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एमएसपी पर किसानों की मांग क्यों नहीं मान रही केंद्र सरकार? किन वजहों से नहीं बन पा रही बात?

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों की लड़ाई जारी है। किसान और सरकार के बीच पांच बार बात भी हुई लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। इसे देखते हुए किसानों ने भारत बंद का भी ऐलान कर दिया। कृषि कानून के विरोध के साथ-साथ किसान MSP को अनिवार्य कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। आखिरी एमएसपी पर केंद्र सरकार किसानों की बात मान क्यों नहीं रही?

Mithilesh DharMithilesh Dhar   8 Dec 2020 5:45 AM GMT

msp, farmers, kisan andolan, farmers protestकिसान एमएसपी पर सरकार से गारंटी चाहते हैं। (सभी तस्वीरें- गांव कनेक्शन)

कृषि कानून के विरोध में किसान देश की राजधानी नई दिल्ली में डटे हुए हैं। सरकार और किसानों के बीच पांच बार बात भी हो चुकी है, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। किसान अपनी मांगों को लेकर अड़े हैं और सरकार किसानों को मनाने कोशिश कर रही है।

किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा कि कृषि कानूनों की वापसी के अलावा एक प्रमुख मांग एमएसपी को लेकर भी है, और वह यह है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमत पर खरीद को अपराध घोषित करे और एमएसपी पर सरकारी खरीद लागू रहे।

प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कृषि मंत्री समेत कई केंद्रीय मंत्री किसानों को इस बात का लगातार आश्वासन दे रहे हैं कि एमएसपी की व्यवस्था की जैसे पहले थी, वैसे अब भी रहेगी, लेकिन एमएसपी कानून को लेकर कोई कुछ नहीं बोल रहा। और किसान एमएसपी की गारंटी चाहते हैं।

किसान चाहते हैं कि कृषि कानून में इसका जिक्र होना चाहिए। सरकार का तर्क है कि पहले के कानूनों में भी एमएसपी का कानूनी मान्यता देने की बात नहीं थी, इसलिए नये कृषि कानूनों में भी इसे शामिल नहीं किया गया।

किसान संगठनों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी लोग लगातार सरकार से पूछ रहे हैं कि आखिर एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाने में हर्ज ही क्या है?

आखिर सरकार के सामने चुनौतियां क्या हैं? क्यों सरकार MSP पर किसानों की मांग नहीं मान रही है?

ये जानने से पहले सबसे पहले यह समझते हैं कि एमएसपी है क्या और ये लागू कैसे होता है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्या है?

MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस या फिर न्यूनतम सर्मथन मूल्य सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की एक प्रकार की गारंटी होती है। राशन सिस्टम के तहत जरूरतमंद लोगों को अनाज मुहैया कराने के लिए इस एमएसपी पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है। अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके।

एमएसपी किसी भी फसल की पूरे देश में एक ही होती है। अभी केंद्र सरकार 23 फसलों की खरीद एमएसपी पर करती है। कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेस CACP) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय की जाती है।

वर्ष 2015 में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पुनर्गठन का सुझाव देने के लिए बनी शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि एमएसपी का लाभ सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों को ही मिल पाता है जिसका सीधा मतलब है कि देश के 94 फीसदी किसान एमएसपी के फायदे से दूर रहते हैं। वर्तमान में सरकार के अनुसार देश में किसानों की संख्या (किसान परिवार) 14.5 करोड़ है, इस लिहाज से 6 फीसदी किसान मतलब कुल संख्या 87 लाख हुई।

वर्ष 2019 में आम बजट से पहले भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने 9 राज्यों के 18,267 किसानों के बीच सर्वे कराकर जानने की कोशिश की थी कि आखिर ग्रामीण भारत मोदी सरकार से चाहता क्या है। तब सर्वे में शामिल 43.6% किसानों ने कहा था उनके लिए सबसे बड़ी समस्या फसल की सही कीमत का न मिलना है।

फसलों की कीमत कैसे तय होती है और तय कौन करता है?

