिव कैलाश अवस्‍थी बताते हैं, ''हमें कूड़ा फेंकने के लिए घर से दूर जाना होता है। वो भी ऐसी जगह है जहां आस पास के सभी लोग कूड़ा फेंकते हैं। यह कूड़े का ढेर दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है और किसी का इसपर ध्‍यान नहीं है।'' कुछ ऐसा ही हाल छेदा गांव का भी है। इस गांव के रहने वाले 80 साल के गंगा प्रसाद कहते हैं, ''गांव में कूड़े का ढेर बनता जा रहा है। प्रधान से अगर कुछ कहो तो वो सुनने को तैयार ही नहीं है। हम मजबूर हैं, कूड़ा कहीं न कहीं फेंकना तो होगा ही।''

ऐसा नहीं कि यह हाल सिर्फ उत्‍तर प्रदेश में दिखाई देता है। कूड़े के निस्‍तारण के मामले में मध्‍य प्रदेश के पन्‍ना जिले की ग्राम पंचायत मोहन्‍द्रा भी उत्‍तर प्रदेश के गांव सी ही नजर आती है। मोहन्‍द्रा गांव में एक तालाब है जो कूड़े से भरता जा रहा है। इस तालाब को दिखाते हुए गांव के रहने वाले अख‍िलेश चौबे कहते हैं, ''गांव में कूड़े के निस्‍तारण को लेकर कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। इसकी वजह से लोग कूड़ा तालाब में ही फेंक देते हैं। अगर कूड़े को फेंकने की व्‍यवस्‍था होती तो ऐसा हाल न होता।''

उत्‍तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का बेलहरा गांव जहां कूड़ा कुछ इस तरह फेंका जाता है।

उत्‍तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का बेलहरा गांव जहां कूड़ा कुछ इस तरह फेंका जाता है।

इन सभी बातों से एक सवाल उठता है कि आखिर गांव में कूड़े के निस्‍तारण की व्‍यवस्‍था क्‍यों नहीं की जाती है। कुछ ऐसा ही सवाल उत्‍तर प्रदेश की विधानसभा में 23 जुलाई 2019 को समाजवादी पार्टी के विधायक हाजी इरफान सोलंकी ने किया था। उन्‍होंने पूछा था, ''क्या पंचायती राज मंत्री बताने की कृपा करेंगे कि प्रदेश की ग्राम पंचायतों/ राजस्व गांवों में कूड़ा प्रबंधन की सरकार की कोई योजना है? यदि हां, तो क्या? यदि नहीं, तो क्यों?''

इस सवाल के जवाब में उत्‍तर प्रदेश के पंचायती राज मंत्री भूपेन्‍द्र सिंह ने कहा था, ''स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अगले महत्वपूर्ण घटक के रूप में ग्रामों को खुले में शौच मुक्त किए जाने के उपरान्त ओडीएफ प्लस गतिविधि के रूप में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबन्धन किया जाना है। योजना के अन्तर्गत अगले महत्वपूर्ण घटक के रूप में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबन्धन हेतु पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी मार्ग-निर्देशिका के अनुसार ग्राम पंचायत वार कार्ययोजना बनाकर कूड़ा प्रबन्धन एवं अपशिष्ट जल प्रबन्धन की गतिविधियां की जानी हैं, जिसमें घर-घर से कूड़ा एकत्र कर कार्बनिक अपशिष्टों को पुर्नचक्रण एवं पुनः उपयोग आदि हेतु फारवर्ड लिंकेज जैसे कार्य सम्मिलित हैं।''

पंचायती राज मंत्री के इस जवाब से समझ आता है कि सरकार भी गांव के कूड़े के निस्‍तारण को लेकर प्‍लान बना रही है और जल्‍द ही गांव में इसका असर देखने को मिलेगा। इस प्‍लान के तहत ही राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान (NIRD&PR) द्वारा ग्राम पंचायतों के प्रतिनिध‍ियों को वेस्‍ट मैनेजमेंट की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इस ट्रेनिंग प्‍लान के हेड हैं संस्‍थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आर. रमेश।

