क्या ये उपाय किसानों की आय वाकई दोगुनी कर पाएंगे?

किसानों की आय दोगुना करने की रूपरेखा बनाने के लिए एक अंतर मंत्रिमंडलीय कमिटी बनाई गई है। इस कमिटी ने किसानों की आय दोगुना करने के कार्यक्रम की रूपरेखा बना दी है। हालांकि यह काम सीधे रूप से पिछले साल के लेखे जोखे से तो सम्बंधित नहीं है लेकिन फिर भी रिपोर्ट में इस भाग को विस्तार से लिखा गया है। इसी भाग में सरकार द्वारा गठित कमिटी ने 2022 तक आय को दोगुना करने के लिए सात तरीके या उपाय सुझाए हैं।

क्या ये उपाय किसानों की आय वाकई दोगुनी कर पाएंगे?

हर साल की शुरुआत में कृषि मंत्रालय की तरफ से बीते वर्ष के कृषि क्षेत्र का लेखा जोखा पेश किया जाता है। चलन के मुताबिक इस साल की शुरूआत में कृषि पर उसी तरह की रिपोर्ट प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो ने जारी की है। इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से कृषि के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं और प्रयासों का ज़िक्र है। इसमें बताया गया है कि पिछले साल यानी 2017-18 में भारत में कृषि उत्पादन 28 करोड़ 83 लाख टन रहा। और 2018-19 के लिए 29 करोड़ दो लाख पचास हजार टन अनाज उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार पिछले साल औसत बारिश सामान्य रही। इसी के साथ कृषि से जुडी कई योजनाओं के एलानों का ज़िक्र भी इस रिपोर्ट में है। मसलन एम.एस.पी लागत से डेढ़ गुना करने के सरकारी एलान का ज़िक्र, सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट और परम्परगत कृषि विकास योजना के प्रदर्शन की जानकारी, रबी और खरीफ की फसलों के उत्पादन के आंकड़े, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, बीमा योजना, कृषि उन्नति मेला जैसे कार्यों का ज़िक्र आदि इस रिपोर्ट में शामिल है।

लेकिन इस रिपोर्ट में एक भाग ऐसा है, जिसपर अलग से ध्यान जाता है। इस भाग में पिछले कुछ सालों से कृषि को लेकर ज़ोर शोर से प्रचारित किए गए एक सरकारी लक्ष्य की जानकारी दी गयी है। वह लक्ष्य है 2022 तक भारतीय किसानों की आय को दोगुना करने का काम। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि किसानों की आय दोगुना करने की रूपरेखा बनाने के लिए एक अंतर मंत्रिमंडलीय कमिटी बनाई गई है। इस कमिटी ने किसानों की आय दोगुना करने के कार्यक्रम की रूपरेखा बना दी है। हालांकि यह काम सीधे रूप से पिछले साल के लेखे जोखे से तो सम्बंधित नहीं है लेकिन फिर भी रिपोर्ट में इस भाग को विस्तार से लिखा गया है। इसी भाग में सरकार द्वारा गठित कमिटी ने 2022 तक आय को दोगुना करने के लिए सात तरीके या उपाय सुझाए हैं। पहली नज़र में पढ़ने से सैद्धांतिक रूप से यह उपाय सही भी लगते हैं। लेकिन भारतीय कृषि के सन्दर्भ में इन उपायों की व्यावहारिकता पर भी सोच विचार ज़रूर होना चाहिए। यानी यह देख लेना चाहिए कि क्या ये उपाय किसानों की आय वाकई दोगुनी कर पाएंगें?


पहला उपायः उत्पादन बढ़ाना

आमतौर पर उत्पादन बढ़ाने के दो उपाय होते हैं, या तो किसी तरह से खेती की ज़मीन बढ़ाई जाये या फिर प्रति हेक्टेयर उपज को बढ़ाने पर लगा जाये। इस समय भारत खेती की जमीन के आकार के मामले में दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा देश है। देश की कुल 32 करोड़ हेक्टेयर में से करीब 19 करोड़ हेक्टेयर पर खेती की जा रही है। लेकिन बढती जनसंख्या और आधारभूत संरचनाओं के विकास के बीच कुछ समय से ज़मीन की किल्लत बढ़ना शुरू हो गई है। ऐसे में खेती के अंतर्गत और ज़मीन को ला पाना बेहद मुश्किल काम लगता है।