वर्ष 2009 से कृषि लागत और मूल्य आयोग एमएसपी के निर्धारण में लागत, मांग, आपूर्ति की स्थिति, मूल्यों में परिवर्तन, मंडी मूल्यों का रुख, अलग-अलग लागत और अन्तराष्ट्रीय बाजार के मूल्यों के आधार पर किसी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता है।

कृषि मंत्रालय यह भी कहता है कि खेती के उत्पादन लागत के निर्धारण में नकदी खर्च ही नहीं बल्कि खेत और परिवार के श्रम का खर्च (बाजार के अनुसार) भी शामिल होता है, मतलब खेतिहर मजदूरी दर की लागत का ख्याल भी एमएसपी तय करने समय रखा जाता है। एमएसपी का आकलन करने के लिए सीएसीपी खेती की लागत को तीन भागों में बांटता है।

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ए2, ए2+एफएल और सी2, ए2 में फसल उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे- बीज, खाद, ईंधन और सिंचाई आदि की लागत शामिल होती है जबकि ए2+एफएल में नकद खर्च के साथ पारिवारि श्रम यानी फसल उत्पादन लागत में किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है।

वहीं सी2 में खेती के व्यवसायिक मॉडल को अपनाया जाता है। इसमें कुल नकद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रामिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है।

शांता कुमार समिति की उस रिपोर्ट का छोटा सा हिस्सा जिसमें इसका जिक्र किय गया है महज 6 फीसदी किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिल पाता है।

फरवरी 2018 में केंद्र सरकार की ओर से बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि अब किसानों को उनकी फसल का जो दाम मिलेगा वह उनकी लागत का कम से कम डेढ़ गुना ज्यादा होगा। सीएसीपी की रिपोर्ट देखेंगे तो पता चलता है कि अभी फसल की लागत पर जो एमएसपी तय किया जा रहा है वह ए2+एफएल है।

वर्ष 2004 में प्रो. एमएस स्वामीनाथन की अगुवाई में राष्ट्रीय किसान आयोग के नाम से जो कमेटी बनी थी उसने अक्टूबर 2006 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। रिपोर्ट में किसानों को सी2 लागत पर फसल की कीमत देने की वकालत की गई थी, जबकि ऐसा हो नहीं रहा।

जब पैदावार बढ़ेगी तक खरीद कौन करेगा?

एमएसपी को कानून का दर्जा देने में सरकार के सामने क्या दिक्कते हैं? यह सवाल हमने कृषि अर्थशास्त्र अनुसंधान केंद्र (AERC), दिल्ली विश्वविद्यालय के मानद निदेशक प्रोफेसर प्रमोद कुमार जोशी से पूछा।

वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "एमएसपी को कानूनन अनिवार्य बनाना बहुत मुश्किल है। पूरी दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं है। इसका सीधा सा मतलब यह भी होगा कि राइट टू एमएसपी। ऐसे में जिसे एमएसपी नहीं मिलेगा वह कोर्ट जा सकता है और न देने वाले को सजा हो सकती है।"

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"अब मान लीजिए कि कल देश में मक्का या दाल का उत्पादन बहुत ज्यादा हो जाता है और बाजार में कीमतें गिर जाती हैं तो वह फसल कौन खरीदेगा? कंपनियां कानून के डर से कम कीमत में फसल खरीदेंगी ही नहीं। ऐसे में फसल किसानों के पास ऐसी ही रखी रह जायेगा। लोगों को इसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार करने चाहिए।" जोशी कहते हैं।

पंजाब और हरियाणा से हजारों की संख्या में किसान देश की राजधानी नई दिल्ली पहुंचे हैं।

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वे बात जारी रखते हुए कहते है कि देश में अभी जिन फसलों की खरीद एमएसपी पर हो रही है, उसके लिए हमेशा एक 'फेयर एवरेज क्वॉलिटी' तय होता है। मतलब फसल की एक निश्चित गुणवत्ता तय होती है, उसी पर किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है। अब कोई फसल गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरती तो किसान तो उसे कैसे खरीदा जायेगा? अभी तो व्यापारी फसल की गुणवत्ता कम होने पर भी खरीद लेते हैं, लेकिन कानून बनने के बाद यह कैसे संभव हो पायेगा जब फसल की कीमत फिक्स कर दी जायेगी? इसके लागू करना मुश्किल होगा। व्यापारियों के सामने बड़ी मुश्किल आयेगी।

