बच्चों के लिए क्यों जरूरी है ट्यूशन की बैसाखी

बच्चों के लिए क्यों जरूरी है ट्यूशन की बैसाखीप्राइेवट ट्यूशन क्यों बन रहे जरूरी।

प्राइवेट ट्यूशन छात्रों की पढ़ाई का बोझ व तनाव दोनों ही बढ़ा रहे हैं। अच्छे से अच्छे निजी स्कूल में पढ़ने के बाद भी बच्चों को ट्यूशन व कोचिंग करने का चलन बढ़ता ही जा रहा है। ये जहां बच्चों पर असर डालता है वहीं अभिवावकों की आय पर जोरदार चपत भी लगाता है।

लखनऊ के रहने वाले राजीव कुमार की आय का लगभग एक चौथाई भाग बच्चों के स्कूल की फीस ट्यूशन में खर्च हो जाती है। राजीव एक मेडिकल कंपनी में कार्यरत हैं। वो बताते हैं, “मेरे दो बच्चे हैं एक तीसरी कक्षा में और दूसरा पांचवीं। दोनों की हर महीने स्कूल की फीस सात हजार बैठती है। इसके बाद भी ट्यूशन पढ़ाना पड़ता है जिसकी भी अच्छी खासी फीस देनी पड़ती है।”

हाल ही में जारी हुई यूनेस्को की वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट में भारतीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी कुछ खामियां बताई गई हैं। इस रिपोर्ट में ट्यूशन को भारतीय शिक्षा के लिए एक खतरा बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट ट्यूशन बच्चों की फीस के साथ उनका पढ़ाई का बोझ व तनाव भी पढ़ाते हैं। ये रिपार्ट शिक्षा की असमानता को दिखाती है। रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट ट्यूशन का चलन शहरी परिवारों के विकसित घरों में ज्यादा है।

परिवार की आय का 12 फीसद ट्यूशन में

भारत में शिक्षा की स्थिति पर एनएसएसओ ने एक सर्वे वर्ष 2014 में 66 हजार घरों में किया। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी ट्यूशन या कोचिंग का सहारा लेने वालों में 4.1 करोड़ छात्र हैं और तीन करोड़ छात्राएं। रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार की कुल आय का 11 से 12 फीसदी निजी ट्यूशन पर खर्च होता है। कुछ मामलों में यह रकम 25 फीसदी तक है।

शिक्षा की गिरती गुणवत्ता

लगातार बढ़ती प्राइवेट कोचिंग सेंटर की दुकानों का एक कारण यह भी है कि लगातार शिक्षा व्यवस्था का स्तर गिर रहा है। इस बारे में लखनऊ की शिक्षाविद् डॉ मधुबाला सिंह बताती हैं, “पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है ग्रामीण क्षेत्रों में तो खासकर। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर मजाक होता है ये आप सभी जानते हैं ऐसे में प्राइवेट कोचिंग ही सहारा बन रही है। अगर स्कूलों में ही सही से पए़ाई हो तो इसकी जरूरत ही न पड़े।” वो आगे बताती हैं, “दूसरा मां बाप बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं कि उनको फलाने से ज्यादा नम्बर लाने ही लाने हैं ऐसे में वो खुद उन्हें कोचिंग की तरफ ढकलेते हैं। ऐसे में बच्चे के ऊपर तनाव बढ़ता ही जाता है और उसे सेल्फ स्टडी का समय ही नहीं मिलता जो सबसे ज्यादा जरूरी है।”

बच्चों का बढ़ रहा तनाव।

लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अभिभावकों के पास समय का अभाव

हर अभिवावक को अपने बच्चे की भविष्य की चिंता रहती है। धीरे-धीरे हर क्षेत्र में कंपटिशन लगातार बढ़ रहा है। भारतीय शिक्षा प्रणाली के अनुसार अच्छी नौकरी के लिए परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा अंक लाना भी जरूरी है जिसके चलते हर अभिवावक अपने बच्चे पर अतिरिक्त दबाव डालता है, उसे अच्छी से अच्छी कोचिंग व ट्यूशन कराता है जिससे वो अधिकतम अंक ला सके।

लखनऊ के इंदिरानगर में रहने वाले अजय कुमार तिवारी (42वर्ष) बताते हैं, "स्कूलों में एक एक क्लास में इतने बच्चे होते हैं कि सिर्फ वहां की पढ़ाई के भरोसे अच्छे नंबर लाना संभव नहीं है और हमारे पास इतना समय नहीं है कि उन्हें घर पर टाइम दे सकें इसलिए निजी ट्यूशन रखना हमारी मजबूरी है।”

हर बच्चे को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने की चाह कोचिंग को दे रही बढ़ावा

लखनऊ के निजी स्कूल की अध्यापिका आंकाक्षा द्विवेदी बताती हैं, "हर मां-बाप अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहता है और कक्षाओं में कम से कम 70 से 80 छात्र होते हैं, ऐसे में वह कहते हैं कि खासकर सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में अमूमन सौ से ज्यादा छात्र होते हैं तो इसलिए वो उनका बच्चा उनके रिश्तेदारों व आसपास के बच्चों से आगे रहें इसलिए वो ट्यूशन पढ़ाते हैं।”

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आर्थिक विषमता का शिक्षा पर असर

उच्च शिक्षा में अभी भी बहुत बड़ा फर्क दिखता है। बेहतरीन गुणवत्ता वाले संस्थानों तक पहुंचने में भी बहुत फासला है और भारत में ये शिक्षा के लिए भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर है। रिपोर्ट बताती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि जांच परीक्षाओं के जरिये कमजोर बच्चों की क्षमता को आंका जाता है। ये बच्चों के सीखने पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और उन्हे अपमान के तौर पर दंडित करता है। रिपोर्ट बताती है कि स्कूलों में होने वाली जांच विद्यार्थियों के लिए तनाव पैदा करती है। और उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को तोड़ देती है। इंडियन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2015 में 2,672 छात्रों ने परीक्षा में फेल होने के बाद आत्महत्या कर ली।

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