महिला सुरक्षा: घोषणा पत्र में जगह लेकिन कितनी कारगर योजनाएं?

Pragya BhartiPragya Bharti   11 April 2019 6:25 AM GMT

महिला सुरक्षा: घोषणा पत्र में जगह लेकिन कितनी कारगर योजनाएं?

लखनऊ। लोकसभा (Loksabha Election 2019) के लिए होने वाले आम चुनावों के मद्देनज़र जारी हुए घोषणा पत्रों में महिलाओं के लिए बहुत सी योजनाओं का ज़िक्र है। सत्ताधारी दल भाजपा हो या मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस दोनों के ही घोषणा पत्रों में महिलाओं के मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है। दोनों ही दलों ने अपने घोषणा पत्र में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही है।

जहां कांग्रेस ने महिलाओं को समान वेतन देने की बात कही तो वहीं भाजपा ने महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाने का ज़िक्र किया। घोषणा पत्रों में किए गए वादों पर गाँव कनेक्शन ने स्वयं सेवी संस्थाओं और महिलाओं से बात की और जानना चाहा कि असल में महिलाएं सरकार से क्या अपेक्षा रखती हैं।

कांग्रेस के घोषणा पत्र में महिलाओं से किए गए वादे -

  1. लोकसभा, राज्यसभा और राज्य की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण
  2. केन्द्र की सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण
  3. महिलाओं को समान वेतन देने के लिए सामान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 को कानून बनाएंगे
  4. कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास और परिवहन की व्यवस्था
  5. महिलाओं की नाइट शिफ्ट में नौकरी पर लगे किसी भी तरह के प्रतिबंध को हटाएंगे
  6. प्रवासी महिलाओं के लिए रात में रुकने के लिए आश्रय स्थल बनाए जाएंगे। कस्बों और शहरों में महिलाओं के लिए साफ और सुरक्षित सार्वजनिक शौचालय बनाए जाएंगे। सार्वजनिक स्थानों, स्कूलों और महाविद्यालयों में सैनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाई जाएंगी।
  7. कार्यस्थलों पर महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए कदम उठाएंगे। 'महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013' को लागू किया जाएगा।
  8. महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले जघन्य अपराधों की जांच के लिए एक अलग जांच एजेंसी बनाई जाएगी और राज्य सरकारों से भी ऐसा करने के लिए कहा जाएगा।
  9. महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सशक्त करने के लिए कदम उठाएंगे। राष्ट्रीय ग्रामीण अजीविका मिशन (एनआरएलएम)-2 शुरू करेंगे, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए कदम उठाए जाएंगे।
  10. एक ऐसी योजना शुरू की जाएगी जो अकेली, विधवा, तलाकशुदा, त्याग दी गईं महिलाएं, निराश्रित महिलाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जीने में सहायता करेगी।
  11. सभी पंचायतों में एक अधिकार मंत्री नियुक्त किया जाएगा जो महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में शिक्षित करेगा।
  12. शादियों के पंजीकरण को अनिवार्य करने के लिए कानून बनाया जाएगा, साथ ही बाल विवाह को रोकने के लिए कानून को लागू करने पर ज़ोर रहेगा।
  13. हर आंगनवाड़ी में शिशु गृह बनाया जाएगा। समन्वित बाल विकास योजना का विस्तार किया जाएगा।

सांकेतिक तस्वीर

भाजपा के घोषणा पत्र में महिलाओं से किए गए वादे -

  1. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के विस्तार में सभी लड़कियों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। उच्च शिक्षा ऋण में रियायत दी जाएगी।
  2. महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों, महिला कृषकों के लिए संसाधनों की उपलब्धता को बढ़ाएंगे।
  3. महिला कार्यबल के लिए रोडमैप तैयार किया जाएगा।
  4. परिधान, चमड़ा, लकड़ी, रबर, फर्नीचर इत्यादि की खरीद में कम से कम 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों से सरकारी खरीद का 10 प्रतिशत हिस्सा खरीदेंगे।
  5. शिशु गृह और बाल संरक्षण सुविधाओं में तीन गुना वृद्धि करने का प्रयास।
  6. तीन तलाक और निकाह-हलाला जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए कानून पारित करेंगे।
  7. मातृत्व देखभाल की सुविधाओं को सुनिश्चित किया जाएगा।
  8. कुपोषण को कम करेंगे।
  9. प्रसव और माहवारी सम्बन्धित स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलब्ध हों। एक रुपए में सैनेटरी पैड की उपलब्धता।
  10. आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को आयुष्मान भारत योजना में शामिल करेंगे।
  11. महिला सुरक्षा के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों में विस्तार और फॉरेंसिक सुविधाओं में बढ़ोत्तरी।
  12. लैंगिक समानता के विषय को पाठ्यक्रम एवं प्रशिक्षण में अनिवार्य किया जाएगा।
  13. रक्षा कर्मियों की विधवाओं की सुरक्षा और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए अवसरों का निर्माण किया जाएगा। साथ ही कौशल प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करेंगे।
  14. महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण के कानून को पारित करने का प्रयास।