पैसा कहां से आयेगा? आयात भी बढ़ सकता है

कृषि नीतियों के जानकार और कृषि अर्थशास्त्री विजय सरदाना को लगता है कि अगर केंद्र सरकार एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती पैसों की होगी और इसका इसका एक असर यह भी होगा कि देश में कृषि उत्पादों का आयात बढ़ सकता है।

वे गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "केंद्र सरकार की कमाई ही सालाना 16.5 लाख करोड़ रुपए है जबकि अगर उसे सभी 23 फसलों की खरीद एमएसपी पर करनी पड़े तो सरकार को इसके लिए 17 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़े सकते हैं। अगर सरकार एमएसपी को अनिवार्य कानून बना देगी तो वह तो सभी फसलों पर लागू होगी, बस धान या गेहूं पर ही तो नहीं होगी। दूसरी फसलों के किसान भी तो मांग करेंगे। अगर यह हुआ तो अभी के कुल बजट का लगभग 85 फीसदी हिस्सा सरकार एमएसपी पर ही खर्च कर देगी।"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कह रहे हैं कि नये कृषि कानून के बाद भी सरकार एमएसपी पर फसलों की खरीद जारी रखेगी-


विजय इस पर भी चिंता व्यक्त करते हैं कि अगर सरकार के राजस्व पर दबाव बढ़ेगा तो गरीबों को मिल रहीं दूसरी सुविधाओं पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। वे कहते हैं, "यह तो रही खरीद की बात। इसके अलावा सरकार किसानों को उर्वरक और कृषि यंत्रों पर भी सब्सिडी देती है जो लगभग एक लाख करोड़ रुपए के आसपास है। ऐसे में सरकार बिजली, पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं के खर्च या तो कम करेगी या फिर बढ़ायेगी।"

"अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हमारी उपज की कीमत वैसे ही कई देशों की अपेक्षा ज्यादा है। ऐसे में अगर एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाया गया तो व्यापारी आयात करने लगेंगे और सरकार उन्हें रोक भी नहीं पायेगी। ऐसे में सरकार को किसानों से सारी फसलें खरीदनी पड़ेंगी। अगर सरकार किसानों से सारी फसलें एमएसपी पर खरीदेगी तो इसके बजट के लिए करों में करीब तीन गुना वृद्धि करनी होगी। जिससे देश के करदाताओं पर कर का बोझ बढ़ेगा।"

विजय यह भी कहते हैं कि देश में 85 फीसदी छोटे किसान हैं, जिसका मतलब तो यह हुआ कि वे खरीदार भी हैं। ऐसे में ज्यादा एमएसपी की मतलब उपज की कीमत बाजार में बढ़ेगी। बतौर उपभोक्ता किसानों पर भी तो इसका असर पड़ेगा।

विश्व व्यापार संगठन का दबाव?

प्रोफेसर प्रमोद कुमार जोशी विश्व व्यापार संगठन की भी बात करते हैं। उनका तर्क है कि सब्सिडी के कारण देश को विश्व व्यापार संगठन के सामने झुकना पड़ता है। हमें उन्हें बताना पड़ता है कि हमारे यहां गरीबी है, हमें सब्सिडाइज फूड (छूट पर भोजन) देना पड़ता। इसीलिए सरकार खाद्य सुरक्षा नीति भी लेकर आई। हमें अपने कृषि बाजार खोल देने चाहिए। अभी भी हम कई उपज पर सब्सिडी देकर उसका निर्यात कर रहे हैं। मतलब पहले हम पैदा करने के लिए सब्सिडी दे रहे हैं फिर उसका व्यापार करने के लिए सब्सिडी दे रहे हैं।

"कंबोडिया, वियतनाम जैसे छोटे देशों ने अपने चावल के बाजार को खोल दिया है। उनके यहां इससे गरीबी तो कम हुई ही है, किसानों की आय भी बढ़ी है। हम तो कृषि में पीछे की ओर जाना चाह रहे हैं। जहां सब कुछ सरकार ही करेगी। फसल पैदा भी करायेगी और उसकी खरीद भी करेगी। रूस में पहले अनाज के बदले अनाज दिया जाता था, लेकिन समय के साथ सब ने खुद को बदला।" जोशी आगे कहते हैं।