प्रति हैक्टेयर उत्पादन बढ़ाने के लिए देश के पास उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से एड़ी से चोटी का दम लगा देने के दावे किए गए हैं। यानी और गुंजाइश दिखती नहीं है। लेकिन यहां थोड़ा अर्थशास्त्रीय तरीके से सोचने की ज़रुरत भी है। अभी भी हम जितना उत्पादन कर रहे हैं उसका सही दाम किसान को नहीं दिला पा रहे हैं। अर्थशास्त्र में मांग और आपूर्ति का नियम है। आपूर्ति बढ़ने से उत्पाद की कीमत गिरती ही है। ऐसे में उत्पादन बढ़ा कर किसान की आय को बढ़ा पाने के तर्क कई लिहाज़ से उलटे भी बैठ सकते हैं। लिहाज़ा अभी जितना उत्पादन किया जा रहा है उस उत्पाद के वाजिब दाम दिलाकर फिर भी किसान की आमदनी दुगनी करने का लक्ष्य साधा जा सकता है। इसके अलावा एक और बात गौर करने लायक है। वह ये कि किसान के उत्पाद की पर्याप्त सरकारी खरीद के जरिए किसान की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। अभी जितना कृषि उत्पाद उचित भंडारण न हो पाने के कारण सड़ गल जाता है उसे यह ही माना जाए कि वास्तविक उत्पादन कम हो रहा है। बर्बादी रूक जाए तो बाजार में कृषि उत्पाद की मात्रा खुद ब खुद बढ़ी दिखेगी।


दूसरा उपायः संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल या लागत में बचत

इस समय भारतीय किसान इतनी ग़ुरबत में है कि वह खुद ही पूरी किफायत से संसाधनों का इस्तेमाल करता है। किफायत बरतने की हद यह है कि ट्रेक्टर, बिजली, मशीनें या बैलों की जगह वह शारीरिक श्रम कर रहा है। इसलिए संसाधन या लागत में बचत के उसके पास ज्यादा विकल्प हैं नहीं। हाँ खाद और पानी के सही इस्तेमाल से थोडा बहुत फर्क लाया जा सकता है। लेकिन अब तक का अनुभव है कि ये उपाय उतने ज्यादा लाभकारी हैं नहीं जिससे आमदनी को दोगुना करने की तरफ बढ़ता हुआ देखा जा सके।

तीसरा उपायः खेती की तीव्रता को बढ़ा देना

क्रोपिंग इंटेसिटी नाम का यह उपाय भी एक प्रकार से उत्पादन बढाने का ही एक तरीका है। इस उपाय के तहत एक साल में खेती की ज़मीन पर ज्यादा से ज्यादा फसलें उगाई जाने का सुझाव दिया जाता है। इस तरह से उत्पादन बढाने का रास्ता किसान को दोगुनी आय तक कैसे ले जा पायेगा यह समझाने का काम विशेषज्ञों का है। विशेषज्ञ समय समय पर इस उपाय को सुझाते हैं और साथ में यह भी बताते हैं कि साल में एक फसल से ज्यादा फसलें लेना तभी संभव है जब समय पर खेत तक पानी मुहैया हो। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि देश के आधे से ज्यादा खेतों में सिर्फ वर्षाआधारित खेती ही हो पा रही है। लिहाज़ा खेती की तीव्रता बढ़ाने में यह इतनी बड़ी शर्त नत्थी है कि बात सिर्फ सदिच्छा तक ठहरी रह जाती है। सन 2022 तक देश के हर खेत तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य इतना बड़ा है कि सरकारी अफसर आजकल इसकी ज्यादा बात नहीं करते।


