विश्व बाल श्रम निषेध दिवस: बच्चों से मजदूरी का कलंक जारी है

भारत में बाल शोषण, बाल श्रम और बाल व्यापार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। आर्थिक तंगी और भुखमरी बाल व्यापार और बाल श्रम के लिए संजीवनी का काम करती है। यही कारण है कि बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से बाल तस्करी सबसे अधिक होती है।

विश्व बाल श्रम निषेध दिवस: बच्चों से मजदूरी का कलंक जारी है

हाल ही देश की राजधानी दिल्ली के एक संभ्रात इलाक़े (पॉश कॉलोनी) में एक नाबालिग नौकरानी के साथ यौन दुर्व्यहार की घटना ने एक बार फिर बाल श्रम कानून की पोल खोल दी है। पुलिस के अनुसार 12 साल की यह बच्ची झारखंड के एक ऐसे क्षेत्र से आती है जहां अब भी मोबाइल सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए अभी तक उसके माता-पिता से संपर्क नहीं हो पाया है। पुलिस का मानना है कि आर्थिक तंगी के कारण बच्ची के माता-पिता ने उसे एक गैर रजिस्टर्ड प्लेसमेंट एजेंसी के साथ भेजा था। जिसने दिल्ली लाकर इसे मानव तस्कर के हवाले कर दिया था। बड़े घरों में छोटे बच्चों को नौकर बना कर रखना और उनके साथ यौन शोषण की ऐसी घटनाएं आम हैं। कई बार इन घटनाओं का खुलासा हो जाता है लेकिन अक्सर इस तरह के मामले प्रकाश में नहीं आते हैं, जिसका फ़ायेदा मानव तस्कर उठाते हैं।

बाल मजदूरी छोड़ बच्चों ने पकड़ी स्कूल की डगर

भारत में बाल शोषण, बाल श्रम और बाल व्यापार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। आर्थिक तंगी और भुखमरी बाल व्यापार और बाल श्रम के लिए संजीवनी का काम करती है। यही कारण है कि बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से बाल तस्करी सबसे अधिक होती है। एक भयावह सच्चाई है कि इन राज्यों की मलिन बस्तियों में बसे दलित, महादलित, आदिवासी, पिछड़े, बेघर, बेबस और लाचार के पास घर में खाने को लाले पड़े होते हैं। काम न मिलने, काम के बदले कम पैसे मिलने अथवा समय पर मजदूरी न मिलने का सीधा असर इनके बच्चे और उसके भविष्य पर पड़ता है। बिहार और झारखण्ड के सूदूरवर्ती इलाके तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मजदूरी न मिलने के कारण बड़ी संख्या में दिल्ली, कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े महानगरों और आगरा, जयपुर, पंजाब, लखनऊ, कानपुर, मुरादाबाद, फ़रीदाबाद, बरेली और सूरत जैसे व्यापारिक और औद्योगिक शहरों में मजदूरों का लगातार पलायन हो रहा है। इनमें काफी संख्या में बाल मजदूर होते हैं। जिन्हें यहां की चूड़ी, बर्तन, कपड़े, चमड़े, बेकरी और कैमिकल की फैक्ट्रियों अथवा ढ़ाबों में बंधुआ मजदूर के तौर पर लगाया जाता है।