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो किसान आंदोलन का तो समर्थन करते हैं, लेकिन डब्ल्यूटीओ (विश्व व्यापार संगठन) में भारत के न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति का विरोध भी करते हैं।

भारत में किसानों को एमएसपी या या जो सब्सिडी दी जाती है, डब्ल्यूटीओ उसकी गिनती सब्सिडी में करता है और उसे बैड या बुरी सब्सिडी बताता है। बैड इसलिए क्योंकि उसके अनुसार इससे बाजार प्रभावित होता है।

डब्ल्यूटीओ ने सब्सिडी को ग्रीन बॉक्स, ब्लू बॉक्स और एंबर बॉक्स सब्सिडी में बांटा है। ब्लू व ग्रीन बॉक्स सब्सिडी ऐसी सब्सिडी हैं जिनसे विश्व व्यापार पर असर नहीं पड़ता या फिर बहुत कम असर पड़ता है। वहीं, एंबर बॉक्स सब्सिडी वे हैं जिनसे घरेलू उत्पादन प्रभावित होता है व जिसका असर विश्व व्यापार पर पड़ता है। उदाहरण के लिए भारत में बिजली, खाद वगैरह में सब्सिडी देने का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।

विश्व व्यापार संगठन अध्ययन केंद्र नई दिल्ली की कृषि सब्सिडी पर रिपोर्ट।

डब्ल्यूटीओ विकासशील देशों को 10% और विकसित देशों को 5% कृषि सब्सिडी देने की छूट देता है। विकसित देश भारत पर आरोप लगाते हैं कि वह 10 फीसदी से ज्यादा कृषि पर सब्सिडी देता है। पिछली बार 2018 में विश्व व्यापार संगठन की हुई बैठक में इस मुद्दे पर बात हुई थी।

हालांकि भारत 2014 से ही कह रहा है कि उसके यहां दी जाने वाली सब्सिडी विकसित देशों से भी कम है। विश्व व्यापार संगठन अध्ययन केंद्र नई दिल्ली की जून 2020 की एक की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में प्रति किसान एंबर बॉक्स सब्सिडी कुल $7,253 (534,694 रुपए) अमेरिकी डॉलर है। वहीं दूसरे विकसित देशों की बात करें तो कनाडा में यह $7,414 (546,563 रुपए), इयू (यूरोपीय संघ) में $1,068 (78,733 रुपए) और जापान में 3,482 अमेरकी डॉलर (256,694 रुपए) है। वहीं विकासशील देश भारत में यह सब्सिडी मात्र 49 अमेरिकी डॉलर (3,612 रुपए) की है। फिर भी विकसित देश भारत की सब्सिडी नीतियों का विरोध करते हैं।

कृषि कानून और एमएसपी पर सरकार, किसानों के बीच लगातार वार्ता हो रही है। छठवें दौर की वार्ता 9 दिसंबर को होगी।

एमएसपी अगर कानून बनता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में और क्या दिक्कतें आ सकती हैं? ये समझने के लिए गांव कनेक्शन ने विधिक शोधार्थी और नीति विश्लेषक ( Policy analyst) शालिनी भूटानी से बात की। शालिनी वैश्विक संदर्भ में कृषि कानूनों पर लगातार लिख रही हैं।

वे कहती हैं, "हमारे देश के अंदर नीतिगत जो दिक्कते हैं, वह तो हैं ही साथ विश्वस्तर पर बात करें तो विश्व व्यापार संगठन एमएसपी जैसी नीतियों का हमेशा से विरोध करता रहा है। डब्ल्यूटीओ में शामिल विकसित देश आरोप लगाते हैं कि भारत कृषि क्षेत्र में सीधे सब्सिडी देकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में हस्तक्षेप कर उपज की कीमत को प्रभावित करता है। ऐसे में भारत पर डब्ल्यूटीओ का भारी दबाव है।"

