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महिलाओं को क्यों नहीं मिल पाती सुरक्षित गर्भपात की सुविधाएं ? गांव कैफ़े में आए जानकारों ने बताई ये वजहें

कोरोनाकाल के शुरुआती तीन महीने (25 मार्च 2020 से 24 जून 2020) के बीच 'आईपास डवेलेपमेंट फ़ाउंडेशन' नाम की एक संस्था ने सर्वे किया था जिसमें सामने आया कि 10 राज्यों की साढ़े अठारह लाख महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा नहीं मिल सकी। गाँव कनेक्शन के विशेष शो 'गाँव कैफे' में इस मुद्दे पर बात करने के लिए अलग-अलग राज्यों से विशेषज्ञ शामिल हुए थे। पढ़िए ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित गर्भपात को लेकर क्या स्थिति रही?

Neetu SinghNeetu Singh   10 Feb 2021 6:30 AM GMT

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को क्यों नहीं मिल पाता सुरक्षित गर्भपात? गांव कैफ़े में आए जानकारों ने बताई ये वजहेंएक सर्वे के अनुसार देश के 10 राज्यों की 18.5 लाख महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा नहीं मिल सकी।

एक कोने में वो दीवार के सहारे गुमसुम सी बैठी थी, बहुत पूछने पर वो झिझकते हुए बोली, "पेट में बच्चा था दवा खाई थी, खून (ब्लीडिंग) बहुत निकला तभी चक्कर आ रहे हैं।"

चालीस वर्षीय ममता देवी (बदला हुआ नाम) के छह बच्चे हैं ये अब बच्चे नहीं चाहती हैं। ममता के अनुसार उन्होंने सिर्फ कोविड में ही ये गर्भनिरोधक दवा नहीं खाई, इससे पहले भी ये गर्भपात के लिए सात बार दवा खा चुकी हैं।

"बच्चे बहुत छोटे रहते हैं अगर उस दौरान मैं गर्भवती हो गई तो ये (पति) बाजार से जो दवा (गर्भ निरोधक) ले आते हैं वही खा लेती हूँ। कभी-कभी तो आठ दस दिन तक खून निकलता रहता है। सफाई (एबॉर्शन) कराने हम कभी अस्पताल नहीं गये क्योंकि वहां जाने से सबको पता चल जाएगा। दूसरा सफाई के नाम पर डॉक्टर बहुत गुस्सा करते हैं," लखनऊ से लगभग 45 किलोमीटर दूर माल ब्लॉक के रामपुर गाँव की रहने वाली ममता ने बताया।

ममता, ग्रामीण भारत की अकेली महिला नहीं हैं जिन्हें सुरक्षित गर्भपात की सुविधा न मिल पायी हो। ममता की तरह लाखों महिलाएं सुरक्षित गर्भपात की सुविधा से वंचित रह जाती हैं जिसकी विशेषज्ञ तमाम वजहें बताते हैं। कोविड में ज्यादातर ज़िला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को कोविड सेंटर बना दिया गया था, डॉक्टरों की टीमें कोविड-19 की देखरेख में लगा दी गयी थी। बाजार में गर्भनिरोधक दवाइयाँ नहीं मिल रही थी, यातायात बंद था। गर्भनिरोधक, ग्रामीण महिलाओं की पहुंच से दूर हो गए। सिर्फ कोविड में ही नहीं बल्कि सामान्य परिस्थियों में भी महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात मिलना आज भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। कोविडकाल में इन महिलाओं की ये समस्या और बढ़ गई।

सुनिए सुरक्षित गर्भपात को लेकर गाँव कैफे में क्या कहते हैं जानकार?

