क्यों छूट मिलते ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से दूर होना शुरू हो गए किसान ?

इस साल केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को स्वैच्छिक कर दिया है। इससे पहले कृषि कर्ज लेने वाले किसानों के लिए इस योजना में पंजीकृत होना अनिवार्य था।

Hemant Kumar PandeyHemant Kumar Pandey   17 July 2020 1:38 PM GMT

क्यों छूट मिलते ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से दूर होना शुरू हो गए किसान ?केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर किसानों के अनुभव अच्छे नहीं रहे। फोटो : गाँव कनेक्शन

"इस साल मैंने एप्लीकेशन लगा कर बैंक को बता दिया कि हमें इंश्योरेन्स नहीं लेना है। किसानों को पता ही नहीं चलता है कि प्रीमियम का पैसा कहां गया! इससे सरकार का भी नुकसान होता है और अपना भी। इंश्योरेंस का भी कोई फायदा नहीं हो रहा है," ये बातें हमसे हरियाणा के अम्बाला में रहने वाले 48 वर्षीय किसान नरेश कुमार कहते हैं।

अम्बाला के लखनौरा गांव में रहने वाले नरेश अपने तीन भाइयों के साथ चार एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। साल 2018 में उन्होंने सर्व हरियाणा ग्रामीण बैंक में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) खाता खुलवाया था। इसके साथ ही वे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के लाभार्थियों में शामिल हो गए, लेकिन केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना को लेकर उनका अनुभव काफी खराब रहा है।

नरेश बताते हैं, "नौ मार्च, 2019 को करीब 100 गांवों में ओलावृष्टि हुई थी। इससे हमारी रबी की फसल को भारी नुकसान हुआ। इसके अगले दिन मैंने कृषि अधिकारी को फोन कर इसकी जानकारी दी। इसके चार-पांच दिन बाद सर्वे करने के लिए कुछ लोग आए थे, लेकिन अब तक हमें पैसा नहीं मिला।" नरेश कुमार की मानें तो उन्हें न तो फसल नुकसान का क्लेम मिला है और न ही प्रीमियम के पैसे (1396 रुपये)।

नरेश कुमार इस साल के खरीफ सीजन में उन लाखों किसानों की सूची में शामिल हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) से दूरी बना ली है। पीएमएफबीवाई की वेबसाइट के मुताबिक इस रिपोर्ट को लिखे जाने तक करीब 85 लाख किसानों ने ही खरीफ सीजन में फसल बीमा के लिए अपना आवेदन बैंकों को दिया है।

पिछले साल के मुकाबले देखें तो यह आंकड़ा काफी कम और चौंकाने वाला है। साल 2019 के खरीफ सीजन में 3,80,59,742 (करीब तीन करोड़ 81 लाख) किसान इस योजना की लाभार्थी सूची में शामिल थे।

हालांकि अधिकतर राज्यों ने इस योजना के लिए आवेदन की आखिरी तारीख 31 जुलाई तय की है। लेकिन अब तक जिस तरह का ट्रेंड (प्रतिदिन करीब 11 लाख आवेदन) दिख रहा है, उससे माना जा सकता है कि तय समय सीमा तक पिछले साल के मुकाबले बीमाकृत किसानों की संख्या काफी कम हो सकती है। इसके अलावा राजस्थान सहित कुछ राज्यों ने बीमा के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 15 जुलाई रखी थी जो अब खत्म हो चुकी है।

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अब तक इस योजना को अपनी उपलब्धियों में शामिल करने वाली मोदी सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें नजर आती हैं। फोटो : गाँव कनेक्शन

इन आंकड़ों के चलते अब तक इस योजना को अपनी उपलब्धियों में शामिल करने वाली मोदी सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं। बीती 13 जुलाई को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की समीक्षा बैठक की थी। इसमें उन्होंने इस योजना के बारे में किसानों को जागरूक करने पर जोर दिया। साथ ही फसल नुकसान के लंबित दावों का जल्द से जल्द भुगतान करने पर भी ध्यान देने को कहा है।