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शालिनी कहती हैं, "ऐसे में सरकार के पास रास्ता यह है कि वे खुद देश में बाजार खड़ा करे। पहले हम अपनी जरूरतें तो पूरी करें। इतनी पैदावार के बाद भी देश में भुखमरी है। अब समय आ गया है कि सरकार के लिए नीति बनाने वाले नीति विश्लेषक कुछ नया सोचें क्योंकि जो विकसित देश हैं वे हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्टैंड नहीं होने देंगे।"

मौजूदा दौर में अंतराराष्ट्रीय स्तर पर होते बदलावों को भारत के संदर्भ में देखते हुए शालिनी कहती हैं, "कोरोना महामारी के बाद आने वाले समय में डब्ल्यूटीओ की नीतियां और भी सख्त हो सकती हैं। अभी तक तो हम यह कहकर बचते रहे हैं कि खाद्य सुरक्षा नीतियों को देखते हम कृषि क्षेत्र को सब्सिडी देना बंद नहीं सकते। ऐसे में एमएसपी को अगर जरूरी कानून बना दिया गया तो निर्यात को लेकर बड़ी मुश्किलें खड़ी होंगी।"

पूंजीपतियों का दबाव?

फाइनेंस एंड इकनॉमिक्‍स थिंक काउंसिल, काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्थापक और अध्यक्ष विक्रांत सिंह देश के प्रतिष्ठित अखबारों में कृषि मुद्दों पर लगातार लिखते हैं। वे कहते हैं, "यह कोई स्वीकार करे या ना करे, भले ही वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र मुनाफा देने वाला न लग रहा हो, लेकिन आने वाला समय इसी का है। ऐसे में इस पर बहुत ध्यान देना चाहिए। एमएसपी को कानूनी बाध्यता बनाने की लड़ाई किसी राजनीतिक पार्टी की नहीं है। जो कांग्रेस आज एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाने की मांग कर रही है, इसी कांग्रेस ने अपने शासनकाल में मुख्यमंत्रियों की सिफारिशों को अस्वीकार करती रही है।"

विक्रांत का मानना है कि एमएसपी का काननू बनाने में सरकार के सामने कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत होगी तो बस पूंजीपतियों को।

वे कहते हैं, "एमएसपी में सबसे बड़ी बाधा की जो बात है तो यह समझ लीजिए समस्या सरकार को नहीं, देश के बड़े पूंजीपतियों को होगी। जब एमसपी को कानूनी मान्यता दे दी जायेगी तो जो खरीदार होंगे, अभी नया कृषि कानून बनने के बाद 700 से ज्यादा पंजीकृत हुए हैं, उनके सामने यह चुनौती आ जायेगी कि अगर कहीं किसान कोर्ट चला गया या उन पर कानूनी कार्यवाही हो गई तब उन्हें परेशानियों को सामना करना पड़ेगा।"

कृषि कानूनों के खिलाफ हजारों की संख्या में किसान 26 नवंबर से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं।

"अभी कोई खरीदार बिहार चला जाये तो कम कीमत में धान खरीदकर महंगे दामों में चावल बेच सकता है, लेकिन कानून बनने के बाद वहां से भी धान एक तय कीमत पर खरीदना होगा। यह किसान को भी पता होगा। ऐसी स्थिति में व्यापारी 25-50 रुपए ही कीमत गिरा पायेगा।" विक्रांत एमएसपी कानून की वकालत करते हुए यह भी कहते हैं कि सरकार किसानों को विश्वास नहीं दिला पा रही है और किसान कृषि कानून आने के बाद डरे हुए हैं कि कहीं MSP की व्यवस्था ही न खत्म हो जाये। इसीलिए किसान सरकार से लिखित आश्वासन भी चाहते हैं।

किसानों का यह डर गांव कनेक्शन के सर्वे 'द इंडियन फार्मर परसेप्शन ऑफ न्यू एग्री बिल्स' में दिखा था। गांव कनेक्शन के रूरल इनसाइट विंग ने देश के 16 राज्यों के 53 जिलों में 5,022 किसानों के बीच रैपिड सर्वे कराया। रैपिड सर्वे में मार्जिंन ऑफ एरर 5 फीसदी है।