घोषणा पत्रों में किए गए सभी वादे और योजनाएं तभी काम की हैं जब वो असल में लागू हों।

गाँव कनेक्शन से फोन पर बात करते हुए 'हमसफर' स्वयं सेवी संस्था की कार्यक्रम समन्वयक ऋचा रस्तोगी बताती हैं कि घोषणा पत्रों में बहुत कुछ कह दिया जाता है लेकिन असल में ये कितना लागू होता है वो महत्वपूर्ण है। हमसफर समुदायों में रहने वाली और संघर्षशील महिलाओं के लिए काम करने वाली स्वयं सेवी संस्था है। ऋचा कहती हैं-

"ज़मीनी स्तर पर हमारे हिसाब से महिलाओं के लिए चार चीज़ें महत्वपूर्ण हैं- राशन, सुरक्षित माहौल, सही इलाज की सुविधाएं और आरटीई (शिक्षा का अधिकार) के तहत बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला मिले।"

ऋचा विस्तार से बताती हैं, "राशन सही लोगों को मिल रहा है या नहीं ये कौन सुनिश्चित करेगा? बायोमैट्रिक मशीनों की अनिवार्यता के कारण औरतों को राशन मिलने में दिक्कत होती है। जो कामगर महिलाएं हैं, मजदूर महिलाएं हैं उनके फिंगर प्रिंट्स नहीं मिलते तो उन्हें राशन नहीं दिया जाता। साथ ही जो बीमार या बूढ़ी औरतें हैं, जिन्हें चलने-फिरने में दिक्कत है, वो चलने की हालत में नहीं हैं फिर भी उन्हें दुकान तक जाकर लाइन लगानी पड़ती है नहीं तो उन्हें राशन नहीं मिलेगा।"

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सुरक्षित माहौल के बारे में वो कहती हैं, "महिलाओं से सम्बन्धित किसी भी घटना में त्वरित सुनवाई होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी संवेदनशील हों, तब ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाएगी। सिर्फ सीसीटीवी लगाकर सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती।"

"आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से महिलाओं को कोई मदद नहीं मिल रही है। महिलाएं सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटती रहती हैं लेकिन उनका सही इलाज नहीं हो पाता,"- ऋचा इलाज के बारे में कहती हैं।


आरटीई के बारे में ऋचा बताती हैं, "लखनऊ में सीएमएस, नवयुग जैसे मिश्नरी स्कूलों में गरीब बच्चों को दाखिला नहीं मिलता। सरकार ने आरटीई के तहत सभी विद्यालयों में गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित की तो हैं लेकिन कई स्कूलों में इन बच्चों को दाखिला नहीं मिल रहा है।"

ऋचा कहती हैं, "योजनाएं और कानून बना देने से कुछ नहीं होगा, उनका सही क्रियान्वयन होना बहुत ज़रूरी है। ज़मीन पर कितना काम हो रहा है ये कौन जांचेगा?"

सभी वादे और योजनाएं तभी काम की हैं जब वो असल में लागू हों। चुनाव के माहौल में बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद उन पर कोई बात नहीं करता।

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'महिला सामाख्या' नाम की स्वयं सेवी संस्था में पांच सालों से स्टेट रिसोर्स पर्सन के पद पर कार्यरत कहकशां परवीन गाँव कनेक्शन से फोन पर बात करते हुए कहती हैं, "महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात हमेशा कही जाती है देखना होगा कि वो पूरी होती है या नहीं। साथ ही नौकरियों में अगर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलता है तो ये बेहतर होगा। कांग्रेस के घोषणा पत्र में जो अच्छी बात है वो ये कि जो 72 हज़ार रुपए देने की बात उन्होंने कही है उसका पैसा घर की महिला मुखिया के खाते में आएगा।"

कहकशां आगे बताती हैं कि आम महिलाओं के लिए सरकार को सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतज़ाम करने चाहिए। साथ ही लैंगिक समानता पर काम करने की बहुत आवश्यकता है और महिलाओं की नौकरियों को उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना कि पुरुषों की नौकरियों को मिलता है।

