असहाय हाथियों की देखरेख का ये है अनूठा ठिकाना

हाथी संरक्षण केंद्र में 20 हाथी रह रहे हैं, जिसमें आठ हाथी और 12 हथनी हैं। यह सभी शारीरिक रुप से अस्वस्थ्य हैं इनमें से कुछ को आंखों से दिखाई नहीं पड़ता तो कुछ कमजोरी और बीमारी की वजह से चलने में असमर्थ हैं।

दिति बाजपेई/सुयश शादीज़ा

चुरमुरा (मथुरा)। दर्द से कराहा रही फूलमती (हथनी) आज अपने दोस्तों से साथ खुश है क्योंकि अब उसे एक ऐसा ठिकाना मिल गया है जहां उसे पेट भरने के लिए न तो करतब दिखाना पड़ता है और न ही अपने महावत की मार सहनी पड‍़ती है।

यह वह फूलमती है जो छह साल पहले फिरोजाबाद के बाजारों में अपने महावत के परिवार का खर्चा चलाने के लिए घूम-घूम कर लोगों का मनोरंजन करती थी जिसकी वजह से उसके आगे के दोनों तलवों में तक़रीबन ढाई सौ ग्राम कांच के टुकड़े और कीलें धस गई थीं। कीलें लगने के बाद उसके लिए एक-एक कदम चलना मुश्किल था पर उसके महावत का उसकी तकलीफ की तरफ ध्यान ही नहीं गया।

फूलमती अपने दर्द को किसी से बयां नहीं कर सकती थीं सड़क से गुजरने वाले हजारों लोगों की नज़रें उस पर पड़ती थी लेकिन उस भीड़ में एक शख्स ऐसा भी था जिसने फूलमती को सही जगह पहुंचाया जहां उसकी पूरी देख-रेख हो सके। यह मथुरा के चुरमुरा की वह जगह थी जहां फूलमती सहित 20 अलग-अलग नाम के हाथियों की देख-रेख हो रही थी।

''यह वहीं फूलमती है जिसे छह साल पहले हमें एक राहगीर ने इसके घायल होने की सूचना दी थी। इसके बाद हमारी टीम ने रेस्क्यू किया था। इसके तलवों के घाव सही होने में काफी समय लग गया।'' फूलमती के सूंड में खीरे के टुकड़े खिलाते हुए हाथी संरक्षण केंद्र (वाइल्ड लाइफ एसओएस ) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. बैजू राज ने बताया, ''अभी भी इसकी दाहिनी आंख से कम दिखाई पड़ता है। इस केंद्र में फूलमती की तरह हम कई हाथियों को रेस्क्यू कर के लाए हैं। यह सब आपस में दोस्त है और हमने हर किसी को नया नाम दिया है।''


यह हाथी संरक्षण केंद्र वर्ष 1995 से वन्यजीवों का संरक्षण और पर्यावरण को बचाने के लिए एक गैर सरकारी संगठन वाइल्ड लाइफ एसओएस काम कर रहा है। इस संस्था के पूरे भारत में चार ब्लैक भालू, एक हिमालयन भालू, एक तेंदुआ और दो हाथी केंद्र बने हुए हैं। जहां पर इन वन्यजीवों को रखकर उनकी देखभाल की जाती है। जब इस संस्था ने काम करना शुरु किया था तब यह एक छोटा सा समूह था लेकिन आज यह पूरे भारत में बड़े स्तर पर काम कर रहा है।

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यह केंद्र लगभग 50 एकड़ में बना हुआ है। वर्तमान में यहां 20 हाथी रह रहे हैं, जिसमें आठ हाथी और 12 हथनी हैं। यह सभी शारीरिक रुप से अस्वस्थ्य हैं इनमें से कुछ को आंखों से दिखाई नहीं पड़ता तो कुछ कमजोरी और बीमारी की वजह से चलने में असमर्थ हैं। इसलिए इनकी देखभाल करने के लिए यहां 50 कर्मचारियों का स्टाफ तैनात है।

हर साल 12 अगस्त को जंगल में रहने वाले हाथियों के संरक्षण, गैर-कानूनी शिकार और तस्करी रोकने के लिए 'विश्व हाथी दिवस' मनाया जाता है। यह दिवस हाथियों के बेहतर इलाज और पकड़े गए हाथियों को अभ्यारण्यों में भेजे जाने के लिए जागरूकता भी प्रदान करता है।

