गोंडी भाषा को हिंदी में अनुवाद करने की तकनीक पर काम शुरू

गोंडी भाषा को हिंदी में अनुवाद करने की तकनीक पर काम शुरू

रायपुर। "छत्तीसगढ़ में पिछले 40 साल से एक युद्ध जैसा माहौल है जिसे हम मशीनगन से लड़ने का प्रयास कर रहे हैं जबकि हमे इसे मशीनों जैसे मशीन ट्रांसलेशन टूल्स से लड़ने की आवश्यकता है। इस माओवादी वॉर में कम्यूनिकेशन गैप होने की वजह से परेशानी और बढ़ रही है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि भाषा को नजरंदाज ना किया जाये। ज्यादातर माओवादी सिर्फ गोंडी भाषा बोलते हैं जिसकी वजह से उन तक पहुंचना मुश्किल है। यही वजह है कि हम गोंडी भाषा के मशीन ट्रांसलेशन टूल बनाने का प्रयास कर रहे हैं," ऐसा सीजीनेट के प्रमुख शुभ्रांशु चौधरी ने 10-दिवसीय गोंडी वर्कशॉप के पहले दिन बताया।


यह वर्कशॉप सीजीनेट, ट्रिपल आईटी नया रायपुर और माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च मिल के आयोजित कर रहे हैं और यह ट्रिपल आईटी रायपुर के कैंपस में ही आयोजित किया जा रहा। पहले दिन वर्कशॉप में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 21 युवाओं ने भाग लिया जिनमें से कुछ अभी कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं तो कुछ युवाओं छत्तीसगढ़, बस्तर के कांकेर और सुकमा से आये हैं। इस वर्कशॉप के माध्यम सेसीजीनेट, माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च और ट्रिपल आईटी एक ऐसा मशीन ट्रांसलेशन टूल बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिसके माध्यम से गोंडी को हिंदी और हिंदी को गोंडी में आसानी से अनुवाद किया जा सके।

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कलिका बाली, जो माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च लैब्स इंडिया के साथ एक रिसर्चर हैं, कहती हैं "मुझे बेहद ख़ुशी हुई इन बच्चों को गोंडी में अनुवाद करते देख। ऐसी भाषाएं जिनका काफी कम डिजिटल डाटा है, उनपर काम करना बहुत ज़रूरी है। ऐसे वर्कशॉप बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि न सिर्फ ये बच्चों की मदद करेंगे, इसके साथ ये उन तकनीकी लोगों की भी मदद कंरेगे जो ऐसी भाषाओं के लिए टूल्स बनाने का प्रयास कर रहे हैं।"

सदेशी उइके (19) जो बैतूल मध्यप्रदेश से आये हैं और बीएससी फाइनल इयर में पढ़ाई कर रहे हैं, उनका कहना है कि गोंडी उनकी मातृ भाषा है और वो इस वर्कशॉप के ज़रिये उसे और मजबूत करना चाहते हैं और सीखने के बाद वे अपने साथियों को भी सिखाएंगे।

उनके साथी राजेश वर्ती जो भी बैतूल के हैं उनका कहना है कि उनके स्कूल में टीचर्स हिंदी में पढ़ाते थे जो गोंडी बोलने वाले बच्चो को ज्यादा समझ नहीं आती थी जिसकी वजह से काफी परेशानी होती थी। इसे बदलने की जरूरत है। इसी वजह से वो यह वर्कशॉप में भाग लेने आये हैं. सीजीनेट ने हाल ही में एक मानक डिक्शनरी का ऐप भी बनाया है जिसमे गोंडी के 3000 शब्दों का मानक अनुवाद किया गया है।

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दिनेश वट्टी जो सीजीनेट से 2013 से जुड़े हैं और छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से हैं, का कहना है कि आगे प्रयास है कि एक ऐसा प्लेटफार्म हो जहा वायस-बेस्ड टेक्नोलॉजी हम ला पाएं जिससे भाषा समझने में और आसानी होगी।

वर्कशॉप में आये हुए युवाओं के बारे में उन्होंने बताया के इनमें से कई लोगों ने कभी कंप्यूटर को हाथ भी नहीं लगाया था और पहले ही दिन कंप्यूटर पर हिंदी कहानियों का गोंडी में अनुवाद करके टाइप भी करने लगे। दिनेश एक ट्रेनर हैं और इस वर्कशॉप में विद्यार्थियों की हर तरीके से सहायता करने को तैयार हैं।


अमना सिंह जो मुंबई से इस वर्कशॉप का हिस्सा लेने आई हैं और प्रथम बुकस में एसोसिएट लैंग्वेज एडिटर के रूप में काम करती हैं, उनका मानना है कि किसी भाषा का विलुप्त हो जाना मतलब समाज के एक अंश का विलुप्त हो जाना होता है और इसी वजह से बहुत जरूरी है कि विलुप्त होती हुई भाषाओं को बचाया जाये।

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लक्ष्मण मांडवी (21) की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उनके द्वारा हिंदी से गोंडी भाषा में अनुवादित कहानी वर्कशॉप के पहले ही दिन डिजिटल प्लेटफार्म पर पब्लिश हुई। यह वर्कशॉप और दिन चलेगा।

हालांकि माओवादियों की इस जंग में भाषा बहुत सारी समस्याओं में से एक है लेकिन ये एक प्रमुख मुद्दा है। मसला चाहे जंग का हो या मोहब्बत का, भाषा सबसे अहम भूमिका निभाती है, ऐसा शुभ्रांशु का मानना है।

(स्वाति सुभेदार अहमदाबाद से हैं, कई बड़े मीडिया संस्थानों के साथ जुड़ी रही हैं, फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार हैं।)


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