देश में सुरक्षित गर्भपात को लेकर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था आईपास डवेलेपमेंट फ़ाउंडेशन ने कोरोनाकाल के शुरुआती तीन महीनों (25 मार्च 2020 से 24 जून 2020) के बीच एक सर्वे किया। इस सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि देश के 10 राज्यों की 18.5 लाख महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा नहीं मिल सकी। गाँव कनेक्शन के विशेष शो 'गाँव कैफ़े' में इस मुद्दे पर बात करने के लिए अलग-अलग राज्यों से विशेषज्ञों को शामिल किया गया जिन्होंने अपने-अपने राज्यों के अनुभव साझा किये।

गाँव कैफ़े में पश्चिम बंगाल से जुड़ी आईपास डवेलेपमेंट फ़ाउंडेशन से अनुश्री बनर्जी ने कहा, "गाँव में एबॉर्शन को लेकर आज भी बहुत बड़ा टैबू है। कोविड में ज्यादातर ज़िला अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को कोविड सेंटर बना दिया गया। शुरुआत के तीन चार महीने कोविड मरीज़ के अलावा किसी और मरीज़ पर ध्यान ही नहीं दिया गया। यही वजह रही कि शुरुआती तीन महीने में साढ़े अठारह लाख महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा नहीं मिल सकी।"

अनुश्री बनर्जी पश्चिम बंगाल का एक उदाहरण साझा करती हैं। कोविड में एक महिला गर्भवती हो गई जिसके पहले से दो बच्चे थे और दूसरा बच्चा बहुत छोटा था इसलिए वो तीसरा बच्चा नहीं चाहते थे। जब सरकारी अस्पताल पहुंचे तो वहां एबार्शन से मना कर दिया। मजबूरन उस महिला को 12,000 रुपए खर्च करके गर्भपात कराना पड़ा, जो शायद बहुत कम में या फ्री में हो सकता था। पश्चिम बंगाल से मिलती-जुलती घटना यूपी के लखनऊ के इटौंजा ब्लॉक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर भी देखने को मिली। ढाई महीने की गर्भवती परवीन को मेडिकल कंडीशन (मिस्केरेज) की वजह से गर्भपात कराने के लिए मजबूर होना पड़ा। लॉकडाउन की वजह से इनकी जांच नहीं हो पायी थी। अस्पताल से इन्हें ये कहकर वापस कर दिया गया कि अभी सिर्फ इमरजेंसी केस ही देखे जा रहे हैं मजबूरन इन्हें प्राइवेट अस्पताल जाना पड़ा जहाँ उनका बिल 8,000 रुपए का बना।

परवीन (28 वर्ष) के साथ हुई इस अनहोनी के लिए उस गाँव की आशा कार्यकर्ता कुसुम सिंह ने जो वजह बताई वो स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है। कुसुम ने बताया, "परवीन का यह तीसरा बच्चा था, मार्च के पहले सप्ताह में एएनएम ने जब गाँव में इनकी जांच की थी तभी पता था इनमें खून की कमी है। इसके बाद लॉकडाउन लग गया, फिर हम इनकी न तो कोई जांच करा पाए और न ही दवा दिला पाए। जिस वजह से इनका बच्चा पेट में ही खराब हो गया।"

गाँव कनेक्शन के राष्ट्रीय सर्वे 2020 के आंकड़ों के अनुसार ऐसे घर जिनमें गर्भवती महिलाएं थीं, उनमें से 42% महिलाएं यानि हर 10 में से चौथी गर्भवती महिला नियमित जांच (चेकअप) और टीकाकरण नहीं करा सकीं। आईपास डवेलेपमेंट फ़ाउंडेशन के आंकड़ों के अनुसार आमतौर पर तीन महीने में 39 लाख एबार्शन होते हैं लेकिन लॉकडाउन में स्वास्थ्य प्रभावित होने की वजह से 47% महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात नहीं मिल सका। जैसे-जैसे लॉकडाउन में ढील दी गई वैसे-वैसे 59% सुरक्षित गर्भपात में गिरावट हुई वहीं रिकवरी पीरियड में 33% सुधार हुआ।

गाँव कैफ़े में लखनऊ से जुड़ी डॉ. नीलम सिंह ने कहा, "हमारे देश में सुरक्षित गर्भपात का कानून 1971 में बना था इसके बावजूद आज भी देश में लगभग 50% महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा नहीं मिल पाती। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्दों पर डॉक्टरों की कमी है, इंफ्रास्ट्रक्चर ठीक नहीं है, संसाधनों की कमी है। योग्य डॉक्टर ज़िला अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं इस वजह से भी ग्रामीण महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा नहीं मिल पाती। कानून बने 40-50 साल हो गये पर अभी लोगों को कानून के बारे में जानकारी ही नहीं है।"

ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी सुरक्षित गर्भपात कराने के नहीं हैं पर्याप्त इंतजाम. फोटो : नीतू सिंह


डॉ. नीलम आगे कहती हैं, "आंकड़े कहते हैं इस कोविड की वजह से बच्चों के जन्म में 20 बिलियन तक बढ़ोत्तरी हो सकती है, 10% बच्चे अधिक जन्म ले सकते हैं। इस विषय पर काउंसलिंग हो नहीं रही है। फ्रंटलाइन वर्कर्स को इतना सक्षम नहीं बनाया गया कि वो फैमिली प्लानिंग के बारे में समुदाय की काउंसलिंग कर जागरुक कर सकें। पब्लिक हेल्थ में बैठे लोगों को पता ही नहीं है कि धरातल पर सुरक्षित गर्भपात को लेकर कितनी मुश्किलें हैं। बाजार में मिलने वाली दवाइयों को अगर डॉ. की सलाह से लिया जाए तो ये 97% तक सुरक्षित है।"

आईपास डवेलेपमेंट फ़ाउंडेशन के आंकड़ों के अनुसार कोविड काल में 80% महिलाएं इसलिए एबार्शन नहीं करा सकीं क्योंकि उस दौरान उन्हें गर्भनिरोधक गोलियां नहीं मिल रही थीं। उस समय प्राइवेट अस्पतालों में सुविधा न मिल पाने की वजह से 16% महिलाएं गर्भपात नहीं करा सकीं, 4% वो महिलाएं थीं जो अस्पताल तक नहीं पहुंच सकीं। बड़े अस्पतालों में होने वाले एबार्शन में कोविड के समय 60%, सामुदायिक अस्पताल में 24% और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर 17% की कमी आई है।

23 देशों में सुरक्षित गर्भपात को लेकर काम करने वाली एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था, 'एशिया सेफ़ एबार्शन पार्टनरशिप' से जुड़ी नंदिनी मजूमदार कहती हैं, "पब्लिक हेल्थ की सुविधा सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी बहुत अच्छी नहीं है। सुरक्षित गर्भपात को लेकर ज्यादातर देशों में स्थिति खराब है। छोटे देश जैसे थाईलैंड, न्यूजीलैंड और वियतमान की स्वास्थ्य सेवाएं ठीक हैं। भारत में सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत काम करने की जरुरत है। काउंसलिंग सुविधाओं पर विशेष ध्यान देना होगा।"

ग्रामीण क्षेत्रों में बने प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बदहाली की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, यही वजह है कि महिलाएं जरुरी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाती हैं. फोटो : नीतू सिंह

छत्तीसगढ़ में आदिवासी और दलित महिलाओं के साथ काम करने वाली राजिम केतवास ने गाँव कैफ़े में इस समुदाय की महिलाओं के अनुभव साझा करते हुए कहा, "पीबीटीजी समुदाय की महिलाएं अस्पताल में जाकर गर्भपात नहीं करा सकती क्योंकि इनकी आबादी लगातार कम हो रही है इसलिए सरकार मना कर सकती है। इस कोविड में अनचाही प्रेगनेंसी से ये महिलाएं बहुत परेशान रहीं, इन्हें न चाहते हुए भी बच्चों को जन्म देना पड़ा। वंचित तबके की महिलाएं प्राइवेट अस्पताल पहुंच नहीं पाती और सरकारी अस्पतालों में वो सुविधा नहीं होती जहाँ इन्हें सुरक्षित गर्भपात मिल सके। कई बार ये घरेलू नुस्ख़े अपनाती हैं जो इनके लिए काफी नुकसानदायक साबित होते हैं।"

झारखंड और बिहार में आईपास डवेलेपमेंट फ़ाउंडेशन के सीनियर स्टेट डायरेक्टर नीलेश कुमार ने कहा, "एबॉर्शन को लेकर अभी भी स्टिग्मा है जिसे दूर करने की दिशा में बहुत काम करने की जरुरत है। कोविड में सुरक्षित गर्भपात को भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा मानकर प्रमुखता में रखा जाता जिससे महिलाओं को असुविधा न होती। प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने के लिए इसे ग्रामीण महिलाओं तक पहुँचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग को बहुत काम करने की जरूरत है।"

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