''महावत अपने परिवार का खर्चा चलाने के लिए जंगल से हाथनियों के छोटे बच्चों को पकड़ कर ले आते हैं। एक कमरे में बंद करके इन्हें कई दिनों तक भूखा रखते हैं, जिससे ये छोटे बच्चे कमजोर हो जाते हैं और फिर ये बच्चे वही करते हैं जो महावत करवाना चाहता है। '' बैजू राज ने गाँव कनेक्शन को बताया, '' हाथी विश्व का सबसे बड़ा स्तनपाई प्राणी होने के बावजूद एक महावत के इशारों पर चलने को मजबूर होता है। सिर्फ हाथी ही नहीं बल्कि जंगलों में रहने वाले जितने भी जंगली जानवर है सबकी संख्या दिन पर दिन घट रही है।''

इन जंगली जानवरों को बचाने के लिए हर किसी को गंभीर होना होगा क्योंकि इनकी प्रकृति में बहुत बड़ी भूमिका होती है। बैजू ने बताया, ''हम सिर्फ हाथियों की देख-रेख ही नहीं करते है बल्कि महावतों को भी प्रशिक्षित करते है, जिससे वो हाथियों के साथ अच्छा व्यवहार कर सके। यहां रहने वाले हाथी बहुत खुश नज़र आते है क्योंकि उन्हें अपना पेट भरने के लिए अब मज़बूरी में वो नहीं करना पड़ता जो उनके महावत करवाते थे।''

''हमारी संस्था के पूरे भारत में 11 केंद्र है, जहां पर बूढ़े और बीमार वन्यजीवों को रखकर नया जीवन देने का काम किया जा रहा है। इसके लिए सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली है लेकिन वन्यजीवों को रखने के लिए जगह और जिस राज्य में रेस्क्यू करते हैं उस राज्य के वन विभाग हमारी पूरी मदद करता है।'' उन्होंने आगे बताया, ''पैसे और संसाधनों के अभाव में हम ज्यादा हाथियों का संरक्षण करने में समर्थ नहीं हैं। हम जानते हैं देश में सैकड़ों ऐसे हाथी होंगे जिनको संरक्षण की जरुरत है। इस दिशा में हमने हाल ही में वन विभाग के सामने इनके संरक्षण का प्रस्ताव रखा है।''


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केंद्र में ऐजुकेशन ऑफिसर शिवम राय चंचल (हाथी)को मिले नये जीवन के बारे में बताते हैं,''चंचल और उसके एक और साथी को यूपी से दिल्ली ले जाया जा रहा था तो उस ट्रक का एक्सीडेंट हो गया। उसका साथी तो वहीं मर गया और चंचल दूर गिर गया। चंचल के कान में चोट आई और उसके एक पैर में फैक्चर हो गया। बहुत घंटे तक चंचल उसी हालत ऐसे ही पड़ा रहा तब हम लोगों को सूचना दी गई और चंचल को रेस्क्यू किया। लगभग पांच घंटे की जद्दोज़हेद के बाद उसको ट्रक मे चढ़ाया। चंचल के कान में अभी भी दिक्कत है लेकिन उसको एक नया जीवन मिला है।'' चंचल और फूलमती की तरह यहां रहने वाले सभी हाथियों की कहानी एक-दूसरे से मिलती-जुलती है। अगर इस संरक्षण केंद्र को

कुछ ऐसी होती है इन हाथियों की दिनचर्या

एक हाथी को रोजाना सुबह पांच बजे नाश्ता (गन्ना, फल, बरसीम, दलिया) दिया जाता है। सात बजे ये सभी टहलने के लिए जाते है। 11 बजे इन सभी को नहलाया जाता है। उसके बाद इन्हें फल दिया जाता है। तीन बजे तक आराम करने के बाद इनको फिर टहलाने के लिए ले जाया जाता है। शाम को छह बजे खाना देने के बाद ये बाड़े में ही रहते है। सभी हाथियों के लिए अलग-अलग बाड़े बनाए गए है। एक हाथी पर रोजाना तीन हजार रूपए का खर्चा आता है। इनके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा जाता है।

इन हाथियों का रोज होता है इलाज

बाड़े में इलाज कर रहे डॉ कमलनाथन बताते हैं, ''सर्कस से आए हाथियों के नाखूनों की हालत बहुत खराब होती है। जब हम इनकी देखरेख कर रहे होते है तो इनका महावत इनको खाना खिलाता है और ये बड़े आसानी से अपने नाखूनों का इलाज कराते हैं।'' अपनी बात को जारी रखते हुए डॉ कमलनाथन ने बताया, ''हाथियों को झुंड में रहना पसंद होता है लेकिन जब महावत के पास होते है तो उन्हें अकेला रहना पड़ता है। लेकिन हम उन्हें यहां पर उनकी मर्जी के मुताबिक रखते है ताकि वो आजादी महसूस कर सके।''

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