डॉ. आर. रमेश ने गांव कनेक्‍शन को बताया, ''सबसे पहले तो गांव वालों को आदत नहीं होती कि वो कूड़े को अलग-अलग रखें, दिक्‍कत यहीं से शुरू हो जाती है। ऐसे में सबसे पहले उन्‍हें सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग रखने की ट्रेनिंग देना जरूरी है। दूसरा यह कि पंचायतों का भी कोई ठीक-ठाक सिस्‍टम नहीं होता कूड़े को उठाने या उनके निस्‍तारण को लेकर। तो ऐसे में हमारी प्राथमिकता है कि गांव में परिवार को ट्रेनिंग दी जाए कि वो एक मिनट ज्‍यादा लेकर कूड़े को अलग-अलग रखें। साथ ही हम पंचायत से जुड़े जिम्‍मेदार लोगों को भी ट्रेनिंग देते हैं।''

उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर जिले की ग्राम पंचायत पिपरी शादीपुर में लगा हुआ खस्‍ताहाल डस्‍टबिन।

उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर जिले की ग्राम पंचायत पिपरी शादीपुर में लगा हुआ खस्‍ताहाल डस्‍टबिन।

''अब यही देखने वाला है कि वाटर सप्‍लाई को लेकर गांव में सिस्‍टम होता है। एक आदमी होता है जो मोटर चालू करता है और टंकी को भरता है। उस मोटर के चलने में जितनी बिजली खर्च होगी उसे पंचायत वहन करेगी। लेकिन जब यही चीज वेस्‍ट मैनेजमेंट पर आती है तो यहां कोई प्‍लान नहीं होता है, कोई सिस्‍टम नहीं होता है। इसी को देखते हुए हमने कुछ नियम बनाए हैं जिसे पंचायत को फॉलो करना चाहिए। अगर पंचायतें इस नियम को फॉलो करने लगें तो उनके पास भी वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर एक सिस्‍टम होगा।''

डॉ. आर. रमेश बताते हैं, ''जहां तक खर्च की बात है तो वेस्‍ट मैनेजमेंट की लिए हर महीने अलग से खर्च करना पड़ता है। जैसे कूड़ा उठाने वाले की सैलरी, कूड़े की गाड़ी, उस गाड़ी का मेंटिनेंस यह सब ऐसे खर्च हैं जो हर महीने करने होते हैं। दिक्‍कत यही है कि सरकार की ओर से इस महीने के खर्च को नहीं दिया जाता है, बल्‍कि यह कहा जाता है कि पंचायतें खुद से इस खर्च को वहन करें। जैसे सरकार वर्मी कंपोस्‍ट के यूनिट को लगाने के लिए 20 लाख दे देगी, लेकिन वेस्‍ट मैनेजमेंट पर हर महीने आने वाला खर्च पंचायतों को ही उठाना होगा।''

''ऐसे में खर्च को मैनेज करने के लिए हमारा सुझाव है कि हाउस टैक्‍स, वॉटर टैक्‍स, कंपोस्‍ट को बेचकर इस खर्च को कुछ हद तक मैनेज किया जा सकता है, लेकिन यह भी पर्याप्‍त नहीं है। हमारी स्‍टडी में यह बात सामने आई है कि कुछ गांव में जहां प्रत्‍येक परिवार वेस्‍ट मैनेजमेंट के लिए 30 रुपए महीने तक दे रहे हैं, वहां यह व्‍यवस्‍था अच्‍छे से चल रही है। ऐसे में इस व्‍यवस्‍था को भी लागू किया जा सकता है।'' वे आगे बताते हैं।

क्‍या गांव में वेस्‍ट मैनेजमेंट मुमकिन है? इस सवाल पर डॉ. आर. रमेश कहते हैं, ''गांव में वेस्‍ट मैनेजमेंट मुमकिन है। कई ग्राम पंचायतों में ऐसा हो भी रहा है। मैं कई पंचायतों में गया और वहां एक चीज समान पाई, जो है वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर लीडरशिप की कमी। हमें ग्राम पंचायतों में एक आदमी चाहिए जो इस चैलेंज को ले सके। यह आदमी एक मोटा मोटी आकलन कर ले कि हर महीने वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर कितना खर्च आएगा। इसके बाद धीरे-धीरे इस काम को शुरू किया जा सकता है। दो चीज है जो किसी को भी हतोउत्‍साहित कर सकती है वो है गांव वालों का सहयोग न करना और बजट की कमी। इस चीज को मैनेज कर लिया गया तो यह मुमकिन है।''


