विश्व जनसंख्या दिवस विशेष: महिलाओं की ज़िंदगी से खेल रही गूगल वाली दाई

विश्व जनसंख्या दिवस विशेष: महिलाओं की ज़िंदगी से खेल रही गूगल वाली दाईअनचाहे गर्भ और कम बच्चों की चाहत में कराए जाने वाले गर्भपात खुद महिलाओं की जान पर भारी पड़ रहे हैं।

''गर्भपात महिलाओं का अधिकार है लेकिन वो कानूनी नियमों के तहत सही डॉक्टरों की देखरेख में ही होना चाहिए। इन दवाओँ के इस्तेमाल में उतना ही एहतियात बरतना होती, जितना कोई मिसाइल छोड़ने में।"

लखनऊ/ मेरठ। जब आप ये ख़बर पढ़ रहे होंगे भारत की जनसंख्या 1 अरब 34 करोड़ के आंकड़े से कहीं आगे जा चुकी होगी। विस्फोटक होती जनसंख्या को रोकने की कोशिशें जारी हैं लेकिन जो उपाय अपनाए जा रहे हैं वो काफी खतरनाक हैं। अनचाहे गर्भ और कम बच्चों की चाहत में कराए जाने वाले गर्भपात खुद महिलाओं की जान पर भारी पड़ रहे हैं।

गर्भपात के लिए महिलाएं कैसे खुद डॉक्टर बन रही हैं मेरठ की ताजा घटना उसका उदाहरण है। जानी ब्लॉक निवासी एक युवती को अचानक पता चला की वो गर्भवती है। किसी को पता न चले इसलिए उसने गर्भपात का फैसला लिया, लेकिन किसी डॉक्टर के पास न जाकर इंटरनेट पर पढ़कर दवाएं ले लीं। दूसरी डोज लेते ही उसकी हालत बिगड़ गई, काफी ज्यादा खून के रिसाव के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, मुश्किल से जान बची।

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इस अविवाहित युवती का इलाज करने वाली स्त्री रोग विशेषज्ञ डाॅ. अर्चना ने गाँव कनेक्शन को बताया, "मरीज ने बिना अल्ट्रासाउंड कराए दवाएं ले लीं। जिससे उसकी हालात बहुत नाजुक हो गई थी, हीमोग्लोबिन घटकर 5 हो गया था, चार यूनिट खून चढ़ाना पड़ा। देर होती तो मौत भी हो सकती थी।" इसी हफ्ते हरदोई की एक वर्ष के बच्चे की मां राधा मिश्रा (31 वर्ष) को इलाज के लिए लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में भर्ती हुईं। वो एक साल में दोबारा गर्भवती हुई थीं। अफसोस के साथ वो बताती हैं, "इतनी जल्दी दूसरा बच्चा नहीं चाहते थे, तो मेडिकल स्टोर से दवा मंगाई थी, लेकिन वो नुकसान कर गई, पिछले एक महीने से लगातार ब्लीडिंग हो रही थी, इसलिए अस्पताल आए थे।"

जिंदगी जोखिम में डाल रही गूगल वाली दाई

16 मई 2016 को टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे आंकड़े के मुताबिक, साल 2015-16 में भारत में 34,790 महिलाओं ने गर्भपात कराया। जबकि साल 2014-2015 में गर्भपात के 13 प्रतशित कम यानि 30,742 मामले सामने आए थे। इनमें बड़ी संख्या उनकी होती है, जो इंटरनेट आदि से पढ़कर खुद दवाएं लेती हैं, यानि गूगल वाली दाई का दुरुपयोग नुकसान दे रहा है।

गर्भाशय नली फटने का रहता है डर

लखनऊ के सबसे बड़े महिला अस्पताल क्वीन मैरी की ओपीडी में पिछले कुछ वर्षों में गर्भपात के नए मामलों की संख्या तेजी से घटी है, ज्यादातर वो मरीज पहुंचते हैं, जिनकी हालत बिगड़ चुकी होती है। अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर रेखा सचान बताती हैं, "ओपीडी में रोज 4-5 केस ऐसे होते हैं बिना किसी डॉक्टर की सलाह के दवाइयां खाकर गर्भपात करा चुके होते हैं। लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह के गर्भपात की दवाएं नहीं लेनी चाहिए, इससे गर्भाशय नली फटने का डर रहता है।" वो आगे बताती हैं, गर्भपात महिलाओं का अधिकार है लेकिन वो कानूनी नियमों के तहत सही डॉक्टरों की देखरेख में ही होना चाहिए। इन दवाओँ के इस्तेमाल में उतना ही एहतियात बरतना होती, जितना कोई मिसाइल छोड़ने में।"

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यह है गर्भपात के बिगड़ते मामलों की वजह

इंस्टीट्यूट 'दि गुटमाकर' और 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंसेज' की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि गर्भ निरोधक संसाधनों की कमी और कम जानकारी का होना गर्भपात के बिगड़ते मामलों और मौतों की मुख्य वजह हैं। महिलाओं के हित और परिवार नियोजन के क्षेत्र में काम करने वाले प्रमुख गैर सरकारी संगठन 'पॉपुलेशन फांउडेशन ऑफ इंडिया' की पूनम बताती हैं, "इंडिया डिजिटल हो रहा है, अच्छी बात है लेकिन जिस तरह से इंटरनेट की जानकारी का दुरुपयोग हो रहा है वो चिंता का विषय है। जो महिलाएं बिना डाक्टर को दिखाए दवा लेती हैं, वो जांच भी नहीं करातीं। ऐसे में कैसे पता चलेगा कि गर्भ किस स्टेज (कितने माह का है) पर है, गलत जानकारी जान पर भारी पड़ती है।"

