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वर्ल्ड पोलियो दिवस : आसान नहीं था भारत को पोलियो से मुक्त कर पाना

ऐसे भारत को किया गया था पोलियो मुक्त...

Deepanshu MishraDeepanshu Mishra   24 Oct 2019 7:15 AM GMT

वर्ल्ड पोलियो दिवस : आसान नहीं था भारत को पोलियो से मुक्त कर पानावर्ल्ड पोलियो दिवस

लखनऊ। ये भारत की सरकार ही नहीं उसकी जनता की भी कामयाबी है, जिसने पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। भारत में पोलियो महामारी की तरह बड़ा खतरा बना हुआ था। वर्ष 2014 में भारत पोलियो से मुक्त हुआ था।

वर्ष 1981 में भारत में पोलियो के 38090 मामले थे, जो वर्ष 1987 में कम होकर 28,264 मामले ही रह गए। वर्ष 2009 में दुनिया में सबसे ज्यादा पोलियो के 741 मामले भारत में थे। वर्ष 2010 में ये तादाद 43 ही रह गई। मगर ये आंकड़ा भी कम नहीं था क्योंकि दुनिया में पोलिया को तकरीबन नामोनिशान खत्म हो गया था। कुछ देशों के साथ सिर्फ भारत में पोलियो का दानव अपना शिकार बना रहा था।

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वर्ष 2010 के बाद पोलियो उन्मूलन अभियान को युद्धस्तर पर आगे बढ़ाया जाने लगा। शायद दुनिया में कहीं भी इतने बड़े पैमाने पर इतने कामयाब अभियान की मिसाल और नहीं है। उत्तर प्रदेश में 2010 में लास्ट केस पोलियो का आया था जबकि 2011 में पूरे भारत में लास्ट केस पोलियो का आया था।

24 लाख पोलियो कार्यकर्ता, 1.5 लाख कर्मचारी, सालाना 1000 करोड़ रुपये का बजट, सालाना 6 से 8 बार पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम, हर कार्यक्रम में 17 करोड़ बच्चों को वैक्सीन। ये आंकड़े हैं उस विराट अभियान के, जो पूरी दुनिया के सामने एक बेमिसाल नजीर की हैसियत रखता है।

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यूनिसेफ के एसएमनेट (सोशल मोबिलाईजेशन नेटवर्क) समन्वयक डॉ निर्मल सिंह ने बताया, "भारत को पोलियो से मुक्त करने के लिए पोलियो टीकाकरण का आरंभ किया गया था उस समय कई चुनौतियां सामने आई थी। वैक्सीन को हर 5 वर्ष तक के बच्चे तक पहुंचाना था हर बीमारी में खुद आदमी चलकर स्वास्थ्य विभाग के पास आता है लेकिन इस टीकाकरण में स्वास्थ्य विभाग को घर घर और बच्चे बच्चे तक जाना था।

उत्तर प्रदेश और बिहार में ज्यादा केस थे इसलिए वहां पर ज्यादा काम करना पड़ा जिस समय टीकाकरण का कार्य चल रहा था लोगों के मन में गलत धारणाएं आ रही थी। वेक्सीन हमें क्यों दी जा रही है लोगों के मन में यह चल रहा था कि यह नपुंसकता के लिए हमें दी जा रही है, जिससे आगे कोई भी जन्म नहीं ले पाए इस बात से लोगों को निकालना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। जनसंख्या ज्यादा थी और लोगों में जागरूकता बहुत कम, लोगों को जागरुक करना टीकाकरण के लिए बहुत मुश्किल हो रहा था।"

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पल्स पोलियो प्रतिरक्षण अभियान भारत ने डब्‍ल्‍यूएचओ वैश्विक पोलियो उन्‍मूलन प्रयास के परिणाम स्‍वरूप 1995 में पल्‍स पोलियो टीकाकरण (पीपीआई) कार्यक्रम आरंभ किया। इस कार्यक्रम के तहत 5 वर्ष से कम आयु के सभी बच्‍चों को पोलियो समाप्‍त होने तक हर वर्ष दिसंबर और जनवरी माह में ओरल पोलियो टीके (ओपीवी) की दो खुराकें दी जाती हैं। यह अभियान सफल सिद्ध हुआ है और भारत में पोलियो माइलिटिस की दर में काफी कमी आई।

यूनिसेफ के प्रोग्राम ऑफिसर निजामुद्दीन अहमद ने बताया, "हर महीने में 8 बार बच्चे को पोलियो की खुराक पिलाई जानी थी। दूर-दूर इलाकों में पहुंचना बहुत मुश्किल हो रहा था, लेकिन फिर भी हमारी टीम कार्य करती रही सबसे बड़ा लक्ष्य तक के स्कोर आइडेंटिफाई करना क्योंकि लोग को अगर लकवा होता था तो वह उसे बोली हुई समझते थे उसको समय से पकड़ना और उसकी पूरी तरह से जांच करके पोलियो की खुराक देना हमारे लिए बहुत बड़ा लक्ष्य था। क्वालिटी को मेंटेन करना वैक्सीन खराब ना होने पर इसके लिए कई तरह की कोशिशें की गई।

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पोलियो की खुराक अभी भी पिलाई जा रही है लेकिन कम कर दी गई है क्योंकि हमने अपने देश को तो सुरक्षित कर लिया है लेकिन किसी अन्य देश से कोई भी वायरस लेकर हमारे देश में इंटर न कर जाए इसलिए हर बॉर्डर पर हमारी टीम रहती है सिल्वर टेस्टिंग भी लगातार चल रही है सिल्वर टेस्टिंग में हर घर का माल किसी ना किसी सेवर में जरूर आता है तो हम सीवर लाइन में मल को इकट्ठा करके टेस्टिंग के लिए भेज देते हैं और से चेक करते हैं कि कहीं पोलियो का वायरस अभी जिंदा तो नहीं लेकिन पोलियो का वायरस भारत में पूर्व से खत्म हो गया है भारत में मॉनिटरिंग लगातार चलती रहती है और चलती भी रहेगी।"

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