तीन अक्टूबर से 9 अक्टूबर 2020 के बीच हुए इस फेस टू फेस सर्वे में किसानों से कृषि कानूनों, मंडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि अध्यादेशों के प्रभाव, किसानों आशंकाओं, उनके पास जोत, फसल उगाने से लेकर केंद्र सरकार और राज्यों सरकार के फैसलों से लेकर कृषि से आमदनी और भविष्य के फैसलों आदि को लेकर सवाल किए गए थे।

सर्वे में शामिल हुए आधे से ज्यादा (59%) किसानों ने कहा है कि एमएसपी पर अनिवार्य कानून बनना चाहिये] जबकि 39% किसानों को डर है कि नए कृषि कानून आने के बाद भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार फसलें खरीदना बंद कर देगी और एमएसपी व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी।

विक्रांत सरकार पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि दरअसल हमारी अर्थव्यवस्था एक तरह की मोनोपोली कह तरफ बढ़ रही है, जहां सब कुछ, कुछ लोगों के ही हाथ में होगा।

वे कहते हैं, "गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने एक रिपोर्ट तत्कालीन पीएम डॉ. मनमोहन सिंह को सौंपी थी। तब उन्होंने भी एमएसपी पर कानून बनाने की मांग की थी। मोदी सरकार में ही सीएसीपी ने भी मांग की थी कि एमएसपी को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए, अगर हम किसानों की आय दोगुनी करना चाहते हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि भारत की अर्थव्यव्स्था एक तरह की मोनोपॉली की तरफ बढ़ रही है। टेलीकॉम, आईटी सेक्टर या लॉजिस्टिक सेक्टर, ये सब एक दो व्यापारिक घरानों के हाथ में होगा। अमरिका में भी ऐसा ही। कुछ व्यापारिक घराने सब कुछ नियंत्रित करते हैं।"

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विक्रांत के मुताबिक सरकार देश के बड़े कारोबारियों के लिए एमएसपी पर किसानों की बात नहीं मान रही। वे आरोप लगाते हुए कहते हैं, "सरकार के सामने दबाव है। ये दबाव बड़े लोगों का है कि अगर एमएसपी पर कानून बनता है तो हमें नुकसान होगा। यह भी जानना चाहिए कि आखिर किसान ये कानून क्यों चाहते हैं। किसानों को एमएसपी न मिलने से हर साल करोड़ों रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। किसानों की सबसे बुनियादी जरूरत ही यही है कि उन्हें एक निश्चित तय कीमत मिले।"

"एमएसपी पर अगर कानून बनता है तो इससे किसानों को कोई नुकसान नहीं होने वाला। सरकार तो आज भी कीमत दे ही रही है, ये तो बिचौलिए हैं जो सरकार का पैसा खा रहे हैं। अगर कानून बन जायेगा तो किसानों को पैसा निश्चित रूप से मिलने लगेगा। अगर कानून बनता है तो हो सकता है कि आने वाले समय में MSP का लाभ जो अभी 6 फीसदी किसानों को ही मिलता है, यह संख्या बढ़कर 50 फीसदी तक पहुंच सकती है।"

आर्थिक सहयोग विकास संगठन और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (OECD-ICAIR) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2017 के बीच किसानों को उत्पाद का सही मूल्य न मिल पाने के कारण 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

अपनी बात खत्म करते हुए विक्रांत कहते हैं, "जो कवायद सरकार आज कर रही है, यह 40-50 साल बाद होना चाहिए। आज जरूरत है अधिक से अधिक कृषि मंडियों का निर्माण हो। स्वामीनाथ आयोग की रिपोर्ट कहती है कि हर पांच किलोमीटर के क्षेत्र में एक मंडी होनी चाहिए। इससे भी सार्थक बदलाव आएंगे।"

संयुक्त किसान मोर्चा के किसान नेता अपनी मांगों को लेकर अड़े हुए हैं।

देश के प्रख्यात खाद्य एवं निर्यात नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा भी कहते हैं कि नये कानूनों को देखकर लगता है कि कृषि क्षेत्र को बड़ी कंपनियों के हाथों में देने की तैयारी हो रही है।