वो आगे कहती हैं, "देश में डॉक्टरों और काउंसलरों की कमी है, बिना डाक्टर के पर्चे के मेडिकल स्टोर पर दवा बिकनी हर हाल हाल में बंद होनी चाहिए।"

दोबारा मां बनने में आती है दिक्कत

बलरामपुर अस्पताल की प्रमुख अधीक्षिका डॉक्टर सविता भट्ट (तत्कालीन) बताती हैं, "गर्भपात करने बाद के बाद बहुत सी महिलाएं हमारे पास आती है। एंटी सीपी बहुत कम हो रहे हैं। जब ऐसी सूचनाएं इंटरनेट में डाली गई थी तो इसकी वजह थी कि लोग जानकार हो, लोग जागरूक हो। लेकिन इस तरह की मनमानी से सेहत खराब होती है केस बिगड़ने पर कई बार जान तो बच जाती है, लेकिन दोबारा मां बनने में मुश्किल आती है। "

परिवार नियोजन के लिए भारत में बजट सबसे कम

परिवार नियोजन के प्रति जागरुकता और संसाधनों की कमी अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक है लेकिन हमारे देश के हालत बद्तर हैं और उस पर खर्च होने वाला बजट काफी कम है। प्रसव के दौरान विश्वभर में प्रतिवर्ष 3 लाख 30 हजार महिलाओं की मौत होती है, जिनमें 15 प्रतिशत भारतीय महिलाएं शामिल हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन के लिए बजट आनुपातिक रूप से बहुत कम है। दक्षिण अफ्रीका में 4.5, थाईलैंड में 3.7, ब्राजील में 4.7, चीन में 3.1 प्रतिशत है, जबकि भारत में 1.3 फीसदी है।

जनसंख्या वृद्धि पर लग सकती है लगाम

जानकार मानते हैं कि अगर परिवार नियोजन और गर्भपात को लेकर सही जानकारी महिलाओं तक पहुंचाई जाए तो जनसंख्या पर काफी हद तक लगाम लग सकती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुमान के मुताबिक, "देश की प्रजनन दर 2.3 है लेकिन यदि महिलाओं को गर्भनिरोधक गोलियों दी जाएं और सुरक्षित गर्भपात का आश्वासन दिया जाए तो प्रजनन दर 1.9 तक गिर सकती है। यही समान दर अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया और स्वीडन में भी है। लेकिन भारत में पिछले 15 वर्षों से यही दर है।

गर्भनिरोधक के इस्तेमाल में हुई इतनी गिरावट

जनसंख्या, महिलाओं की सेहत और स्वास्थ्य सेहत के आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात और हैरान करने वाली है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले आठ वर्षों में गर्भनिरोधक के इस्तेमाल में 52 फीसदी और पुरुष नसबंदी में 73 फीसदी की गिरावट हुई है। ये आंकड़े निश्चित रूप से पुरुषों द्वारा गर्भ निरोधक इस्तेमाल करने की अनिच्छा का संकेत देते हैं।

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आंकड़ों पर नजर डालें तो 2008 और 2016 के बीच ओरल गर्भनिरोधक गोलियों के उपयोग में 30 फीसदी की गिरावट हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार (2016 तक) जनसंख्या में लगातार बढ़ी है लेकिन गर्भनिरोधक के इस्तेमाल में 35 फीसदी की गिरावट हुई है। जबकि गर्भपात और इमरजेंसी गोलियों की खपत दोगुनी हुई है। डाॅ. रेखा सचान के मुताबिक ये दोनों स्थितियां स्वास्थ्य के लिए घातक हैं।

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क्या है गाइडलाइन

मेडिकल अबार्शन एक नार्मल प्रोसीजर है, लेकिन यह हमेशा डॉक्टर के सुपरविजन में ही किया जाना चाहिए। दवा द्वारा अबार्शन की परिवार व स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 2002 में मान्यता प्राप्त की गई है। मेडिकल अबार्शन गाइडलाइन के अनुसार प्रेग्नेंसी के सात सप्ताह के अंदर दवा द्वारा अबार्शन किया जा सकता है, लेकिन डॉक्टर की सलाह पर।

बिना जांच के दवाइयां खाने से होने वाले नुकसान

अंदाजे यानी बिना अल्ट्रासाउंड के दवा लेने से महिलाओं को बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हो जाती है। एनीमिक होने का खतरा बढ़ता है और कई बार गर्भ के कुछ हिस्से अंदर ही रह जाते हैं। जो काफी नुकसान पहुंचाते हैं, महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. श्वेता तिवारी के मुताबिक इसलिए डॉक्टर जांच और डाक्टर की निगरानी ज़रूरी है।

डिटिजल इंडिया के लिए भी जागरूकता जरूरी

इंटरनेट का सही इस्तेमाल जरुरी और उसे लेकर जागरुक होना जरुरी है। ट्राई के अधिकारिक आंकडों के मुताबिक जून 2016 तक देश में 103.5 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता थे। डिजिटल इंडिया मिशन 2016 के मुताबिक भारत में 34.3 इंटरनेट उपभोग्ता हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल 55,000 गांव मोबाइल कनेक्टिविटी से वंचित हैं, आऩे वाले दिनों में जैसे-जैसे इंटरनेट गांव तक पहुंचे इसके विपरीत परिणाम सामने आएंगे। (ये ख़बर मूल रुप से वर्ष २०१६ में गांव कनेक्शन में प्रकाशित की गई थी)

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