माना जा रहा है कि इस योजना को लेकर केंद्र सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि इस साल खरीफ सीजन से किसानों के लिए इसे स्वैच्छिक कर दिया गया है। इससे पहले वैसे सभी किसान जो बैंकों से कृषि कर्ज लेते थे, वे खुद ही इसके दायरे में आ जाते थे, लेकिन 19 फरवरी, 2020 को केंद्रीय कैबिनेट ने किसानों को खरीफ सीजन से इस बात की छूट दी गई है कि वे इस योजना में शामिल होने या न होने का फैसला खुद ले सकते हैं।

इसे ध्यान में रखते हुए ही चार साल में पहली बार इस बात का सही मूल्यांकन हो सकता है कि यह योजना अब तक किसानों का कितना भरोसा हासिल कर पाई है।

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हालांकि किसानों के अलावा कृषि मामलों के जानकार और किसान नेता इस बात को लेकर सहमत दिखते हैं कि इस योजना से किसानों को फायदा पहुंचने की जगह बीमा कंपनियों को मुनाफा हुआ है। वहीं सरकार के ढीली नीति के चलते ये कंपनियां अपनी तय जिम्मेदारियों से भी बचती रही हैं। इसके चलते किसानों का इस योजना से दूरी बनाना स्वाभाविक दिखता है।

इस बारे में कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा का मानना है कि इस योजना की शुरुआत कारपोरेट तबके को फायदा पहुंचाने के लिए शुरू किया गया है। उन्होंने हमें आगे बताया, "इस योजना की डिजाइन में बुनियादी खामियां हैं। जिन बीमा कंपनियों को इस योजना के लिए पंजीकृत किया गया है, वह इसके संचालन से जुड़ी चीजों पर खर्च नहीं कर रही हैं। कंपनी ने कोई निवेश ही नहीं किया। सारा काम सरकार करती है और अंत में कंपनियां फायदा ले जाती हैं।"

देविंदर शर्मा की बातों की पुष्टि सरकारी आंकड़े भी करते हैं। बीस मार्च, 2020 को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि साल 2016-17 में बीमा कंपनियों को कुल 21,937 करोड़ रुपये हासिल हुए थे। इनमें से दावे के रूप में 16,782 रुपये का भुगतान किया गया। वहीं वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए यह आंकड़ा 25,346 करोड़ रुपये और 21,951 करोड़ रुपये था। इसके अगले साल यानी 2018-19 में यह बढ़कर 28,725 करोड़ रुपये और 25,785 करोड़ रुपये हो गया।

इन तीन वर्षों में कुल प्रीमियम और दावा भुगतान के बीच का अंतर 11,490 करोड़ रुपये है यानी हम इस रकम को बीमा कंपनियों का मुनाफा कह सकते हैं।

किसानों को मालूम ही नहीं चलता है कि किसानों को अपना क्लेम लेने के लिए कहां और किसके पास जाना है। फोटो : गाँव कनेक्शन

हालांकि केंद्रीय मंत्री का मानना है कि इस मुनाफे में कंपनी का प्रशासनिक खर्च भी शामिल है। लेकिन जमीनी स्थिति यह है कि बीमा कंपनियों ने इसके लिए कोई ठोस बुनियादी ढांचा तैयार नहीं किया है। ये अधिकांश प्रक्रियाओं के लिए सरकारी कर्मचारियों पर निर्भर है।

राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिमन्यु कोहाड़ का कहना है कि इस योजना के लिए जितने कर्मचारियों की जरूरत होती है, उसकी तुलना में इनकी संख्या काफी कम होती है। इससे फसलों का सही आकलन नहीं हो पाता है, जिसका आखिर में नुकसान किसानों को ही उठाना पड़ता है।

इसके अलावा उनकी मानें तो अधिकतर बीमा कंपनियों की जिला स्तर पर कोई दफ्तर नहीं है। इसके चलते किसानों को मालूम ही नहीं चलता है कि किसानों को अपना क्लेम लेने के लिए कहां और किसके पास जाना है। वहीं नरेश कुमार ने बताया कि अधिकांश किसानों को यह भी मालूम नहीं होता है कि उनकी फसल की बीमा किस कंपनी के पास है। दूसरी ओर वे बीमा के दावा भुगतान के आंकड़े को भी सही नहीं मानते हैं।