वे कहते हैं, "सबसे बड़ा तो सवाल यह है कि देश के बड़े अर्थशास्त्री इसे कानून बनाने पर बात क्यों नहीं कर रहे हैं? सही बात तो यह है कि सरकार को इस बारे में सही जानकारी दी ही नहीं जा रही। हम दूसरे देशों के नियम को फॉलो करते हैं। विश्व व्यापार संगठन की बैठक में यह हर बार चर्चा होती है कि अमीर देश कृषि पर कितना सब्सिडी देते हैं, जबकि भारत का विरोध करने वाले देश खुद अपने देश में भारी भरकम सब्सिडी देते हैं। अमेरिका की मात्र डेढ़ फीसदी आबादी कृषि से जुड़ी हुई है, फिर भी उसके ऊपर 425 बिलियन डॉलर (425,000,000,000 रुपए) का कर्ज है।"

देविंदर शर्मा उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे अमेरिका के डेयरी सेक्टर पर कुछ कंपनियों का कब्जा हो गया है। वे कहते हैं, "अमेरिका के डेयरी सेक्टर को देखिए। वहां पिछले 10 वर्षों में 17,000 डेयरी फॉर्म बंद हो चुके हैं। वर्ष 1970 के बाद 93% डेयरी फॉर्म बंद हुए हैं अमेरिका में, फिर भी उनका दूध का उत्पादन हर साल बढ़ता जा रहा है, क्यों? क्योंकि कॉरपोरेट ने टेकओवर कर लिया। पूरा कारोबार बड़ी कंपनियों के हाथ में है। यही हाल हमारे देश में होगा।"

"यह कहने वाली बात नहीं है, लेकिन सब जानते हैं कि सरकार किसके दबाव में है। सरकार एमएसपी को कानूनी मान्यता नहीं दे रही है तो उसका एक मात्र कारण यही है। राजनीति पार्टियों को दोष देने का मतलब नहीं है। उन्हें तो फिर पांच साल बाद चुनाव लड़ना है।" वे आगे कहते हैं।

हल क्या है?

पिछले दिनों गांव कनेक्शन के शो गांव कैफै में आए बिजनेस स्टैंडर्ड एग्रीकल्चर संपादक संजीब मुखर्जी को लगता है कि एमएसपी को कानूनी बाध्यता देना इतना आसान नहीं है। वे कहते हैं, "हमारे सामने कई उदाहरण हैं। हमने पिछले के सालों में देखा था कि कैसे जब महाराष्ट्र सरकार अपने यहां कहा था कि सोयाबीन की खरीद एक निश्चित कीमत से कम में नहीं होगी। इसके बाद व्यापारियों ने खरीद ही कम कर दी।"


"बातचीत के बाद एक निश्चित गुणवत्ता वाली उपज खरीद पर सहमति बनी। व्यापारियों ने अच्छी क्वालिटी का सोयाबीन खरीद लिया, उससे कम क्वालिटी वाला सोयाबीन किसानों के मत्थे आ गया। उसे किसी ने खरीदा ही नहीं। अब इस समस्या का हल यह है सरकार एमएसपी पर फिर से विचार करे और तय करें कि इसकी जरूरत किन-किन फसलों के लिए है।" संजीब कहते हैं।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के कृषि अर्थशास्त्र विभाग से रिटायर प्रोफेसर चंद्रसेन कहते हैं, "देश में 85 फीसदी ऐसे किसान हैं जिनके पास पांच एकड़ से कम खेत है। ऐसे में इन्हें भी ध्यान में रखना होगा। एमएसपी पर कानून बन भी जाये, समस्या का समाधान तब भी नहीं होगा और कृषि कानून सरकार वापस ले ले, इसके आसार भी कम हैं। ऐसे में एक हल यह हो सकता है कि सरकार किसान सम्मान निधि योजना की तरह सीधे किसानों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं पर विचार करे या फिर किसान सम्मान निधि का ही बजट बढ़ा दे।"

चंद्रसेन अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, " किसान सम्मान निधि की तरह योजना के दो फायदे होंगे, एक तो बाजार में भाव स्थित रहेगा और किसानों को लाभ भी पहुंचता रहेगा। विश्व व्यापार संगठन में भी बात नहीं बिगड़ेगी। इसके अलावा किसानों को भी धान या गेहूं के अलावा मांग के अनुसार खेती करने की जरूरत है। किसानों को बाजार समझना होगा।"

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