हाथी मेरे साथी : कान्हा की धरती पर होती है हाथियों की सेवा

हाथी मेरे साथी : कान्हा की धरती पर होती है  हाथियों की सेवायहां हाथी खुले में घूमते हैं.. पढ़िए खास ख़बर। फोटो- दिति बाजपेई

मथुरा। पिछले पचास वर्षों से राजू (हाथी) इलाहाबाद में संगम के किनारे करतब दिखाकर अपने महावत के परिवार का खर्चा चलाता था। बदले में मालिक ने उसके एक पैर को लोहे की मोटी जंजीर से बांध रखा था, जिससे उसके पैर में घाव हो गया था। काफी इलाज के बाद भी राजू ठीक से चल नहीं पाता। यह स्थिति राजू की नहीं बल्कि तमाम हाथियों की हैं। जंगल, पार्टी, रैलियों,सर्कस और चिड़ियाघरों में सताए ऐसे हाथियों को उत्तर प्रदेश के मथुरा में रख कर उनकी देखभाल की जा रही है।

''भारत के वनों में रहने वाले वन्यजीव खतरे में है चाहे वो शेर हो या हाथी इनका शिकार लगातार बढ़ता जा रहा है। हमारा संस्था का प्रयास इन्हें बचाना है। अभी मथुरा के केंद्र में 14 हथिनी और सात हाथी है। और आगरा के भालू संरक्षण केंद्र में 150 भालूओं का इलाज हो रहा है।'' मथुरा में चुरमुरा स्थित हाथी संरक्षण केंद्र (वाइल्ड लाइफ एसओएस ) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. बैजू राज बताते हैं।

मथुरा का हाथी संरक्षण केंद्र लगभग 50 एकड़ में बना हुआ है, यहां पर फिलहाल 21 हाथी हैं, इस केंद्र और हाथियों की देखभाल के लिए 50 कर्मचारियों का स्टाफ भी तैनात है। वो आगे बताते हैं, “''हमारी संस्था के पूरे भारत में 11 केंद्र है, जहां पर बूढ़े और बीमार वन्यजीवों को रखकर नया जीवन देने का काम किया जा रहा है। इसके लिए सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली है लेकिन वन्यजीवो को रखने के लिए जगह और जिस राज्य में रेस्क्यू करते है उस राज्य के वन विभाग हमारी पूरी मदद करता है। ''

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पिछले कई वर्षों से वन्यजीवों का संरक्षण और पर्यावरण को बचाने के लिए गैर सरकारी संगठन वाइल्ड लाइफ एसओएस कर रही काम।

वर्ष 1995 से वन्यजीवों का संरक्षण और पर्यावरण को बचाने के लिए गैर सरकारी संगठन वाइल्ड लाइफ एसओएस काम कर रहा है। इस संस्था के पूरे भारत में चार ब्लैक भालू, एक हिमालयन भालू, एक तेंदुए और दो हाथी केंद्र बने हुए है जहां पर इन वन्यजीवों को रखकर उनकी देखभाल की जाती है। जब इस संस्था ने काम शुरु किया था तब यह एक छोटा सा समूह था लेकिन आज ये पूरे भारत में बड़े स्तर पर काम कर रहा है।

मथुरा जिले के चुरमरा में स्थित हाथी संरक्षण केंद्र।

हाथियों के रोजाना की खुराक के बारे में केंद्र की ऐजुकेशनल ऑफिसर मधुमती शाडिल्य बताती हैं, ''एक हाथी पर रोजाना तीन हजार रूपए का खर्चा आता है। इनके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा जाता है। रोजाना गन्ना, फल, बरसीम, दलिया दिया जाता है। सर्दियों में बीमार न पड़े इसके लिए टिन शेड बनाए गए हैं, जो तीनों तरफ से कवर्ड हैं। रात में सभी हाथियों के ऊपर कंबल डाले जाते हैं।''

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हाथियों की दिनचर्या के बारे में मधुमती बताती हैं, ''सुबह पांच बजे इनको दिया जाता है। सात बजे ये सभी टहलने के लिए जाते है। 11 बजे इन सभी को नहलाया जाता है। उसके बाद इन्हें फल दिया जाता है। तीन बजे तक आराम करने के बाद इनको फिर टहलाने के लिए ले जाया जाता है। शाम को छह बजे खाना देने के बाद ये बाड़े में ही रहते है। सभी हाथियों के लिए अलग-अलग बाड़े बनाए गए है।''

शाम की सैर के लिए जाते फूलकली और लाकी।

पिछले 15 वर्षों से बीमार हाथियों का उपचार कर रहे डॉ ईलाय राजा बताते हैं, ''केंद्र में जितने भी हाथी है उनके मालिकों द्ववारा उन्हें बहुत सताया गया है। सर्कस से आए हाथियों के नाखूनों की हालत बहुत खराब है। जब से केंद्र शुरू हुआ है तब से पशुओं का इलाज किया जा रहा है। तब जाकर उनमें सुधार आया है। '' हाथी संरक्षण केंद्र में तीन डॉक्टर है जिनकी निगरानी में इन सभी हाथियों को रखा जा रहा है।

सुझाव के बारे में बैजू राज बताते हैं,'' वन्यजीवों को बचाने के लिए जागरूकता बहुत जरुरी है। सोशल मीडिया में वन्यजीवों के साथ होने वाली क्रूरता के वीडियों शेयर होते है उनको लेकर भी कोई कार्रवाई नहीं होती है। लोग मजे से देखते है। इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा। स्कूलों में इसके लिए अलग से पाठ्यक्रम होना चाहिए। ताकि लोग जाने और वन्यजीवों के साथ होने वाली क्रूरता को रोका जा सके।''

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चंचल को मिला नया जीवन

बैजू राज बताते हैं,''चंचल (हाथी) और उसके एक और साथी को यूपी से दिल्ली ले जाया जा रहा था तो उस ट्रक का ऐसीडेंट हो गया। उसका साथी तो वहीं मर गया और चंचल दूर गिर गया। चंचल के कान में चोट आई और उसके एक पैर में फैक्चर हो गया। बहुत घंटे तक चंचल उसी हालत ऐसे ही पड़ा रहा तब हम लोगों को सूचना दी गई और चंचल को रेस्क्यू किया। लगभग पांच घंटे की जदोजेहद के बाद उसको ट्रक मे चढ़ाया। चंचल के कान में अभी भी दिक्कत है लेकिन उसको एक नया जीवन मिला है।''

अगर आप इन केंद्रों को देखना चाहते है तो इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं- 9917190666

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