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अभिमन्यु कोहाड़ हमें बताते हैं, "2017-2018 जिनका दावा स्वीकृत हुआ है, उनमें से भी 40-50 फीसदी को ही भुगतान मिला है। बीमा कंपनी भुगतान करने में देरी करती है। जो सरकार आंकड़े दे रही हैं, वह जमीनी स्थिति नहीं है। दोनों में बहुत फर्क है। इसके अलावा इस योजना की एक बड़ी खामी ये भी फसल नुकसान का आकलन व्यक्तिगत स्तर पर न करके गांव के स्तर पर किया जाता है। इसके चलते किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।"

द वायर की एक रिपोर्ट की मानें तो सरकार ने 25 सितंबर, 2019 को बीमा भुगतान में देरी को लेकर पांच बीमा कंपनियों पर कुल 4.21 करोड़ रुपये ब्याज चुकाने को कहा था। यह भुगतान साल 2017-18 के रबी सीजन के लिए था। मगर कंपनियों ने इसे भी किसानों को नहीं चुकाया। इस योजना के प्रावधानों के मुताबिक तय समय सीमा खत्म होने के दो महीने के भीतर अगर दावे का भुगतान नहीं किया जाता है तो बीमा कंपनी को 12 फीसदी ब्याज के साथ किसानों को क्लेम की रकम देनी होगी।

इस योजना को लेकर उत्तर प्रदेश के बनारस स्थित एक बैंकर ने अपना नाम न छापने की शर्त पर हमें बताया कि बीमाकृत किसानों को अगर उनकी फसल नुकसान के दावे का भुगतान केसीसी अकाउंट के जरिए मिलता है तो बैंक उसका भुगतान न करके उससे कर्ज वसूली के रूप में रकम काट लेता है। यानी जो रकम एक किसान को फसल नुकसान के लिए बीमा कंपनियों से मिलना चाहिए, वह कर्ज भुगतान के रूप में बैंक के पास ही चला जाता है और उनके हाथों में कुछ नहीं आता है।

उधर हरियाणा के सोनीपत के रहने वाले किसान युधविंदर सिंह भी इस योजना को लेकर बैंकों के भ्रष्टाचार और लापरवाही का जिक्र करते हैं। वे कहते हैं, "पिछले दो वर्षों के दौरान मोहाना गांव की भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में सैकड़ों किसानों का प्रीमियम तो काट लिया जाता है, लेकिन इसे पोर्टल (बीमा के लिए तय) पर दर्ज नहीं किया गया। इससे किसानों को उनका क्लेम नहीं मिलता है और उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है।"

इसके अलावा युधविंदर सिंह का कहना है कि बीती पांच जुलाई तक बैंक का यह कहना था कि इस योजना के स्वैच्छिक होने को लेकर कोई नोटिफिकेशन उसके पास नहीं आया है। इसके चलते जो किसान फसल बीमा नहीं करवाना चाहते थे, उन्हें भी इसे करवाना पड़ा है। उन्होंने इन मामलों की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

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प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते मामलों के बीच फसल असुरक्षा

बीते कुछ वर्षों में कृषि संकट में बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन के चलते होने वाली प्राकृतिक आपदाएं रही हैं। देश में उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई ऐसे राज्य हैं जिनके किसानों पर इस तरह की आपदाओं की सबसे अधिक मार पड़ती है। उदाहरण के लिए, एक ही अवधि में उत्तरी बिहार का इलाका बाढ़ प्रभावित होता है जबकि राज्य का दक्षिण हिस्सा सूखे की स्थिति से जूझ रहा होता है।

