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बलात्कार या छेड़छाड़ जैसी घटनाओं के बाद लड़कियाँ स्कूल जाना क्यों छोड़ देती हैं?

किसी लड़की के साथ हुआ रेप या छेड़खानी जैसी घटना न सिर्फ उसकी जिंदगी नर्क बनाती है बल्कि उसके आसपास की तमाम लड़कियों के लिए मुश्किलें लेकर आती है। गांव कनेक्शन की सीरीज 'जिम्मेदार कौन?' के पार्ट-3 में पढ़िए, कैसे बल्लभगढ़ की निकिता और बलरामपुर की स्वेता के साथ हुई घटनाएं स्कूल जाने वाली लड़कियों के कदमों को रोकती हैं?

Neetu SinghNeetu Singh   6 Nov 2020 4:55 PM GMT

बलात्कार या छेड़छाड़ जैसी घटनाओं के बाद लड़कियाँ स्कूल जाना क्यों छोड़ देती हैं?

परीक्षा देकर 21 साल की निकिता कॉलेज से बाहर निकल रही थी, उसी दौरान उसे एक युवक ने कार में अपहरण करने की कोशिश की और नाकाम होने पर गोली मारकर हत्या कर दी। युवती का नाम निकिता था और हत्यारोपी युवक तौसीफ़ उससे शादी करना चाहता था। दिनदहाड़े एक छात्रा की हत्या से न सिर्फ हरियाणा बल्कि हर स्कूल जाने वाली छात्रा और उसके परिजनों को झटका लगा।

26 अक्टबूर को हरियाणा के बल्लभगढ़ में हुई इस घटना ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा। परिजनों के मुताबिक 2 साल पहले भी युवक ने उसका अपहरण किया था, आरोपी धर्म परिवर्तन कर शादी करना चाहता था पर निकिता राजी नहीं थी। निकिता की हत्या हो गई थी इसलिए इस प्रकरण ने तूल पकड़ा, लेकिन यह घटना हमारे देश में स्कूल-कॉलेज जाती छात्रा की हत्या का कोई पहला मामला नहीं था। स्कूल जाती, लौटती छात्राओं से छेड़खानी, रेप, हत्या और गैंगरेप जैसी वारदातें होती हैं, जो उनकी पढ़ाई छूटने की बड़ी वजह बनती हैं।

निकिता के शहर बल्लभगढ़ से लगभग 800 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के एक गांव में 29 सितंबर को 22 वर्षीय स्वेता (बदला हुआ नाम) कॉलेज में बीकॉम थर्ड ईयर का एडमिशन कराने गयी। परिवार के अनुसार उसके साथ गैंगरेप हुआ, पीड़िता बदहवास हालत में घर पहुंची, पीड़िता को अस्पताल लेकर जा रहे थे तभी रास्ते में पीड़िता की मौत हो गयी। कानून की प्रक्रिया जारी है, आरोपी जेल में हैं,पुलिस का कहना है दोषियों को सजा दिलाएंगे। लेकिन थाने के एफआईआर वाले रजिस्टर, आरोप प्रत्यारोप वाले सोशल मीडिया और मीडिया पर छाई खबरों से कोसों दूर स्वेता की छोटी बहन को अपनी बड़ी बहन को खोने का गम तो है ही साथ ही उन्हें एक बड़ा संकट भी सामने दिख रहा है।

ये है रेप पीड़ित वो बच्ची जिसने 12 साल की उम्र में एक बच्चे को जन्म दिया था. फोटो: नीतू सिंह

"अब लड़कियां ब्याह करने के लिए पढ़ाई जाएंगी, फ्यूचर बनाने के लिए नहीं". स्वेता की छोटी बहन ने कहा। उन्हें डर है इस घटना के बाद से लड़कियों पर बंदिशें बढ़ा दी जाएंगी।