डॉ. आर. रमेश बताते हैं, ''हमने जब इस तरह की ट्रेनिंग देने की शुरुआत की थी तो लोगों के नामांकन के लिए इंतजार करना होता था। लेकिन अब कई स्‍टेट खुद से आगे आ रहे हैं। केरल, कर्नाटक, राजस्‍थान जैसे राज्‍य कह रहे हैं कि जितना भी आपका खर्च होगा हम देंगे आप आप वेस्‍ट मैनेजमेंट की 5 दिन की ट्रेनिंग दीजिए, लोगों को ऐसी ग्राम पंचायतों में ले जा जाइए जहां वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर अच्‍छा काम हो रहा है।''

डॉ. आर. रमेश की बात से एक सवाल यह भी उठता है कि अगर कुछ ग्राम पंचायतें वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर अच्‍छा काम कर रही हैं तो दूसरी ग्राम पंचायतें ऐसा क्‍यों नहीं कर पा रहीं। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने मध्‍य प्रदेश के मंदसौर जिले की दलौदा चौपाटी ग्राम पंचायत के प्रधान विपिन जैन से बात की। विपिन जैन को अपनी ग्राम पंचायत में वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर बेहतर काम करने के लिए 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण पुरस्कार' मिला है।

मध्‍य प्रदेश के मंदसौर जिले की दलौदा चौपाटी ग्राम पंचायत में वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर अच्‍छा काम हो रहा है।

मध्‍य प्रदेश के मंदसौर जिले की दलौदा चौपाटी ग्राम पंचायत में वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर अच्‍छा काम हो रहा है।

विपिन जैन बताते हैं, ''ज्‍यादातर ग्राम पंचायतें वेस्‍ट मैनेजमेंट को लेकर इसलिए भी काम नहीं करती कि यह बहुत मुश्‍किल काम है। कौन आम लोगों को रोज जाकर समझाए कि कचरा कहां फेंकना है। यह सब सोचते हुए प्रधान इस ओर कुछ खास नहीं करते हैं। जहां तक बात मेरे काम कही है तो मैंने सबसे पहले लोगों को समझाने से शुरुआत की थी। उनको बताया कि इससे उनके स्‍वास्‍थ्‍य पर ही खराब असर होगा। फिर मैंने गांव में सफाई अभ‍ियान रखा और सबकी गली उन्‍हीं से साफ करने को कहा, लोग समझ चुके थे तो खुद से आगे भी आए और सफाई की।''

विपिन जैन आगे कहते हैं, ''इसके बाद मैंने 20-20 लीटर के डस्‍टबिन उनको निशुल्‍क दिए। फिर मैंने कचरे की गाड़ी चलाई जो कि सुबह-शाम चलती है। लोगों से कहा कि कचरा इसी में डालना है। सबसे अलग तब हुआ जब मैंने यह नियम निकाला कि अगर कचरा किसी ने सड़क पर फेंका तो उसके खिलाफ 200 रुपए पेनाल्‍टी लगाई जाएगी। इसके बाद भी अगर कचरा फेंका गया तो उस व्‍यक्‍ति के खिलाफ एफआईआर कराई जाएगी। इसका बहुत असर हुआ। फिर हमने कूड़ा निस्‍तारण के क्षेत्र में काम किया और कूड़े का असली वैलुएशन करते हुए उसे कबाड़ी वाले को बेचना शुरू किया। इससे पंचायत की कमाई भी हो रही है।''

इनपुट- यूपी के बाराबंकी से विरेंद्र सिंह, सीतापुर से मोहित शुक्‍ला, मध्‍यप्रदेश के पन्‍ना से आकाश बहरे।


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