उधर उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका भी मौसम की मार से हर साल गुजरता है। पिछले साल इस इलाके के चित्रकूट और बांदा समेत कई इलाकों में बाढ़ ने नुकसान किया था तो इस साल बुंदेलखंड रीजन का ललितपुर जिला बारिश की कमी से जूझ रहा है। इन सब परिस्थितियों के बीच अगर इन इलाकों के किसानों को फसल बीमा योजना का फायदा नहीं मिलता है तो उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।

पीएमएफबीवाई के प्रावधानों में साफ कहा गया है कि धान, गन्ना, पटसन और मेस्टा (जूट के समान रेशे पैदा करने वाला पौधा) की खेती में जलभराव होने पर कोई क्लेम नहीं दिया जाएगा।

वहीं देविंदर शर्मा का कहना है कि इस योजना के लिए जो दिशा-निर्देश बनाए गए हैं, वे बीमा कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाले हैं, उनकी इस बात को जल आधारित फसलों को लेकर तय प्रावधान में हम देख सकते हैं।

पीएमएफबीवाई के प्रावधानों में साफ कहा गया है कि धान, गन्ना, पटसन और मेस्टा (जूट के समान रेशे पैदा करने वाला पौधा) की खेती में जलभराव होने पर कोई क्लेम नहीं दिया जाएगा यानी इसे बीमा के दायरे से बाहर रखा गया है।

पंजाब-हरियाणा में खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे पर सक्रिय कार्यकर्ता रमनदीप सिंह मान बताते हैं, "हरियाणा के कई इलाकों (करनाल, कुरूक्षेत्र, कैथल, अंबाला, फरीदकोट के अलावा पंजाब राज्य आदि) में पिछले तीन-चार वर्षों से लगातार धान की फसल में जलभराव की समस्या पैदा हो रही है, इसके चलते बड़े पैमाने पर किसानों को नुकसान होता है, लेकिन बीमा कंपनियों से इसका कोई क्लेम नहीं मिलता है।"

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इस जलभराव की वजह भी अनियमित बारिश बताते हैं। रमनदीप कहते हैं, "पहले जितनी बारिश 10 दिनों में होती थी, अब वह दो दिनों में ही हो जाती है, इसके चलते खेतों में जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है।"

आम तौर पर यह माना जाता है कि जल आधारित फसलों की खेती में जलभराव होना और इससे नुकसान सामान्य स्थिति है, लेकिन इसे फसल बीमा योजना के दायरे से बाहर करना किसानों को असुरक्षित करने के बराबर है।

मौजूदा वक्त की बात करें तो राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में टिड्डियां बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचा रही है। आने वाले दिनों में इस समस्या के बढ़ने की ही आशंका जाहिर की जा रही है। इन सब के बीच फसल बीमा योजना से निराश होकर किसानों का इससे दूर जाना उनकी स्थिति को और बदतर करने वाला साबित हो सकता है।

फसल बीमा योजना से निराश होकर किसानों का इससे दूर जाना उनकी स्थिति को और बदतर करने वाला साबित हो सकता है। फोटो : गाँव कनेक्शन

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की आगे की दशा और दिशा

देविंदर शर्मा को इस योजना से अधिक उम्मीदें नहीं हैं। वे कहते हैं, "इस योजना की खामी को जब तक दूर नहीं किया जाता है तब तक कुछ नहीं हो सकता है। सरकार इसकी जगह एक नई योजना की शुरुआत करें जिसमें पब्लिक सेक्टर की बीमा कंपनियों को पैसा दिया जाए और इससे प्राइवेट कंपनियों को बाहर किया जाए।"

इसके अलावा वे इस योजना के बारे में किसानों को जागरूक करने की नीति पर भी सवाल उठाते हैं। देविंदर शर्मा का आगे कहना है, "किसानों को समझाने की जरूरत नहीं है। किसान बेवकूफ नहीं हैं। आपकी योजना में खामी हैं। किसानों को हम दोष न दें।"

वहीं अभिमन्यु कोहाड़ का कहना है, "इस सरकार ने अब तक जितनी योजनाओं को चला रखा है, इनमें से अधिकांश का कोई अता-पता नहीं है। इस योजना की भी यही स्थिति होगी।"

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