आंसुओं से भरी आंखें और भर्राए गले से वो कहती हैं, "गाँव में लड़कियों को वैसे भी बहुत मुश्किल से बाहर निकलने का मौका मिलता है,ऐसी घटनाओं के बाद तो और मनाही हो जायेगी। अब इस घटना का ही लड़कियों को सालोंसाल उदाहरण दिया जाएगा। मैं ही जब बाहर निकलूंगी लोग यही कहेंगे, 'इसी की बहन के साथ गैंगरेप' हुआ था, हमें जज किया जाएगा, गलत ठहराया जाएगा।"

निकिता और स्वेता के साथ हुईं ये घटनाएं उनके आसपास, रिश्तेदारी की तमाम लड़कियों के लिए सालोंसाल दहशत बनी रहेंगी। स्कूल, कॉलेज और फिर नौकरी की तरफ बढ़ते उनके कदमों को ठिठकाती रहेंगी।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों की साक्षरता दर 82.1 फीसदी है, वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 65.5 है। यानि महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से लगभग 17 प्रतिशत कम है। यह फर्क गाँव कस्बों में और बढ़ जाता है। प्राईमरी, मिडिल, मैट्रिक और इंटर में लड़कियों में शिक्षा की भागीदारी लड़कों की तुलना में और कम हो जाती है।

2017 का राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर रिपोर्ट) भी इसी तरह की चिंता व्यक्त करता है कि 15-18 आयु वर्ग में लगभग 39.4 प्रतिशत किशोरियाँ किसी भी शैक्षणिक संस्थान में नहीं जा रही हैं। (गूगल सर्च). लड़कियों की कम संख्या के पीछे के कारकों में परिवार की आर्थिक स्थिति, सामाजिक बर्ताव, स्कूल की सुविधाओं, जागरुकता के अलावा एक वजह उनकी सुरक्षा भी है।

वर्ष 2019 में आई एक गैर सरकारी संगठन क्राई यानि 'चाइल्ड राइट्स ऐंड यू' की रिपोर्ट 'ऐजुकेटिंग द गर्ल चाइल्ड' के मुताबिक देशभर में स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में से 25.2 फीसदी लड़कियां स्कूल दूर होने की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। किसी अनहोनी होने का भय लड़कियों के स्कूल तक पहुंचने की हिम्मत और जरूरत पर भारी पड़ता है।

ये हैं बलरामपुर केस में मृतका की छोटी बहन, जिन्हें अब समाज के सवालों का डर है. फोटो : मो. आरिफ.

देश के बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में साल 2019 में 15 साल की लड़की के साथ उस वक्त गैगरेप हुआ जब वो स्कूल से वापस लौट रही थी। इस घटना ने पूनम (बदला नाम) के जीवन को नर्क बना दिया। वो खुद शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार हुई, लेकिन उसके साथ जो बर्ताव समाज ने चाहते और न चाहते हुए किया उसने आगे की राह मुश्किल कर दी। पूनम की पढ़ाई छूट चुकी है और अब वह अपने घर की चहारदीवारी में लगभग कैद सी है। पूनम अब सिर्फ अपने घर के लकड़ी के दरवाजों के सुराखों से स्कूल आती-जाती अपनी सहेलियों को देखती है। हालांकि उसके साथ हुई घटना के बाद आसपास के गांवों में कई दिनों तक लड़कियों में दहशत रही थी।

हर रोज की तरह पूनम (15 वर्ष) 16 मई 2019 को भी स्कूल से पढ़कर वापस लौट रही थी, उसे उस वक़्त इस बात का अंदेशा भी नहीं था कि जिन तीन किलोमीटर सुनसान झाड़ियों से वो रोज गुजरती है आज वही रास्ता उसके जीवन का सबसे काला दिन होगा। उस दिन पास के गांव के दो दबंग लड़के उसे झाड़ी में खींच ले गये जहाँ उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। वो रोते हुए घर पहुंची, माँ को आपबीती बताई।

मुख्य आरोपी दबंग था इसलिए उसने मुख्य रास्ते पर घेराबंदी कर दी जिससे वो परिवार थाने तक न पहुंच सके। घटना के दो तीन बाद बमुश्किल पीड़ित परिवार थाने पहुंच पाता है वहां एफआईआर दर्ज नहीं होती है। पुलिस अधीक्षक से मिलने के बाद 20 मई को एफआईआर लिखी गयी। पूनम का मेडिकल और 164 के बयान होने के लगभग दो महीने तक आरोपी गिरफ्तार नहीं हुए क्योंकि पुलिस का कहना था उन्हें आरोपी के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला।

