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झारखंड : गाँव और आदिवासियों को नज़रअंदाज करना रघुबर सरकार को पड़ा भारी

हेमंत सोरेने ने की जल, जंगल और ज़मीन की बात, झारखंड में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के बाद आदिवासियों में भाजपा सरकार को लेकर पैदा हुआ डर

Manish MishraManish Mishra   23 Dec 2019 12:30 PM GMT

झारखंड : गाँव और आदिवासियों को नज़रअंदाज करना रघुबर सरकार को पड़ा भारी

लखनऊ। झारखंड ग्रामीणों और आदिवासियों में बीजेपी के प्रति पैदा हुआ अविश्वास उसकी हार का बहुत बड़ा कारण बना। जल, जंगल और ज़मीन के मुद्दे को भुनाने में हेमंत सोरेन की पार्टी कामयाब रही।

झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की अगुवाई में बना गठबंधन राज्य की 81 सीटों में से 46 (खबर लिखे जाने तक) जीत कर सरकार बनाने जा रहा है। इस गठबंधन ने जेएमएम नेता हेमंत सोरेन को पहले ही मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर रखा है।

इस चुनाव परिणामों से खुश झारखंड के लातेहार की आदिवासी सुनीता देवी फोन पर कहती हैं, "हमने देखा कि पिछले पांच साल से सिर्फ अमीरों को ही देखा जा रहा था, पूंजीपतियों को ही सहूलियतें दी जा रही थीं। जो आादिवासी वर्षों से जिस ज़मीन पर रहते थे, उसे लैंड बैंक बना दिया गया। बाहर के पूंजीपतियों को भेजकर कारखाने लगवा दिए।"

बिहार में शराबबंदी के बाद झारखंड में फैक्ट्रियों के खुलने और सरकार द्वारा शराब बेचे जाने का फैसला भी गाँवों की महिलाओं को नाराज कर गया। "अब अगर गाँव-गाँव शराब की दुकानें खुलेंगी तो पुरुष जाकर नशा करेंगे ही, हमारा घर तबाह होगा," सुनीता देवी ने कहा।

रघुबर दास सरकार के इन्हीं कार्यों की लोगों में नाराजगी का फायदा जेएमएम और कांग्रेस ने उठाया। अपने चुनावी रैलियों में हेमंत सोरेने आदिवासियों के हित साधते हुए जल, जंगल और ज़मीन की बात की और भरोसा जीतने में कामयाब रहे।

झारखंड में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के खिलाफ आदिवासियों ने काफी जोर-शोर से विरोध किया। इसका खामियाजा भी रघुबर दास सरकार को भुगतना पड़ा।

इस बारे में झारखंड में रहने वाले पत्रकार असगर खान कहते हैं, "आदिवासियों को भय था कि लैंड बैंक के लिए उनकी ज़मीने लेकर पूंजीपतियों को दे देंगे। इसे गोड्डा में अडानी वाले मामले में विरोध को देखा जा सकता है।"

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में कुल जनसंख्या का 26 प्रतिशत आदिवासी और जनजातीय लोग हैं, और राज्य में 32 जनजातियां हैं।

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जेएमएम गठबंधन की जीत और बीजेपी की हार के कारण गिनाते हुए झारखंड में हिन्दुस्तान के एडिटर रहे विजय मूर्ति कहते हैं, "बीजेपी की हार के तीन मुख्य कारण रहे-1. मुख्यमंत्री रघुबरदास का अहंकार, 2. गलत उम्मीदवारों का चुनाव 3. बीजेपी और आसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन) अलग-अलग चुनाव लड़ना।"

आदिवासियों को नज़रअंदाज करना विजय मूर्ति भी मानते हैं, "रघुबर दास से तो आरएसएस और बीजेपी के लोग ही नाराज थे। वही नहीं चाहते थे कि रघुबर दास दोबारा सीएम बनें।"

अगले साल 2020 में झारखंड राज्य बने बीस साल हो जाएंगे। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता राज्य पर हावी रही। इन दस सालों में 10 बार मुख्यमंत्रियों ने शपथ ली तो तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा। रघुबरदास अगुवाई में भाजपा की स्थाई सरकार से लोगों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन भरोसा जीतने में रघुबरदास नाकाम रहे।

अपनी चुनावी रैलियों में हेमंत सोरेन लगातार एसएसीएटी कानून में छेड़छाड़, खाद्य वितरण प्रणाली में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (लाभार्थी के खाते में सीधे ट्रांसफर) आदि का मुद्दा जोरशोर से उठाते रहे हैं। हेमंत सोरेन ने सरकार द्वारा शराब बेचे जाने का भी मुद्दा उठाया और राज्य में बिहार की तर्ज पर शराब बंदी की बात भी जोरशोर से उठाई।

रघुबर सरकार द्वारा पैरा टीचर्स पर लाठीचार्ज और शिक्षकों की नियुक्ति में स्थानीय लोगों को वरीयता न देना भी भारी पड़ा। रामगढ़ जिले के कुंदरू गाँव में रहने वाले पन्नालाल फोनस पर कहते हैं, "पूरे प्रदेश में करीब 84,000 पैरा टीचर हैं, ये अपने नियमितीकरण की मांग कर रहे थे लेकिन सरकार ने लाठीचार्ज करके इनका गुस्सा बढ़ा दिया। यहीं नहीं, 8000 से 9000 लोगों को जेल में ठूस दिया।"

यही बात वरिष्ठ पत्रकार विजय मूर्ति भी कहते हैं, "रघुबर सरकार के कामकाज से हर कोई नाखुश था।"


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