किसी ने स्कूल में दाखिला दिलवाया तो किसी ने रोकी बाल मजदूरी



अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक विश्व में 21 करोड़ 80 लाख बाल श्रमिक हैं। केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 2001 की जन गणना के अनुसार भारत में 25.2 करोड़ कुल बच्चों की आबादी की तुलना में, 5-14वर्ष के आयु समूह के 1.26 करोड़ बच्चे काम कर रहे हैं। इनमें से लगभग 12लाख बच्चे ऐसे ख़तरनाक व्यवसायों और उद्योगों में काम कर रहे हैं जो बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत निषेध है। शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या अत्याधिक, है जो कैंटीन में काम करते हैं या चिथड़े उठाने एवं सामानों की फेरी लगाने में संग्लनहैं लेकिन इस संबंध में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है। अधिक बदकिस्मत बच्चे वे हैं, जो जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं। कितने ही बच्चे हानिकारक प्रदूषित कारखानों में काम करते हैं, जिनकी ईंट की दीवार पर कालिख जमी रहती है और हवा विषैली होती है वे ऐसी भठियों के पास काम करते हैं, जो 1200 डिग्री सेल्सियस ताप पर जलती हैं। वे आर्सेनिक और पोटेशियम जैसे खतरनाक रसायनों को काम में लेते हैं। इन बच्चों से कांच-धमन की इकाइयों मेंकाम कराया जाता है, जहां उनके फेफड़ों पर जोर पड़ता है, जिससे तपेदिक जैसी बीमारियां होती हैं लेकिन तब भी अपने मालिकों के आदेश पर उन्हें 12 से 15 घंटे लगातार काम करना पड़ता है। वहीँ दूसरी ओर कूड़े के ढेर में से रिसाइक्लिंग के लिए विभिन्न सामग्री इकट्ठा करने वाले बच्चों में समय से पूर्व ही कई खतरनाक और संक्रामक बिमारियां घर कर जाती हैं।

बाल मजदूरी में यूपी सबसे आगे



भारत में बालश्रम के प्रमुख कारणों में निर्धनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, कम आय की प्राप्ति आदि हैं जहां 40% से अधिक लोग गरीबी से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे बालश्रम करके अपना और माता-पिता का पेट भरते हैं। भारत में जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग अशिक्षित है, जिसके दृष्टिकोण में शिक्षा ग्रहण करने से अधिक आवश्यक है धन कमाना, जिससे बालश्रम को बढ़ावा मिलता है। सरकारकी ओर से बालहिंसा, लैंगिक अपराध, बच्चों की तस्करी और बाल श्रम से जुड़े कई पहलुओं को ध्यान में रखकर कानून बनाने और उसपर सख्ती से अमल करने पर ज़ोर दिया जाता रहा है।


संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 30 तक एवं 32 से 35 में मौलिक अधिकारों का वर्णण किया गया है। जो शोषण के विरूद्ध अधिकार, मानव तस्करी, बेगार एवं जबरन श्रमिकों निषेध करता है। जबकि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक काम-धंधों में लगाना तथा मजदूरी कराने को अपराध की श्रेणी में रखा जाताहै। वर्ष 1949 में सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी श्रमिकों के कार्य करने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष निर्धारित की गई। भारत सरकार ने वर्ष 1979 में बाल श्रम समस्याओं से संबंधित अध्ययन हेतु गुरुपादस्वामी समिति का गठन किया, जिसके सुझाव पर बालश्रम अधिनियम 1986 लागू किया गया। यह पहला विस्तृत कानून है, जो 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को व्यवस्थित उद्योगों एवं अन्य कठिन औद्योगिक व्यवसायों जैसे बीड़ी, कालीन, माचिस, आतिशबाजी आदि के निर्माण में रोजगार देने पर प्रतिबंध लगाता है। बावजूद इसके हमारे देश में बालश्रमिकों कीसंख्या आज भी करोड़ों में है।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्य 8 के अंतर्गत 8.7 में भी 2025 तक बाल मजदूरी को पूरी तरह से ख़त्म करने का संकल्प लिया गया है। बाल श्रम के प्रति विरोध एवं जगरूकता फैलाने के मकसद से हर साल 12 जून को बालश्रम निषेध दिवस भी मनाया जाता है। लेकिन इन सबके बावजूद सच्चाई यही है कि बाल श्रम निरंतर जारी है। बाल श्रम को बच्चों के विरूद्ध हिंसा मानने वाले नोबल पुरुस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि सामूहिक कार्यों, राजनीतिक इच्छा शक्ति, पर्याप्त संसाधन और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से ही बालश्रम को समाप्त किया जा सकता है। जिस दिन हम एक गरीब के बच्चे के साथ भी अपने बच्चों की तरह व्यवहार करने लगेंगे, बाल श्रम स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

प्रेम कुमार विद्यार्थी (चरखा फीचर्स)

मध्य प्रदेश में तीन लाख बाल मजदूर निरक्षर


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