सुख और समृद्धि के त्योहार दिवाली पर क्यों खतरे में है उल्लुओं की जान ?

Mithilesh DharMithilesh Dhar   3 Nov 2018 1:17 PM GMT

सुख और समृद्धि के त्योहार दिवाली पर क्यों खतरे में है उल्लुओं की जान ?डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया

लखनऊ। सुख, शांति और समृद्धि के पावन पर्व दिवाली के मौके पर लाखों श्रद्धालु जहां उल्लू पर सवार देवी लक्ष्मी की पूजा अर्चना करते हैं तो वहीं कुछ अंधविश्वासी ज्यादा धन और वैभव के लालच में इस दुर्लभ वन्यजीव की बलि चढ़ाने से नहीं चूकते। इसी को देखते हुए वन्यजीव व्यापार निगरानी नेटवर्क ट्रैफिक ने इनकी बलि और तश्करी रोकने की गुहार लगाई है।

विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के तहत संचालित कार्यक्रम विभाग ट्रैफिक इंडिया ने अपनी वेबसाइट पर एक एडवाइजरी जारी कर उल्लुओं पर हो रहे अत्याचार की ओर सबका ध्यान खींचने का प्रयास किया है। इसमें लिखा है कि देश में दिवाली उत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं और दिवाली पर तांत्रिक क्रियाओं के लिए बड़ी संख्या में उल्लुओं को पकड़ा जा रहा है।

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दुनियाभर में उल्लुओं की 200 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं, इसमें से लगभग 30 प्रजातियां भारत में हैं। लेकिन भारत में इन प्रजातियों पर खतरा मंडरा रहा है। भारत में गैर कानूनी तरीके से उल्लुओं के व्यापार पर प्रकाशित रिपोर्ट इंपीरल्ड कस्टोडियन्स आफ द नाइट के आधार पर ट्रैफिक ने बयान जारी करते हुए कहा कि उल्लुओं का उपयोग और व्यापार कई कारणों से होता है जिसमें काला जादू, सड़क पर प्रदर्शन, चर्म प्रसाधन या चिड़ियाघर, भोजन, देसी दवा बनाना, अन्य पक्षियों को पकड़ना, पंजे और पंखों का इस्तेमाल शामिल है। इसमें कहा गया कि दीवाली के आसपास विशेष तौर से उत्तर भारत में उल्लुओं को गैर कानूनी रूप से पकड़ने और व्यापार में काफी तेजी आ जाती है।

इस बारे में ट्रैफिक के इंडिया हेड डॉ साकेत बडोला (भारतीय वन सेवा) ने गांव कनेक्शन को बताया " ट्रैफिक की सलाह को एक मजबूत सलाह के रूप में लेना चाहिए। हमारा प्रयास है कि उल्लू आवास, वन क्षेत्रों और पक्षी व्यापार बाजारों के आसपास वन्यजीव कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लोग सक्रिय हो जाएं और इस पक्षी को बचाने में हमारी मदद करें, लोगों को जागरूक करें कि इस खुशी के त्योहार पर किसी की लान लेना अच्छी बात तो नहीं।"

साकेत आगे बताते हैं कि उल्लुओं की बलि दशहरा से शुरू हो जाती है। दिवाली आते-आते इनकी मांग बाजार में बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। शिकारी इनकी तलाश में निकल जाते हैं और इनके आवासों की तलाश शुरू कर देते हैं।"

भारतीय वन्य जीव अधिनियम 1972 की अनुसूची-एक के तहत उल्लू संरक्षित हैं। ये विलुप्त प्राय जीवों की श्रेणी में दर्ज है। इनके शिकार या तस्करी करने पर कम से कम तीन वर्ष या उससे अधिक सजा का प्रावधान है। रॉक आउल, ब्राउन फिश आउल, डस्की आउल, बॉर्न आउल, कोलार्ड स्कॉप्स, मोटल्ड वुड आउल, यूरेशियन आउल, ग्रेट होंड आउल, मोटल्ड आउल विलुप्त प्रजाति के रूप में चिह्नित हैं।

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इंपीरल्ड कस्टोडियन्स आफ द नाइट की रिपोर्ट में बताया गया है देश में पाई जाने वाली उल्लुओं की 30 प्रजातियों में से 15 की अवैध ट्रैफिकिंग होती है। देश के उत्तरी क्षेत्र में काला जादू और तंत्र-मंत्र के लिए सबसे ज्यादा शिकार किया जाता है। उल्लूओं का सबसे ज्यादा शिकार उत्तर प्रदेश में होता है।

2010 में जारी इस रिपोर्ट में देश के उन बाजारों को भी चिन्हित किया गया है जहां उल्लुओं का अवैध कारोबार होता है। बिहार की राजधानी पटना के मिर्सीकार टोली, रांची के कांटा टोली, वाराणसी के बहेलिया टोली, लखनऊ में चौक बाजार, नख्खाश, मुरादाबाद के भूड़ चौराहा, प्रयागराज के नख्खाश कोना, मेरठ के कुमार मोहल्ला, अंबाला के चिड़ीमार मोहल्ला, हैदराबाद के महबूब चौक, दिल्ली के चिड़िया बाजार, जामा मस्जिद और लाल किले के सामने, अहमदाबाद के वागरी बस्ती, मुंबई के एमजे फुले बाजार, भोपाल के जहांगिरबाद, कोलकाता के मटिया ब्रिज और नरकुल डंगा, कटक के थोरिया शाही, बैंगलोर के रसेल मार्केट, चेन्नई के ओल्ड आयरन बाजार, मदुरै के तमिल संगम मार्केट, रायपुर के गुड़ियारी और जयपुर के शिकारी बस्ती में उल्लुओं का अवैध कारोबार बड़े पैमाने पर होता।

उल्लू पारिस्थितिकी प्रणालियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और किसानों की उपज को उन नुकसानदायक कीटों से भी बचाते हैं जो फसल बर्बाद करते हैं। ऐसे में उल्लू की उच्च पारिस्थितिक, आर्थिक और सामाजिक महत्ता बहुत ज्यादा है।


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