भारत की आखिरी जनगणना के मुताबिक देश में 58 करोड़ 64 लाख 69 हज़ार 174 महिलाएं हैं। इनमें से 40 करोड़ 51 लाख 70 हज़ार 610 महिलाएं ग्रामीण इलाकों में रहती हैं तो वहीं शहरों में रहने वाली महिलाओं की संख्या 18 करोड़ 12 लाख 98 हज़ार 564 है। महिलाओं की लगभग 69 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है।

उत्तर प्रेदश राज्य के मेरठ जिले में चौधरी चरण सिंह कॉलेज ऑफ एज्यूकेशन एंड टेक्नोलॉजी, सदरपुर में शिक्षिका राजरानी बताती हैं,

"आम महिलाओं के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि राशन की चीज़ों का दाम न बढ़े। रसोई गैस, सब्जियों, दालों आदि के दाम अधिक न बढ़ें। साथ ही स्वास्थ्य सेवाएं उन्हें मुहैया हों और वो अपने बच्चों को उचित शिक्षा दे सकें, इसकी सही व्यवस्था हो।"

वहीं बरेली जिले की नवाबगंज तहसील में प्रेमपुर गांव की पूर्व प्रधान मनोरमा देवी बताती हैं कि, "महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी है उनकी सुरक्षा। उनकी सुरक्षा के लिए सही व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही उन्हें नौकरियों और राजनैतिक पदों पर आरक्षण मिलना चाहिए। हम तो यही चाहते हैं।"


'ब्रेकथ्रू' स्वयं सेवी संस्था में निदेशक के पद पर कार्यरत सुनीता मेनन का कहना है कि, "महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा और घरेलू हिंसा के खिलाफ बने कानूनों का सही तौर पर क्रियान्वयन हो। साथ ही उनके लिए आश्रय स्थल हैं या नहीं ये भी सुनिश्चित होना चाहिए। महिलाओं को सिर्फ महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के साथ जोड़ कर क्यों देखा जाता है? हर विभाग, हर मंत्रालय में महिलाओं की भागीदारी होनी चाहिए। हमारी राजनैतिक संस्थाओं में जेंडर लेंस है या नहीं? हर मुद्दे पर महिलाओं के नज़रिए से भी सोचा जाने चाहिए।"

सुनीता आगे कहती हैं, "महिलाओं का राजनैतिक प्रतिनिधित्व कितना है इस पर भी बात होनी चाहिए। साथ ही ये भी देखना होगा कि वो केवल पद बनकर न रह जाएं, फैसले लेने की उन्हें कितनी छूट है। गांव में अक्सर ये होता है, पंचायत सदस्य या सरपंच महिलाएं होती हैं लेकिन काम उनके घर के मर्द करते हैं। इसके साथ ही सबसे ज़रूरी है महिलाओं को नागरिक के तौर पर देखा जाना चाहिए। महिलाओं की राजनैतिक और आर्थिक रूप से कितनी भागीदारी है, ये भी एक बड़ा सवाल है।"

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सुनीता बताती हैं कि, "आम महिलाएं अपने लिए सम्मान चाहती हैं। सार्वजनिक स्थलों पर वो सुरक्षित महसूस कर रहीं हैं या नहीं? जो योजनाएं उनके लिए हैं वो उनके बारे में कितना जानती हैं? उनका उपभोग कर पा रही हैं या नहीं? इसके साथ ही उन्हें काम के अवसर कितने प्राप्त हो रहे हैं ये भी देखा जाना चाहिए। अगर काम के अवसर मिल भी रहे हैं तो कहीं वो आशा बहन जी या आंगनवाड़ी तक ही तो सीमित नहीं हैं। महिलाओं को हर क्षेत्र में काम के मौके मिलने चाहिए और वो इनके लिए तैयार भी हैं।"

"महिलाएं हर जगह उपस्थित तो होती हैं लेकिन उनका योगदान कितना है ये अहम है। घोषणा पत्र आम लोगों से पूछ कर तो बनाया नहीं जाता। सभी दल अपनी विचारधाराओं के आधार पर बंद कमरे में बैठ कर एक घोषणा पत्र जारी कर देते हैं, इसे बदलने की ज़रूरत है। अगर आप महिलाओं की बात कर रहे हैं तो उनसे पूछिए तो सही कि वो अपने लिए क्या चाहती हैं?"- सुनीता मेनन आगे कहती हैं।

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