पढ़ने में भले ही ये महज एक गैंगरेप की घटना लगे पर इस एक घटना ने पूनम की पढ़ाई छुड़वा दी। पूनम बताती हैं, "जब पढ़ती थी अगर बीच में छुट्टियां पड़ जाती थीं तो घर पर मन नहीं लगता था, पर अब तो स्कूल जाना ही बंद हो गया।"

क्या घरवालों ने स्कूल जाने से मना किया?

"नहीं, अब मेरा मन नहीं करता। आसपास के गाँव में सबको तो पता है कि मेरे साथ ऐसा (गैंगरेप) हुआ है, अब ऐसे में मैं किसी से कैसे बात करूंगी? उस दिन के बारे में कुछ पूछ लिया तो क्या बोलूंगी? पता नहीं कोई मुझसे बात करेगा भी कि नहीं," ये कहते हुए पूनम का गला भर्रा आया।

इस रेप पीड़िता बच्ची के लिए इसका घर अघोषित कैदखाना है. फोटो: यश सचदेवा.

खोजने पर पूनम, स्वेता, निकिता जैसे कई नाम मिलेंगे। ऐसा ही एक नाम है नेहा का। नेहा (बदला हुआ नाम,15 वर्ष) महज जब 12 साल की थी तब उसके साथ रेप हुआ। आरोपी की धमकी की वजह से नेहा इस घटना के बाद इतनी डर गयी कि उसने अपनी माँ को नहीं बताया। जबतक माँ को पता चला तबतक बहुत देर हो चुकी थी, 30 दिसंबर 2017 को यूपी के लखनऊ जिले के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में नेहा ने एक बेटे को जन्म दिया था।

बालिका गृह में नेहा तीन महीने तक बच्चे के साथ रही इसके बाद नेहा को वापस उसके घर भेज दिया गया और बच्चे को सरकारी आश्रय गृह में रख दिया गया। आरोपी अभी छूटकर बाहर आ गया है, नेहा का बच्चा अभी कहाँ इसकी उसे कोई जानकारी नहीं। जब नेहा के साथ यह घटना घटी तब वो चौथी कक्षा में पढ़ती थी इसके बाद वो कभी स्कूल नहीं जा पायी।

"मैं स्कूल जाना चाहती हूँ, पढ़ना चाहती हूं, अपनी सहेलियों के साथ खेलना चाहती हूँ। घर से बाहर निकलने का बहुत मन करता है पर हम बाहर नहीं निकल सकते। अब बाहर निकलने में बहुत डर लगता है सब लोग सवाल पूछेंगे ... उस दिन क्या हुआ था? कहाँ गया तुम्हारा बच्चा?" ये बताते हुए नेहा का गला भर आया, आंसू छिपाने के लिए उसने अपना मुंह दुपट्टे में छिपा लिया।

नेहा का घर उसके लिए अघोषित कैदखाना है। उसकी न कोई सहेली है, न कोई खेल, स्कूल कब का छूट चुका है। केस या फिर किसी जरुरी काम से घर से बाहर निकलना होता है तो मां साथ होती है। नेहा की आंखें झुकी रहती हैं, नेहा के मुताबिक उसे हमेशा डर रहता है कोई फिर कुछ पूछने न लगे। बाहर के लोग जख्म कुरेदते हैं, अपनों की उपेक्षा उसे और निराश करती है। अपने भाईयों की चहेती नेहा को इस बात का भी मलाल है कि उसके बड़े भाई ने उससे इस घटना के बाद से बात करना बंद कर दिया है।

पूनम और नेहा दोनों दलित समुदाय से हैं और यूपी की रहने वाली हैं। देशभर में हर दिन बलात्कार की 87 घटनाएँ दर्ज की जा रही हैं, ये आंकड़े हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2019 की रिपोर्ट है। इसी साल बलात्कार के कुल 32,033 मामले दर्ज किये गए, जिसमें सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही 3,065 मामले थे। वहीं अनुसूचित जाति/जनजाति (एससी/एसटी) समुदाय के लोगों के खिलाफ अपराध के कुल 45,935 मामले दर्ज किए गए। जिसमें से उत्तर प्रदेश में 11,829 मामले दर्ज हुए जो करीब 25.8 प्रतिशत हैं। उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी के साथ अपराध का यह आंकड़ा सबसे अधिक है।

रेप की घटना के बाद से इस बच्ची ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया. फोटो: नीतू सिंह.

ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों के लिए कॉलेज स्तर की शिक्षा तक पहुँचना आसान नहीं है। कुछ एक लड़कियां ही उच्च शिक्षा के लिए बाहर निकल पाती हैं। पढ़ाई के दौरान अगर आसपास रेप और छेड़छाड़ जैसी घटना हो गयी तब तो इनपर टोका-टिप्पणी और बढ़ जाती है।

वर्ष 2016 में सत्याग्रह में छपी एक खबर के अनुसार बरेली के एक गांव की 6-12वीं कक्षा तक की 50 लड़कियों ने, छेड़छाड़ और यौन हिंसा के डर से स्कूल से अपना नाम कटा लिया था। वहीं कुछ समय पहले हरियाणा के रेवाड़ी जिले में एक गांव की 40 लड़कियों ने स्कूल के रास्ते में बलात्कार के डर के चलते स्कूल से नाम कटाया था। इन 40 में से दो लड़कियां राज्य स्तर की कबड़्डी चैंपियन थीं। वर्ष 2015 में बरेली की मीरगंज तहसील के 12 गांवों की लगभग 200 लड़कियों ने स्थानीय युवाओं द्वारा यौन हिंसा के डर से स्कूल जाना छोड़ दिया था।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार देशभर में छेड़खानी के कुल 89,292 मामले रजिस्टर्ड हुए हैं। छेड़खानी के 12,157 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश पहले नंबर और 11,318 मामलों के साथ उड़ीसा दूसरे पायदान पर है। 10,512 मामलों के साथ महाराष्ट्र तीसरे, राजस्थान चौथे (8,807) और 5607 मामलों के साथ मध्य प्रदेश पांचवें नंबर पर है।

जेंडर एवं महिला मुद्दों की विशेषज्ञ डॉ स्मृति सिंह कहती हैं, "रेप और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं में लड़कियों की कोई गलती नहीं होती लेकिन फिर भी दोषी उन्हें ही ठहराया जाता है। कॉलेज-कोचिंग में छेड़छाड़ जैसी घटनाओं का तो लड़कियाँ जिक्र ही नहीं करतीं क्योंकि वो भली-भांति जानती हैं कि अगर उन्होंने अपने घर बता दिया तो उनकी पढ़ाई ऐसे ही बंद हो जायेगी। सिर्फ स्कूल कॉलेज क्यों लड़कियाँ तो घर में भी सुरक्षित नहीं? जबतक सोच नहीं बदलेगी, जेंडर को विषय में शामिल नहीं किया जाएगा, चर्चा नहीं होगी, तुरंत कार्रवाई नहीं होगी तबतक कुछ सुधरने वाला नहीं।"

रेप या छेड़छाड़ जैसी घटनाओं के बाद सिर्फ पीड़िता पर ही प्रभाव नहीं डालता बल्कि पूरा परिवार चाहरदीवारी के अन्दर कैद होकर रह जाता है. फोटो: नीतू सिंह

वो आगे कहती हैं, "लड़कियों की कक्षाएं बढ़ने के साथ ड्रॉप आउट की खाई और गहरी होती चली जाती है। हमें शहरों में कॉलेज आते-जाते वक़्त लड़कियों की संख्या भले ही थोड़ी ज्यादा दिख जाए लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका वास्तविक अनुपात बहुत कम है। लड़कियों की पढ़ाई बंद होने की सबसे महत्वपूर्ण वजह उनकी असुरक्षा है।"

सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम बेसलाइन सर्वे 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 17 साल की लगभग 16 प्रतिशत लड़कियां बीच में ही स्कूल जाना छोड़ देती हैं। गुजरात में 15 से 17 साल की 26.6 प्रतिशत लड़कियां किसी न किसी कारण से स्कूल छोड़ देती हैं। झारखंड में 84.1 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 79.2 प्रतिशत, यूपी में 79.4 प्रतिशत और उड़ीसा में 75.3 प्रतिशत लड़कियां दसवीं के पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं।

लड़कियों का समाज के प्रति नजरिया, घर से स्कूल की दूरी, आने-जाने की सुरक्षा की चिंता और स्कूलों में निरंतर बढ़ती छेड़छाड़ व जेंडर समानता आधारित माहौल न होने की वजह से लड़कियों की एक बड़ी आबादी पढ़ने से वंचित रह जाती है।

निर्भया का केस लड़ चुकीं और हाथरस केस लड़ रहीं वकील सीमा समृद्धि कुशवाहा कहती हैं, "हमारे सिस्टम में और समाज में एक स्त्री के खिलाफ़ होने वाले अपराध को तब तक अपराध नहीं माना जाता जब तक की उसकी हत्या न कर दी जाये। बेटियों के साथ छेड़खानी करने वाले अपराधियों को 2 महीने के अंदर सजा होनी चाहिए। जब कानून का इस तरह से प्रवर्तन होगा तो निश्चित रूप से समाज में डर होगा। अन्यथा जिस अपराध की सजा ही 2 साल है उस अपराध का मुकदमा 10 साल तक कोर्ट में चलेगा तो इसी तरह से समाज में तौसीफ़ पैदा होंगे।"

गैंगरेप की घटना के बाद इस पीड़िता की भी पढ़ाई बंद हो गयी. फोटो: नीतू सिंह.

वो आगे जोड़ती हैं, "लड़कियों को ये बात भली-भांति पता है कि छेड़छाड़ जैसे मामलों में कोई सुनवाई नहीं होगी तभी तो वो थाने में शिकायत के लिए नहीं पहुंचती। अगर छेड़छाड़ जैसे मामलों को थाने स्तर पर गम्भीरता से लिया जाए तो रेप जैसी घटनाएं काफी कम हो जाएंगी। एक दो लड़कियों की शिकायत पर पुलिस त्वरित कार्रवाई करेगी इससे दूसरी लड़कियों को भी हौसला मिलेगा।"

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशल वर्क में समाजशास्त्री गेस्ट फैकल्टी डॉ योगेश नारायण बताते हैं, "रेप या छेड़छाड़ जैसी घटनाओं से शारीरिक प्रभाव तो पड़ता ही है पर इससे कई गुना ज्यादा मानसिक प्रभाव भी पड़ता है। ऐसी घटनाओं को हमारे समाज में इज्जत से जोड़कर देखा जाता है, जिसके साथ ये घटना होती है उनको ऐसा फील करा दिया जाता है कि जैसे उनकी पूरी जिंदगी ही खत्म हो गयी हो। स्कूलिंग, उनका पूरा कैरियर ऐसे ही खत्म कर दिया जाता है।"

डॉ योगेश नारायण अपनी बात जारी रखते हैं, "ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग इस तरह की घटनाओं को लेकर खुले नहीं हैं, जो माता-पिता थोड़े-बहुत जागरूक हैं वो पुलिस सपोर्ट तो ले लेते हैं पर बच्चियों को कभी भी साइक्लोजिकल ट्रीटमेंट नहीं मिलता, जिसकी वजह से वो कुंठित महसूस करती हैं।"

रेप और छेड़खानी जैसी बढ़ती घटनाओं को लेकर 19 साल की बेटी की मां कहती हैं, "मेरा लड़का बड़े शहर में पढ़ता है, मैं चाहती भी हूं कि बेटी भी वहीं जाकर पढ़े लेकिन जब टीवी मोबाइल पर इतनी खबरें रेप की आती हैं तो किसी अनहोनी को लेकर डर लगता है, बिटिया भी अब समझ गई है, इसलिए वो भी शहर में पढ़ने की जिद नहीं करती है।"

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