साल में कई फसलें लेने में एक अड़चन यह भी आती है कि एक फसल को काटने के बाद ज़मीन को गुणवत्ता वापिस हासिल करने के लिए कुछ दिन के लिए छोड़ना पड़ता है। खेत को खाली इसलिए छोड़ना पड़ता है ताकि मिट्टी फिर से पोषक तत्व हासिल कर सके। समय बचाने के लिए प्रौद्योगिकी ने यह समाधान खोजा कि एक फसल काटने के बाद उस खेत में फौरन ही पोषक तत्व अपनी तरफ से डाल दिए जाएं। इस तरह से उस जमीन को खाली छोड़े बगैर ही जल्दी ही दूसरी फसल को तैयार किया जा सकता है। यहां फिर यह बात उठ गई कि बहुफसलीय उपाय करने के लिए खाद और दूसरे रसायन का खर्चा अच्छा खासा बैठता है। यानी खेती की लागत बढ़ती है। यही लागत तो किसानों की समस्या है। यानी क्राप रोटेशन, मिक्स्ड क्रापिंग जैसे उपायों से उत्पादन बढ़ाने का मसला सिंचाई, खाद, कीटनाशक आदि का इस्तेमाल बढ़ाने पर निर्भर है। लिहाज़ा सिर्फ जागरूकता बढ़ाकर यह काम नहीं किया जा सकता। मौजूदा हालात में एक हकीकत यह भी है कि कई छोटे मझोले किसान पिछली फसल के बिक जाने के बाद मिले पैसे से ही अगली फसल बो पाते हैं। यानी साल भर में कई फसलें ले पाने के लिए पहली जरूरत यह है कि किसानों को उनकी फसल का पैसा फौरन मिले जिसकी व्यवस्था अभी नहीं बनाई जा पा रही है।

चौथा उपायः ज्यादा लाभकारी फसलों की ओर खेती को मोड़ना

यह एक दूरदर्शी और आज की ज़रुरत के हिसाब का उपाय है। इस बारे में क्या होना है? इसे लेकर कोई विवाद नहीं है। लेकिन कैसे होना है? इस पर तरह तरह की जटिलताएं हैं। बेशक इस समय भारतीय खेती की एक बड़ी समस्या यह भी है कि हमारी खेती में विभिन्नता/विविधता कम है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भारतीय कृषि उत्पाद के निर्यात के लिए कम विकल्प हैं। इसी वजह से हम कुल उत्पादन मात्रा में ज्यादा होते हुए भी उसे बेचकर पाए कुल दाम के लिहाज़ से कई छोटे देशों से बहुत पीछे हैं। ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है कि आज भी भारतीय कृषि मुख्य रूप् से गेंहू और धान पर ही टिकी है। पूरी दुनिया में लाभ लागत के हिसाब से ये फसलें लाभकारी नहीं हैं। इधर अपने किसान पुश्तों से मुख्यतः यही फसलें उगाते आए हैं। और अगर कोई उन्हें दूसरी फसलें उगाने का सुझाव देता है तो नएपन की वजह से उन्हें अपनी कामयाबी या नाकामी की दुविधा रहती है। प्रबंधन प्रौद्योगिकी के मुताबिक यहां चेंज मैनेजमेंट की जटिलताएं भी खड़ी हो जाती हैं। इतना ही नहीं किसानों को पता नहीं होेता कि नए प्रकार के कृषि उत्पाद का बाजार कहां है और उसकी क्या कीमत उन्हें मिलेगी। बेशक उद्योग जगत से उन्हें कुछ फसलों की समझाइश मिलती है। लेकिन ये गारंटी नहीं मिलती कि उन्हें वक्त पर सही दाम भी मिल जाएगा। ऐसे में नए कृषि उत्पाद को उगाने का जोखिम हमारा डरा हुआ किसान ले भी कैसे सकता है।

पांचवा उपायः किसान को मिलने वाले मूल्य में बढ़ोत्तरी

मूल्य में बढ़ोत्तरी के उपाय का दावा हर सरकार करती है। लेकिन अभी तक स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर फसलों का वाजिब और पूरा मूल्य किसानों को नहीं मिल पाया। यह सिर्फ एमएसपी की घोषणा तक की एक सीमित बात है। जबकि जितनी भी चुनिंदा फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होेता है उन उत्पादों के पूरा का पूरा बिक पाने में कितनी मुश्किलें आती हैं वह ज़मीनी स्तर पर सब जानते हैं। ना तो सभी प्रकार की फसलों का मूल्य निर्धारित किया जाता है और जिनका किया भी जाता है तो सरकार की सीमित खरीद की क्षमता की वजह से वह भी पूरी नहीं खरीदी जा पातीं। और खुले बाज़ार में जब किसान पहुंचता है तब वह वहां कम दाम के कारण अपने उत्पाद की लागत भी हासिल नहीं कर पाता। अगर किसानों की आय दुगना करने के लक्ष्य के लिए तमाम उपायों में एक एमएसपी को जाचें तो यह कबूल करने से कौन इनकार कर सकता है कि एमएसपी तो तय हुआ है लेकिन किसान की पूरी उपज एमएसपी पर खरीदने का इंतजाम नहीं है। पुख्ता इंतजाम तो दूर की बात है अभी सरकार के पास भारतीय किसान की चौथाई फसल खरीदकर सुरक्षित रखने यानी भंडारण तक का इंतजाम तक नहीं है। यानी जरूरत सिर्फ एमएसपी तय करने से ही नहीं बन पा रही हैं बल्कि देश में सरकारी भंडारण के लिए आधारभूत ढांचा खड़ा करने की पहले है।


