इसलिए आपके बच्चे होते जा रहे हैं हिंसक

इसलिए आपके बच्चे होते जा रहे हैं हिंसकबच्चों के व्यवहार पर ध्यान दें। 

दिल्ली के गुरुग्राम में प्रदुम्मन की हत्या करने वाला 11 वीं का छात्र था और 16 जनवरी को लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल में कक्षा एक के छात्र को चाकू मारने वाली कक्षा सात की एक छात्रा। ये दोनों ही केस हमें ये साेचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर बच्चों में इतनी हिंसात्मक प्रवृत्ति आ कहां से रही हैं कि वो छोटी छोटी बातों के लिए अब किसी को जान से भी मार सकते हैं।

कक्षा 11 में पढ़ने वाला यथार्थ छोटी छोटी बातों पर घर का सामान तोड़ने लगता है। रेल की पटरी के नीचे कटने की धमकी देता है। क्या ये व्यवहार सामान्य हैं। यथार्थ की मां बताती हैं, “जब भी हम उसे किसी चीज के लिए डांटते हैं तो वो ऐसी हरकतें करता है कि हम खुद डर जाएं। दो तीन बार वो घर से भाग चुका है पूरा दिन हम उसे ढृढ़ते रहते हैं। डर लगता कहीं कुछ कर न लें।”

बच्चों में बढ़ रही इस हिंसक प्रवृत्ति के बारे में इस तरह की जो घटनाएं होती हैं उसके पीछे शिक्षा व्यवस्था व अभिवावक दोनों ही कहीं न कहीं दोषी हैं। इस बारे में लखनऊ की मनोवैज्ञानिक डॉ नेहा आनंद बताती हैं, “आजकल के समय में बच्चों पर पढ़ाई को लेकर जो प्रेशर है, वो उनपर हावी हो रहा है। अब ज्यादातर मां बाप दोनों नौकरीपेशा हैं तो जब बच्चा स्कूल से घर आया तो मां या बाप दोनों में उसके साथ कोई नहीं है। ऐसे में वो टीवी देखेगा, गेम खेलेगा, उसमें वो क्या देख रहा है इसपर भी ध्यान देना वाला कोई नहीं है। तो इसका असर भी पड़ता है।

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वो बताती हैं कि दूसरी बात ये भी है कि आजकल माता पिता व बच्चों में जो लूप आ रहा है। वो एक दूसरे की बात ही नहीं समझ रहे मां बाप भी उन्हें बैठाकर कभी ये नहीं पूछते कि दिक्कत कहां आ रही है। तीसरी बात ये भी है कि बच्चे जो देखेते हैं वो सीखते हैं हमारे यहां गुस्से को जाहिर करने का तरीका चिल्लाना, मारना पीटना है। तो जब बच्चे मां बाप को लड़ते देखते हैं तो वो भी आगे वही करते हैं।

हमें बच्चों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। अभी अक्सर हम देखते हैं कि जब स्कूल में पेरेंटस मीटिंग होती है तो अभिवावक और टीचर सिर्फ इस बारे में बात कर रहे होते हैं कि बच्चे के कितने नम्बर आ रहे हैं, वो 90 प्रतिशत क्यों नहीं ला पा रहा। हम कभी इस बारे में बात नहीं करते हैं कि वो किस तरह के खेल पसंद कर रहा है, किस तरह के सीरियल ज्यादा देख रहा है, उसका व्यवहार कैसा है। वो छोटी छोटी बातों पर आक्रामक क्यों हो रहा है। अगर ये शुरुआती लक्षण पता चल जाएं तो उनकी सही समय पर काउंसलिंग हो सकती है।

लखनऊ के इस केस में जिस लड़की ने बच्चे को मारने की कोशिश की थी उसके बारे में एसएसपी दीपक कुमार ने बताया कि पूछताछ में पता चला कि वो लड़की पहले भी दो बार घर से भाग चुकी है, एक बार पैसे लेकर भी गायब हुई। ऐसी स्थिति में अबर उसके इस व्यवहार को नजरअंदाज न किया जाता तो शायद इतनी बड़ी घटना न होती।

टीवी व सीरियल बच्चे के दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। इस बारे में जापान की टोकियावा यूनिवर्सिटी से विक्टमोलॉजी पर अध्ययन करने करने वाली अपराध मनोवैज्ञानिक डॉ. अनुजा कपूर बताती हैं, “आजकल जो सीरियल आते हैं क्राइम से जुड़े उसमें सबकुछ करके दिखाया जाता है, कैसे चाकू पकड़ा कैसा भोंपा, इसके साथ ही हमारी इंडस्ट्री विलेन को भी मूवी में इस तरह दिखाती है कि बच्चे उससे भी प्रभावित हो जाते हैं। उसकी तरह बनना चाहते हैं।”

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वो आगे बताती हैं,“चोरी व हत्या करने के बेहतरीन तरीके उन्हें टीवी ही सिखाता है। तो मां बाप को इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि उनका बच्चा किस तरह की चीजें देखना पसंद करता है। अगर वो मोबाइल में कुछ देखता है तो बाद में हिस्ट्री चेक करें।”

आक्रामक खिलौनों व गेम का भी पड़ता है असर

आजकल ऑनलाइन गेम्स बच्चों के दिल और दिमाग पर हावी होते जा रहे हैं। उनको लगता है कि यही वास्तविक दुनिया है। इस बीच अगर उनके मन मुताबिक कुछ ना हो तो वे चिड़चिड़े और हिंसात्मक हो जाते हैं। आजकल के इन आनलाइन गेम्स में मारधाड़ होती है जो बच्चों को पसंद आ रही है। डॉ नेहा आनंद बताती हैं, पहले बच्चे पार्क में या बाहर खेलते थे ऐसे में आपस में उनमें सौहार्द की भावना बढ़ती थी अब वो घरों में कैद होकर मोबाइल पर ही खेलते हैं, इसका भी बुरा असर पड़ता है।

ऑनलाइन गेम भी आक्रामक ।

बेमतलब के सिलेबस के बोझ तले दब रहे बच्चे

हम नई तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं। पढ़ाई में भी नए नए गैजेट का इस्तेमाल कर रहे हैं ये हम विदेशों के चलन को अपना रहे हैं लेकिन वहां पर बच्चों को तीन से चार विषय ही पढ़ाए जाते हैं और यहां क्लास एक से हम कंम्प्यूटर, इतिहास, भूगोल सब पढ़ाने लगते हैं तो उसकी जरूरत क्या है वो बच्चे पर सिर्फ अतिरिक्त दबाव डालते हैं।

बच्चों को न भी कहें

अक्सर मां बाप प्यार व दुलार में बच्चे की हर मांग पूरी करते हैं, ये तरीका गलत है। लखनऊ की मनोचिकित्सक डॉ शाजिया सिद्दिकी बताती हैं, “बच्चों में ये आदत न डालें कि वो जो मांगें वो तुरंत उन्हें दे दें। कभी कभार उन्हें मना भी करेें जिससे वो न को भी स्वीकार कर सकें। आजकल के बच्चों को न सुनने की आदत नहीं हैं यही कारण है कि जब को उन्हें किसी चीज के लिए मना करता है तो वो अपना काबू खो देते हैं। ”

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Tags:    education system 
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