छठा उपायः किसानों को खेती से दूसरे व्यवसायों की ओर मोड़ना

इस समय देश में बेरोज़गारी की हालत देखते हुए यह उपाय बेहद लचर लगता है। कुछ लोग तो इसे हास्यास्पद भी कह सकते हैं। अभी जो हालात हैं उसमें अच्छे कॉलेजों की डिग्री लिए पढ़े लिखे युवक तक अपने लिए रोज़गार नहीं ढूंढ पा रहे हैं। देश के लेबर चौकों पर डिग्रीधारी युवा तक मजदूरी पाने के लिए घंटों बैठे दिखते हैं और दोपहर तक हारथक कर खाली हाथ वापस आ जाते हैं। ऐसे में किसानों के लिए किसानी के अलावा कौन से दूसरे व्यवसाय की समझाइश दी जा रही है? दूसरी तरफ हर साल देश में 2 करोड़ बेरोजगार अलग से जुड़ रहे हैं। ऐसे नाज़ुक हालात में देश की आधी से ज्यादा आबादी को व्यवसाय दे रहे कृषि क्षेत्र से किसान को निकाल कर दूसरे रोज़गार में लगाने की बात हर तरह से अव्यवहारिक लगती है। किसानों को दूसरे व्यवसाय में लगाने का सुझाव देने वालों से यह पूछ लिया जाना चाहिए कि क्या उन्होंने मान लिया है कि कृषि विकास संतृप्त हो गया है?

सातवां उपायः कृषि क्षेत्र में सरकारी और निजी क्षेत्र से निवेश कराने के रास्ते खोजना

इस समय कृषि के विकास के लिए कृषि सम्बन्धित कई क्षेत्रों में निवेश की ज़रूरत है. उपाय दो हैं। या तो सरकार यह निवेश बढ़ाए या निजी क्षेत्र से निवेश कराने का कोई उपाय करे। देश के मौजूदा माली हालात बता रहे हैं कि सरकार की जितनी हैसियत हो सकती है वह कर चुकी। हर समय उसके पास संसाधनों का टोटा पड़ा रहता है। हालांकि प्रबंधन प्रौद्योगिकी में लक्ष्यों को प्राथमिकता की सूची में लगाने का सुझाव है। तब संसाधनों को उसी हिसाब से बाँट दिया जाता है। इस लिहाज़ से अपने आकार और उससे जुड़े लोगों की संख्या की वजह से कृषि को सरकारी प्राथमिकता सूची में सबसे आगे होना चाहिए। लेकिन ऐसा है नहीं। इसीलिए रह रह कर निजी क्षेत्र से निवेश करवाने की बात चलाई जाती है। जबकि निजी क्षेत्र से निवेश कराने का काम और ज्यादा मुश्किल लगता है। निजी क्षेत्र या औद्योगिक क्षेत्र नफे नुकसान के हिसाब से चलते हैं। जब तक खेती फायदे का सौदा नहीं बनती इसमें निजी निवेश लाना उतना आसान काम नहीं है। यहां तक कि भंडारगृहों के निर्माण में निजी क्षेत्र ने कम मुनाफे के कारण बिल्कुल दिलचस्पी नहीं ली। सरकार की हरचंद कोशिशों और निजी क्षेत्र को भारी रियायतों और सुविधाओं के बावजूद कृषि में निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ाने का उपाय सिरे नहीं चढ़ा। यानी किसानों के लिए वाकई कुछ सोचना या करना है तो सरकारी बजट में ही खेती के लिए और ज्यादा जगह बनानी पड़ेगी। यह तर्क इस आधार पर है कि देश में खेती में लगे लोगों की आबादी देश की कुल आबादी की आधी से ज्यादा है। इसीलिए लोकतंत्र में अगर प्राथमिकताएं तय होना हो तो किसान को सबसे पहले रखना ही पड़ेगा।

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